परमार्थ के मार्ग में साधक की चार अवस्थाएँ

” परमार्थ के मार्ग में साधक की चार अवस्थाएँ

1. कर्मकाण्ड या शरीयत : अच्छे कार्य करना जैसा कि संसार के सब धार्मिक ग्रन्थों में बताया गया है ।

2. उपासना या तरीक़त : किसी कामिल गुरु के आदेश और मार्ग – दर्शन के अनुसार परमार्थ के कार्य करना । मन और इन्द्रियों को वश में करना तथा अपने आप को ध्यान वगैरह दूसरी आध्यात्मिक क्रियाओं में लगाये रखना ।

3. भक्ति या मारफत : परमात्मा के प्यार में इतने लीन हो जाना कि सिवाय उसके और किसी बात की फ़िक्र ही न रहे , चित्त से संसार और संसार के पदार्थों के सब खयाल दूर हो जायें , पाँचों विकार ख़त्म हो जायें , मन और इन्द्रियों वश में आ जायें और संसार के सुखों तथा इन्द्रियों के भोगों की तृष्णा दूर हो जाये ।

4. ज्ञान या हक़ीक़त : सत्य या हक़ीक़त को जानना और परमात्मा के साथ एक हो जाना ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

8 thoughts on “परमार्थ के मार्ग में साधक की चार अवस्थाएँ

  1. परमात्मा के ध्यान में लीन हो जाना और इनके सिवा किसी और का फ़िक्र न करना ही बेहतरीन है लेकिन हमें परिवार की सदस्यों के लिए हमारे कर्तव्य भी करना चाहिए। तब हमें पूरी तरह से भगवान पर ध्यान नहीं लगा पा रहे हैं। सिर्फ एकांत में ही भगवान की ध्यान दे सकते हैं।

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    1. नहीं ऐसा नहीं है जी, बहुत संतो ने गृहस्थी मै रहते हुए भी परमात्मा को पाया है जैसे संत कबीर, गुरुनानक देव जी , संत नाम देव जी और भी बहुत संत है।
      संत नामदेव जी ने अपनी वाणी में लिखा है:
      “नामा कहें तिलोचना, मुख टे राम सम्हाल।
      हाथ पाऊ कर काम सब, चित निरंजन नाल।।

      चित्त को ही वहा लगाना है और हाथ पाउ से सारी ज़िम्मेदारी निभानी है।

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