
चौथी पातशाही श्री गुरु रामदास जी कहते हैं : कासट मह जिउ है बैसंतर मथ संजम काट कढीजै । राम नाम है जोत सबाई तत गुरमत काढ लईजै ॥
जिस तरह लकड़ी के अंदर अग्नि होती है , न अग्नि नज़र आती है , ही उस अग्नि से हम फ़ायदा उठा सकते हैं । जिस समय हम लकड़ी पर लकड़ी रगड़ते हैं , हम उस लकड़ी से अग्नि भी पैदा कर लेते हैं और अग्नि से फायदा भी उठा लेते हैं । इसी प्रकार वह राम – नाम की ज्योति हमारे सभी के अंदर यहाँ आँखों के पीछे जल रही है । वह चोरों के अंदर श्री जल रही है , साधुओं , संत – महात्माओं के अंदर भी जल रही है , लेकिन हम न उसको देख सकते हैं , न उससे फायदा उठा सकते हैं । जिस समय हम गुरुमुखों के कहने के अनुसार चलते हैं , उनके उपदेश पर चलते हैं , उस ज्योति के दर्शन भी कर लेते हैं , उससे फायदा उठाना भी शुरू कर देते हैं ।
very true.
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