
विद्यार्थी से आशा की जाती है कि स्कूल की वर्दी को लज्जित न करे । वह कोई ऐसा काम न करे जिससे स्कूल की बदनामी हो । सैनिक से आशा की जाती है कि युद्ध के मैदान में पीठ न दिखाए ताकि उसके देश की सेना का नाम बदनाम न हो । इसी प्रकार शिष्य , साधु या गुरु का भेष धारण करनेवाले से आशा की जाती है कि अपने गुरु और संप्रदाय का नाम बदनाम न करे , बल्कि ऐसी रहनी और करनी पर चले जिससे केवल उसका ही नहीं बल्कि उसके गुरु और उसके संप्रदाय का नाम भी रोशन हो ।
कबीर साहिब की वाणी है : गगन दमामा बाजिओ परिओ नीसानै घाउ ॥ खेत जो मांडिओ सूरमा अब जूझन को दाउ । सूरा सो पहिचानीऐ जो लरै दीन के हेत । पुरजा पुरजा कट मरै कबहू न छाडै खेत ॥
आप कहते हैं कि दसवें द्वार में शब्द का नगाड़ा बजता है सौ सच्चे साधक के हृदय पर चोट लगती है , वह ध्वनि उसे अपनी और बलपूर्वक खींचती है । उसे चाहिए कि उस ध्वनि की प्राप्ति के लिए तन मन से अभ्यास में जुट जाए । सच्चा सूरमा वही है जो परमात्मा के साथ मिलाप के धर्म की पूर्ति के लिए शब्द में सुरत लीन करने के लिए पूरा संघर्ष करता है । वह टुकड़े – टुकड़े हो जाता है यानी हर प्रकार की कुर्बानी देता है परंतु सुरत शब्द के अभ्यास के मैदाने- जंग में डटा रहता है ।
संत महात्माओं ने तीरों – तलवारों वाली शूरवीरता की ओर नहीं , बल्कि मन- इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने , माया को पैरों तले रौंदकर आत्मा को शब्द में अभेद करके शब्द का रूप हो जाने की शूरवीरता की ओर संकेत किया है । इसी में भेष की शोभा है और इसी में ज्ञान की बड़ाई है ।
चाल न जाने ज्ञान की , किये होय जो भेख । जग में भोजन मिलत है , अन्तकाल मुख रेष ॥१ ॥ भेष बना है चिन्ह को , भीख मिलै फिर भेख । निरंतर ज्ञान जहाँ नहीं , फिर चौरासी देख ।।
आप चेतावनी देते हैं कि जो लोग शिष्य या साधु का भेष धारण कर लेते हैं पर सतगुरु के उपदेशानुसार शब्द की कमाई नहीं करते तथा भाँति – भाँति के भोजन द्वारा लोगों से निजी सेवा करवाते हैं , अंत समय उनके मुँह में धूल पड़ती है । भेष का उद्देश्य सत्य की पहचान करना है जो शिष्य या साधु का पहनावा धारण करता है , उसे चाहिए कि अंतर में सत्य के दर्शन करने का यत्न करे । जो व्यक्ति भेष को अंतर्मुख ज्ञान और सत्य के निजी अनुभव का साधन नहीं बनाता , वह मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता और पुन : चौरासी के चक्कर में पड़कर अपमान करवाता है
ब्रह्मज्ञान चीन्हें नहीं , पढ़ि सुनि करै उपाधि । मोह कर्क छूटी नहीं , आशा धरै असाधि ॥11 ॥