ध्यान – साधना का लक्ष्यः आत्म – साक्षात्कार

उपनिषदों के अनुसार जप – तप , दान – पुण्य और धर्मग्रंथों के पठन – पाठन में परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती । उसे केवल ध्यान – साधना द्वारा अंतर्मुख होकर ही प्राप्त किया जा सकता है ।

न चक्षुधा गृहाते नापि वाचा नान्यैर्देवैः तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वः ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥

अर्थ:उसे समझा नहीं जा सकता , न नेत्रों से , न वाणी से और न ही किसी इंद्री द्वारा , न तप से और न ही पुण्य कर्मों के द्वारा । जब मन परम ज्ञान से स्थिर और निर्मल हो जाता है , तो ध्यान अभ्यास के द्वारा उस महान और अखंडनीय का साक्षात्कार होता है । मुण्डक उपनिषद् 3.1.8

ध्यान – साधना से परमात्मा का साक्षात्कार कैसे हो सकता है ? ध्यान साधना का मूल सिद्धांत है कि जैसा आप सोचते हैं , वैसे ही बन जाते हैं । शंकराचार्य का कथन है , ” यदि कोई व्यक्ति पूर्ण विश्वास और पूरी लगन से किसी वस्तु पर ध्यान केंद्रित करता है , तो वह वैसा ही बन जाता है । इस बात को भंगी और कीड़े के दृष्टांत द्वारा समझा जा सकता है । ” 10 श्रीमद्भागवतम् में इसका वर्णन इस प्रकार है : ” भृगी द्वारा पकड़ा कीड़ा निरंतर भी – भी की आवाज़ सुनता है । फलस्वरूप कीड़ा लगातार भुंगी के बारे में सोचते हुए भुंगी का रूप धारण कर लेता है । इसी प्रकार ध्यान साधना द्वारा जब साधक ध्यान को अंतर में केंद्रित करता है , तो ध्यान आत्मा को ढकनेवाले पाँच – कोशों को चीरकर अज्ञानता का नाश कर देता है और वह अंतर में ज्योतिर्मय परमात्मा के दर्शन करता है । इसके परिणामस्वरूप साधक का परम सत्य से मिलाप हो जाता है ।

तिलेषु तैले दधनीव सर्पिरापः स्रोतस्स्वरणीषु चाग्निः । एकमात्मात्मनि गृहातेऽसौ सत्येनैने तपसा योऽनुपश्यति ॥

जिस प्रकार तिलों में तेल होता है , दूध में घी , झरने में पानी तथा लकड़ी में अग्नि होती है , उसी प्रकार अंत : करण में परमात्मा का वास है । सच्चाई , आत्मसंयम और ध्यान द्वारा उसका साक्षात्कार करो । श्वेताश्वतर उपनिषद् 1.154

परमात्मा के साथ एक होने की इस अवस्था को भिन्न – भिन्न पद्धतियों में भिन्न – भिन्न नाम दिए गए हैं । वेदांत में इसे ‘ आत्म – बोध ‘ ; सांख्य और योग दर्शन में ‘ कैवल्य ” ; बौद्धधर्म में ‘ निर्वाण ” तथा ईसाई धर्म में परमात्मा के दिव्य – दर्शन कहा गया है ।

धर्मग्रंथों में परमात्मा के विषय में केवल कुछ संकेत और धारणाएँ मिल सकती हैं जबकि दर्शनशास्त्र सैद्धांतिक और प्राय : गूढ़ हैं । गहन समाधि की अवस्था में परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव ही उसके अस्तित्व , शक्ति तथा सर्वव्यापक ता के विषय में सभी संशयों को दूर कर सकता है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार संसार के सात आश्चर्यों कर बारे में दूसरे लोगों से सुनने और पर्यटन की पुस्तकों में पढ़ने के बजाय उन्हें प्रत्यक्ष देख लिया जाय।

मोक्ष के मार्ग ( वैदिक परम्परा के अनुसार) में से लिए गए अंश…..

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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