अखी काढ धरी चरणा तल सभ धरती फिर मत पाई ॥ गुरु रामदास
कहा जाता है कि शेख़ फ़रीद का एक शिष्य बहुत नेक – पाक था । जब वह बाज़ार जाता तो एक वेश्या उसका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए उससे मज़ाक किया करती । वह बेचारा दूसरी ओर ध्यान कर लेता । ज्यों – ज्यों वह दूसरी तरफ़ ध्यान करता , वह और मज़ाक़ करती । ज्यों – ज्यों ध्यान हटाता , वेश्या और छेड़ती ।
एक दिन फ़रीद साहिब ने उस शिष्य से कहा कि आग चाहिए । उस ज़माने में लोग अंगारों को राख में दबाकर रखते थे और जब आग की ज़रूरत पड़ती तो अंगारों को निकालकर इस्तेमाल कर लेते । उसने गली और मुहल्ले में पूछा , बहुत घूमा लेकिन आग न मिली । बाज़ार में गया , देखा कि वही वेश्या हुक़्क़ा पी रही है । अब सोचता है कि इसकी मुझसे पहले ही दुश्मनी है । पर पीर का हुक्म है । ऊपर मकान पर चढ़ गया । वेश्या ने उसे देखकर पूछा कि क्या बात है ? वह बोला , ‘ माई जी ! आग चाहिए । ‘ वह मज़ाक़ के साथ कहने लगी कि आग की क़ीमत आँख है । आँख निकालकर दे जाओ और आग ले जाओ । उसने फ़ौरन अँगुली डालकर आँख निकालकर आगे रख दी । वेश्या डर गयी और आग दे दी । मन में सोचने लगी , मैंने तो मज़ाक़ में कहा था । खैर वह पट्टी बाँधकर फ़रीद साहिब के पास आ गया ।
उन्होंने पूछा , ‘ आग ले आये हो ? ‘ जवाब दिया , ‘ हाँ हुजूर , ले आया हूँ । ‘ फ़रीद साहिब ने कहा कि यह आँख पर पट्टी क्यों बाँधी है ? बोला , ‘ आँख ‘ आयी ‘ हुई है और दुखती है । ‘ उन्होंने कहा , ‘ अगर आयी हुई है तो पट्टी खोल दे । ‘ जब पट्टी खोली तो आँख पहले की तरह सही सलामत थी ।
मालिक हमेशा अपने भक्तों की लाज रखता है ।
Hare Krishna 💐🙏🌹
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