मन की उत्पत्ति और स्वभाव।

हंसा मन की वृति कछु लखि न परै , कहि न जात कछु हरे हरे ॥ टेक ॥ 1 ॥ पांच तत्व मन मनहि तीन गुण , मन के रूप तेहुं लोक खरे ॥ 2 ॥ मन मसजिद अरु मनहि देवहरा , मनहिं देव मन सेव करै ॥ 3 ॥ पाप पुन्य मन आवागवन मन , मनहीं जन्म नौ बार धरै ॥ 4 ॥ ( शब्द 87 )

मदन साहिब कहते हैं : हे प्रभु ! मन का स्वभाव यानी इसकी वृत्ति और उसके कार्यों को समझ पाना असंभव है । मन को तीन गुणों और पाँच तत्त्वों के सतोगुणी अंश से उपजा माना जाता है इसलिए इसके अंदर तीन गुणों और पाँच तत्त्वों का गुण शामिल है । त्रिलोकी की मायामयी रचना तीन गुणों और पाँच तत्त्वों का पसारा है । मन , काल का ही रूप है । इसलिए काल या मन को त्रिलोकी का कर्ता कहने में कोई अंतर नहीं ।

वर्तमान अवस्था में मन आत्मा पर हावी है , इसलिए मन ही जीव को मंदिरों , मसजिदों आदि की ओर खींचता है और जीव मन की ही पूजा और सेवा में लगा हुआ है । जीव जो भी पुण्य – पाप करता है , मन के कहे अनुसार करता है । यह पुण्य – पाप ही जीवात्मा को आवागमन के बंधन में डाल देते हैं ।

योग जाप तप कर्म सबै मन , कर्म वृक्ष फल कर्म फरै ॥ 6 ॥ 1981-1 ( शब्द 87 )

मन ही जीव को जप – तप , पूजा – पाठ , योग – त्याग आदि अनेक प्रकार की बाहरमुखी भक्ति में उलझा देता है । जीव मन के कहे अनुसार किए कर्मों का फल भोगने के लिए विवश हो जाता है । आप समझा रहे हैं कि आत्मा तो निष्कर्मी है । मन , जीव के अंदर सांसारिक इच्छाएँ पैदा करके जीव को कर्म में प्रवृत्त कर देता है । जब जीव कर्म कर लेता है तो स्वाभाविक ही उनका फल भोगने के बंधन में पड़ जाता है । जब तक जीव मन के बंधन से के बंधन से मुक्त नहीं होता , यह आवागमन से भी मुक्त नहीं हो सकता ।

मदन साहिब इस शब्द के अंत में फ़रमाते हैं : मन माया दुइ नाम रूप एक , बिन चीन्हे जग भटकि मरै ॥ 9 ॥ मदन सन्त कोइ शब्द पारखी , मन को चीन्हि मिलि शब्द तरै ॥10 ॥ ( शब्द 87 )

आप कह रहे हैं कि मन और माया ये दो नाम अलग – अलग हैं , परंतु दोनों की प्रकृति एक है । जब तक जीव मन की पहचान नहीं करता , जब तक वह मन को वश में नहीं करता , तब तक वह सदा मायामय संसार में भटकता रहता है । जब वह शब्द द्वारा मन को पहचान लेता है और मन को वश में कर लेता है, तब जीवात्मा शब्द में लीन होकर भवसागर से पार हो जाती है। उस अवस्था में जीव मनमुख से गुरुमुख बन जाता है।

नोट:- शब्द या नाम के बारे में आप पिछली पोस्ट में पढ़ सकते है। यह पोस्ट के अंश, मदन साहिब रचित ग्रंथ (RSSB) में से लिया गया है।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

One thought on “मन की उत्पत्ति और स्वभाव।

Leave a reply to vermavkv Cancel reply

Design a site like this with WordPress.com
Get started