जब एक मटका खरीदा जाता है तो उसे पत्थर से बजाके परखा जाता है।पर यदि उस पत्थर की जगह मिट्टी के ठेलें से मटके को बजाया जाए तो मटके से पहले वह मिट्टी का ठेला टूट कर बिखर जाएगा।गुरु को परखने के पहले सिख को मजबूत पत्थर बनना होगा।हमारा तो ख़ुद का विश्वास मिट्टी की तरह कच्चा है और गुरु को परखने निकले हैं।पहले हमें पत्थर के जैसा बनना होगा चाहे कर्मों की कितनी भी मार पड़े पर अपने गुरु से विश्वास नहीं डोलना चाहिए ।चाहे कर्मों की वजह से कितने दुख आ जाए पर अपने गुरु में विश्वास अटल रखना है तभी गुरु की बख्शीश और विश्वास प्राप्त होगा।जो पत्थर हथौड़े की मार सहता है वही पूजने योग्य बनता है। जो सोना भट्टी में जलता है वही गहना बनकर पहनने लायक होता है।इसलिए जब भी कोई दुख आये तकलीफ आये समझ लेना गुरु हमें परख रहा है।हमारी कमजोरी यही है कि हम गुरु को तो मानते हैं पर गुरु की नहीं मानते और गुरु की मानना है ही सच्ची भक्ति करना,अमृतवेले उठना,नाम जपना, जो गुरु की यह बात मानेगा उसे संसार का कोई दुख हिला नहीं सकेगा। फिर उसे इस लोक के सुख प्राप्त होता है और परलोक भी जाने का रास्ता तैयार होता है , इसलिए गुरु की मानो अमृतवेला संभालो अपने गुरु पे अटूट विश्वास रखो, गुरु चाहे लाड़ करे सुख दे या दुख दे विश्वास पक्का रखो…।
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