मंजिल, मुसाफिर और सफ़र

🌻मंजिल, मुसाफिर और सफ़र

एक अनपढ़ गवांर आदमी जिसने कभी रेल्वे स्टेशन नही देखा हो और ना ही कभी ट्रेन का सफ़र तय किया हो ।
और अगर उसे दिल्ली जाना हो तो वो पहले रेलवे स्टेशन आता है , अब बेचारा कभी ट्रेन में सफ़र तो किया नही , और स्टेशन पर इतनी सारी ट्रेनों को देखकर सोच में पड़ जाता है की आखिर दिल्ली जाने के लिए कौन सी ट्रेन होगी और उसमे सफ़र कैसे किया जा सकता है । इसलिए वहाँ भटकते रहता है और वहाँ मोजूद भीड़ में एक एक से पूछने की कोशिश करता है। लेकिन सही और संतुष्टि भरा जवाब नही मिल पता ।
आखिर उस अनपढ़ गवांर मुसाफिर की ये हालात देखकर किसी संतजन पुरुष को उस पर तरस आता है और उस मुसाफिर से कहता है की भाई यहाँ तेरे सही सवालों के जवाब के लिए यहाँ इंक़्वायरी ऑफिस लगी है तू वहाँ जा वहाँ तुझे सफ़र तय करने की पूरी और सही जानकारी मिल जायेगी ।
फिर वो मुसाफिर उस इंक्वायरी ऑफिस से ये जानकारी मिलती है कि दिल्ली को कौन सी ट्रेन कब कहा से जाने वाली है।
और वहाँ उसे ये भी समझया जाता है कि तूने कभी ट्रेन का सफ़र नही किया है और तेरा ये सफ़र टिकट लिए बिना संभव ही नही है , इसके लिए तुझे टिकट मास्टर से टिकट लेनी पड़ेगी।
और फिर वो अनपढ़ गवांर मुसाफिर टिकट ले कर निर्देशित ट्रेन में बैठ जाता है और धीरे धीरे अपनी मंजिल की ओर बढ़ाता जाता है और सफ़र बड़ी आसानी से तय हो जाता है ।

अब विचार करें
वो अनपढ़ और गवांर मुसाफिर आदमी हम हैं, जो भटके हुए है मंजिल तो पता है लेकिन सफ़र कैसे तय करना ये नही पता ।

वो स्टेशन ये संसार है , जहाँ बहुत सारी भीड़ में हम ऐसे लोगों से उम्मीद करते हैं जिन्हें खुद की मन्ज़िल का भी पता नही है।

वो ट्रेन ये सिमरन भजन है जिसमें बैठे बगैर सफ़र तय असंभव है।

वो सफ़र रूहानियत है , निचे पैर के तलवों से शुरू हो कर धीरे धीरे ऊपर की ओर बढ़ कर आँखों के ऊपर खत्म होता है ।

वो मन्ज़िल जहाँ जाना है वो मालिक का घर है , जहाँ जाने के बाद कोई सफ़र नही होता ।

वो इंक्वायरी ऑफिस ये सत्संग है , जहां हमें अपनी मन्ज़िल की सारी बातों की सही जानकारी मिलती है, और वहीँ पर हमें सतगुरु की ओर इशारा मिलता है ।

वो स्टेशन(संसार) मास्टर सतगुरु है , यही वो असली जरिया है जिसकी मदद के बिना एक कदम भी नही चला जा सकता ।

और उनकी दी जाने वाली टिकट नाम दान है जिसके बिना रूहानियत का सफ़र तय करना ना नामुनकिन है, असंभव है ।

तो अगर हमें मन्ज़िल का भी पता है, टिकट भी मिल चुकी है और ट्रेन भी सामने ही खड़ी है तो भाई टिकट को हाथ में पकड़ कर ट्रेन को देखते रहने से सफ़र तय होने वाला नही ।
तो अब देर किस बात की है आईये आज से ही नाम रूपी टिकट से सिमरन भजन रूपी ट्रेन में आकर अपने असली सफ़र को चलें और मन्ज़िल पर पहुंचें

Published by Pradeep Th

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