उस प्रभु ने अपार कृपा करके आपको एक ऐसी उत्तम दात बख्शी है जिसके सामने इस संसार की सारी धन – दौलत तुच्छ है । पर इस दात का लाभ आपको तभी पहुँचेगा जब आप उसका अभ्यास करेंगे । महाराज सावन सिंह
दिल्ली में एक महाजन था । उसे साधु – संतों के सत्संग सुनने का बहुत शौक था । वह रोज़ सत्संग में जाता और अपने लड़के को दुकान पर छोड़ जाता । एक दिन उसके लड़के ने कहा , ‘ पिता जी , आप बिना नागा सत्संग सुनने जाते हो , आपको इससे अवश्य आनंद आता होगा । एक दिन मुझे भी सत्संग में जाने की आज्ञा देना और आप दुकान पर रहना । मेरा मन भी करता है कि देखू सत्संग कैसा होता है ? ”
पिता ने कहा , ‘ क्यों नहीं , तुम भी ज़रूर जाना । तुम्हें भी इसमें आनंद आयेगा ।
जब लड़का सत्संग में गया तो वहाँ महात्मा ने वचन कहे , ‘ सबकी सेवा करनी चाहिए , कभी किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए । ‘ वह सत्संग सुनकर दुकान पर आ गया । बाज़ार में गायें फिरती रहती थीं । एक गाय आकर आटा खाने लगी । वह चुपचाप बैठा रहा । इतने में उसका पिता आ गया । उसने देखा तो गुस्से से बोला , ‘ ओ अंधे ! गाय आटा खा रही है । ‘ पुत्र ने जवाब दिया , ‘ तो क्या हो गया ! अगर दो – चार सेर खा जायेगी तो क्या घट जायेगा । हमारे पास बहुत है , कितना खा जायेगी ? हमारे कितने मकान हैं जिनका हमें किराया आता है और जो रकम हमने लोगों को उधार दे रखी है , उस से कितना ब्याज आता है । अगर गाय थोड़ा – सा आटा खा जायेगी तो क्या हुआ ? ‘ महाजन ने कहा , ‘ आज तू यह कहाँ से सीखकर आया है ? तुम अच्छी तरह समझ लो कि मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं है । ‘लड़के ने झट कहा , ‘ यह सत्संग में सुना था कि सबकी सेवा करनी चाहिए , किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए । ‘ यह सुनकर बाप ने आग बबूला होकर कहा , ‘ दोबारा कभी सत्संग में मत जाना । देख , मैं तीस साल से सत्संग सुनता आया हूँ पर मुझे सत्संग का एक भी शब्द याद नहीं । तूने ऐसा क्यों नहीं किया ? यह बात याद रखना कि सत्संग सुनने के बाद वहीं पल्ला झाड़कर आ जाना । मैं एक कान से सुनता हूँ और दूसरे से निकाल देता हूँ । ऐसी बातें पल्ले नहीं बाँधा करते । मेरी ओर देख । मुझे कितना समय हो गया है सत्संग में जाते , मैं हमेशा पल्ला झाड़कर चला आता हूँ । ‘
इसी तरह हम भी सत्संग सुनते हैं लेकिन अमल नहीं करते ।