असली मंदिर और मस्जिद

हर मंदर एह सरीर है, गियान रतन प्रगट होई।। (आदि ग्रंथ पृष्ठ स 1346) हमारा शरीर ही मालिक के रहने का असली हरि मंदिर है और उस मालिक का असली ज्ञान उसी के अंदर से प्राप्त हो सकता है तुलसी साहिब हाथरस वाले फरमाते है (संत बानी पृष्ठ स ४४) नकली मंदिर मस्जिदों में जायContinue reading “असली मंदिर और मस्जिद”

कौन है मेरा रिश्तेदार या मित्र?

संत हमेशा से हमे रिश्तों की असलियत समझाते है, ताकि हम इनके मोह में फसकर संसार में आने के अपने असल उद्देश्य को न भुला दे। आदि ग्रंथ (पृष्ठ स 700) पर गुरु अर्जुनदेव जी फरमाते है कोई जाने कवन ईहा जग मीत।। जिस होई कृपाल सोई बिधि बुझे ता की निर्मल रीति।। मात पिताContinue reading “कौन है मेरा रिश्तेदार या मित्र?”

गलत यात्रा (wrong path)

अगर दिन में जब आप किसी भी समस्या का सामना नहीं करते है तो – आप यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि आप गलत रास्ते पर चल कर रहे हैं।”  – स्वामी विवेकानंद आज सुबह ये सुंदर विचार पढ़ा तो सोचा आपके साथ सांझा करू। स्वामी विवेकानन्द जी कहते है कि अगर हमारी जिंदगी बहुतContinue reading “गलत यात्रा (wrong path)”

क्यों कोसता है खुद को

क्यों कोसता है खुद को संतों की एक सभा चल रही थी,किसी ने एक दिन एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संत जन जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सके। संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था। उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचारContinue reading “क्यों कोसता है खुद को”

तीर्थ आद्यात्म की नजर से

संत महात्मा प्रभु की प्राप्ति के लिए मन की निर्मलता का उपदेश देते है। हम इसके लिए आसान से आसान साधन ढूंढने की कोशिश करते है। हम समझते है कि तीर्थो में स्नान करने से मन निर्मल हो जाएगा और हम प्रभु मिलाप करने में सफल हो जायेगे। पर ऐसा सोचना ठीक नहीं है। तीर्थContinue reading “तीर्थ आद्यात्म की नजर से”

जाति- पाति आध्यात्म की नजर से

संतो महात्माओं ने हमेशा से एकता का उपदेश दिया है। वे हमको हर प्रकार के द्वैत से ऊपर उठकर समदर्शी बनने का उपदेश देते है। संत महात्मा समझाते है कि परमात्मा ने सब इंसान एक जैसे बनाए है। मजहब, मुल्क, कोम, नस्ल और जाति पाति के सब तरह के भेद भाव इंसान के बनाए हुएContinue reading “जाति- पाति आध्यात्म की नजर से”

मन क्या है? इसे कैसे जीते?

मन की रचना के बारे में गुरु नानक साहिब फरमाते है (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ४१५) ईह मन करमा ईह मन धरमा।। ईह मन पंच तत ते जनमा।। कबीर साहिब कहते है: (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ३४२) ईह मन सकती ईह मन सीउ।।ईह मन पंच तत को जीउ।। गुरु नानक साहिब और कबीर साहिब यहContinue reading “मन क्या है? इसे कैसे जीते?”

Design a site like this with WordPress.com
Get started