जग में चारों राम हैं , तीन राम व्यवहार । एक्कारमा चौथा राम निज सार है , ताका करो विचार ॥ एक राम दशरथ घर डोलै , एक राम घट घट में बोले । एक राम का सकल पसारा , एक राम त्रिभुवन ते न्यारा ॥ कबीर समग्र , भाग 1 , पृ .462
एक राम तो राजा दशरथ के पुत्र रामचंद्र जी का नाम है , दूसरा राम मन है जो घट – घट के अंदर है , तीसरा राम काल है जिसका यह त्रिलोकी या तीनों गुणों का पसारा है और चौथा राम इन सबसे और त्रिगुणों ( तीनों गुणों ) से न्यारा है ।
तीन लोकों का सब कोई ध्यान करते हैं , पर चौथे देव का मर्म कोई नहीं जानता :
तीन देव को सब कोई ध्यावे, चोथा देव का मरम न पावै।। कबीर समग्र , भाग 1 , पृ .461
सारा जहान तीनों गुणों की भक्ति में लगा हुआ है । सतनाम के बगैर जीव भूला पड़ा है , सतनाम के बगैर वह भवसागर से कैसे पार हो सकता है ?
तीन गुनन की भक्ति में , भूलि पर्यो संसार । कह कबीर निज नाम बिनु , कैसे उतरै पार ॥ कबीर साखी – संग्रह , पृ .104
यह ‘ राम ‘ वास्तव में सतनाम यानी सत्पुरुष है । यही चौथा पद है जिसकी ओर संत संकेत करते हैं और जिसको अपना आदर्श मानते हैं ।
काल या धर्म राए इसी अकालपुरुष , राम राए यानी सत्पुरुष के हुक्म में कार्य कर रहा है । सत्पुरुष के अवतार , संतजन भी इस संसार में काम कर रहे हैं , पर उनका काम आत्माओं को सत्पुरुष की गोद में पहुँचाने का है ।
राम राए अलख है , उसके मिलाप से अटल सुहाग मिलता है । राम राए की प्राप्ति सत्संग , सतगुरु और शब्द के अभ्यास द्वारा होती है । ब्रह्मज्ञान के बिना उसकी प्राप्ति कठिन है । राम राए का मिलाप सहज अवस्था में ही होता है । उसकी प्राप्ति से सब दु : खों का नाश हो जाता है , यम पास नहीं फटकता और निर्भय पद की प्राप्ति होती है राम राए घट – घट में रम रहा है और वह हरि यानी स्वामी का ही रूप है ।
Please I would like to know if the fourth Ram is the Self within? Please explain a bit further if possible as this is very interesting. If my knowledge is correct -then this is what Shri Krishna spoke about as well while at the battlefield.
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Gita’s chapter eighteen is all about this, soon I’ll will reply u with some quotes
Thanks
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संत राम रहीम जी इसी रामनाम की बात करते हैं
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