बाज़ीगर और कठपुतलियांँ

जिस बाज़ीगर (परमात्मा) ने कठपुतलियों का खेल रचा होता है वे सारी कठपुतलियाँ उसके थैले में होती है वह अपनी कठपुतलियों को थैलें में से बाहर निकालता है और उनको टेबल पर यानी दुनिया में सजाकर खुद परदे के पीछे बैठ जाता है हर कठपुतली एक डोर से बँधी होती है पर समस्या यह है कि कठपुतली यह नहीं समझती कि वह कठपुतली है कठपुतली इस बात से बेखबर है कि वह एक डोर से बँधी है जिसे कोई परदे के पीछे बैठा खींच रहा है उसे इसका जरा भी एहसास नहीं हैं कठपुतली को अपने नाचने का अहंकार है आज हमारी भी यही हालत है हम सब जीव मालिक के हाथ की कठपुतलियाँ है हम सब अपने कर्मों के अनुसार नाच रहे हैं और हम सोच लेते हैं कि हमें कौन नचा सकता है हम सोचते हैं कि मैंने यह किया मैंने वह किया हमें इसका कोई ज्ञान नहीं है कि असल में कौन हमसे यह सबकुछ करवा रहा है आज हमने अपने अंदर इतनी हौंमैं पैदा कर ली है कि हम समझने लगे हैं कि मैं अपने बलबूते पर ही ऐसा सोच रहा हुँ और मैंने खुद ही सबकुछ किया है जो भी जीव जन्म लेते हैं वे सभी नाच रहे हैं पर जिन्हें यह ज्ञान हो जाता है कि उनके पीछे डोर है और परदे के पीछे नचानेवाला बैठा है तो वह कठपुतली उसके हुक्म के अनुसार नाचती हैं केवल गुरुमुखों को भजन सिमरन द्वारा यह ज्ञान हो जाता है कि वह मालिक ही हमें इस संसार में नचा रहा है। बाकि सब इसी बुलावे में जीवन जीते है कि मैं कर रहा हु। जब कि सच कुछ और ही होता है।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

3 thoughts on “बाज़ीगर और कठपुतलियांँ

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started