सतगुरू सबको देत हैं, लेता नाहीं कोए

यदि सालों साल भजन सिमरन करते हुए भी हमें आत्मिक आनंद और शांति नहीं मिल रही है, तो इसके कारणों की जाँच तो हमें अवश्य करनी चाहिये।
जैसे लोहा, यदि पारस को छू जाये तो फौरन सोना बन जाता है। लेकिन अगर लोहा खोटा हो या उस पर जँग लगी हुई हो तो लोहे और पारस के मिलन में जँग की रूकावट आ गई, जब लोहे ने पारस को छुआ ही नहीं तो पारस क्या करे, सोना कैसे बनाये ?
पलटू पारस क्या करै, जो लोहा खोटा होये
सतगुरू, सबको देत हैं, लेता नाहीं कोए
सन्त पलटू साहिब जी हमें शीशा दिखाते हुए चेता रहे हैं, कि हम सभी का मन खोटे लोहे की तरह है! दिखावा तो हम सच्चे गुरू भक्त होने का करते हैं, लेकिन मन पे विषय विकारों की खोट यानि मैल चढ़ी हुई है! फिर ये मैला मन सोना कैसे बने, निर्मल कैसे होवे?
सतगुरू दाता तो हर पल दातें बाँट रहे हैं, लेकिन अफसोस हमारे पास लेने का टाईम ही नहीं है
” हम निरगुणी, मनूर, अति फीके, मिल सतिगुर पारसु कीजै”
गुरू साहिब अपने हवाले से हमें समझा रहे हैं, कि हमारे अन्दर कोई भी गुण नहीं है! फिर हम तो लोहा भी नही हैं बल्कि मनूर, लोहे पर चढ़ी हुई जँग या मैल के समान हैं! ऐ मेरे सतगुरू आप ही दया करो और हमें भी अपना रूप बना लो!
पारस में अरु सन्त में, बड़ो अन्तरो जान
वो लोहा कँचन करै, ये कर ले आप समान
कबीर साहिब जी फरमाते हैं कि पारस में और सन्त सतगुरू में बड़ा भारी फर्क है, वो कैसे? पारस तो लोहे को केवल सोना बना सकता है! मगर सतगुरू अपने सेवकों को प्रेम और भक्ति की दात बख्श कर मालिक का रूप बना देते हैं
सतगुरू ने हमें सच्चे नाम का दान बख्शते समय अच्छी तरह से समझा दिया था, कि जीवन में पवित्र आचरण रखते हुए, सात्विक भोजन करना है, भजन सिमरन हर रोज़ करना है! लेकिन हमारी यादाश्त बड़ी कमज़ोर है, हमने तो अपने सतगुरू से किये हुए वायदे भी भुला दिये हैं! याद करो और वादे निभाओ, तभी हम अपने सच्चे घर सचखण्ड जा पायेंगें, जो भी सेवक करनी में लगता है, वो अपने सतगुरू की रहमतों को पल पल महसूस करता है! सच्ची खुशी और आनन्द हासिल कर लेता है!
लोक सुखीऐ, परलोक सुहेले
नानक, हरि प्रभ, आपहि मेले।
गुरू के कहने पर जो चलता है उसका लोक यानी संसार में भी सुखी हो जाता है और परलोक यानी जहा हमे जाना है हमारे असल घर(जहा जन्म मरण का चक्कर नही है) वो भी सुखी हो जाता है। गुरू की बताई सहज भक्ति से प्रभु से मिलाप हो जाता है।