डल्ला की परीक्षा

मैं तेरी चितौनियों में उलझा हुआ हूँ , हे प्रभु ! मुझे शर्मिंदा न होने दे । जब तू मेरी सूझ बढ़ायेगा , तब मैं तेरे हुक्म अनुसार चलूँगा । साम्ज़

ज़िक्र है कि मुसलमानों की हुकूमत के दिनों में एक ऐसा समय आया जब गुरु गोबिन्द सिंह जी को मजबूरन आनन्दपुर छोड़ना पड़ा । बराड़ क़ौम का सरदार डल्ला गुरु साहिब से मिला और बोला , ‘ महाराज ! अगर आप हमें ख़बर करते तो हम आकर मुसलमानों से मुक़ाबला करते , आपको आनन्दपुर नहीं छोड़ना पड़ता । ‘ गुरु साहिब ने उसे कहा , ‘ जो मालिक का हुक्म । ‘ डल्ला ने कहा , ‘ नहीं जी , आप बताते तो सही । ‘

उन दिनों तोड़ेदार बंदूकें होती थीं । इसी तरह पत्थर कला बंदूकें भी होती थीं जो सबसे अच्छी समझी जाती थीं । उसका घोड़ा पहले पत्थर पर पड़ता था जिसमें से आग निकलती थी , फिर गोली चलती थी । एक सिक्ख , गुरु साहिब के पास एक बड़ी अच्छी नयी क़िस्म की ‘ पत्थर कला ‘ बंदूक़ बनाकर लाया । गुरु साहिब ने कहा , ‘ किस पर आज़माएँ ? इसके आज़माने के लिए आदमी ही ठीक रहेगा । ‘ फिर डल्ला को कहा , ‘ कोई आदमी खड़ा करो जिस पर बंदूक़ आज़माएँ । ‘ जब डल्ला ने अपने आदमियों से पूछा तो कोई भी मरने के लिए तैयार नहीं था । चाहे गुरु साहिब ने मारना किसी को नहीं था , सिर्फ़ आज़माना ही था लेकिन कोई न आया । जब कोई न आया तो गुरु साहिब ने कहा , ‘ डल्ला ! तू ही आ । ‘ डल्ला बोला , ‘ जी , मेरे छोटे – छोटे बच्चे हैं , वे पीछे क्या करेंगे ! ‘ गुरु साहिब ने कहा , ‘ बस ? ऐसे ही कहता था कि ख़बर करते तो आनन्दपुर न छोड़ना पड़ता ? ‘ डल्ला शर्मिंदा हो गया ।

फिर गुरु साहिब ने हुक्म दिया कि अच्छा जाओ और घोड़ों के तबेले में मेरा जो भी आदमी मिले उससे कहना कि गुरु साहिब के पास एक बंदूक आयी है , उसके निशाने के लिए एक आदमी चाहिए । जब डल्ला ने जाकर कहा तो जो जिस हालत में था उसी तरह उठ भागा , कोई बालों में कंघी करता भागा , कोई साफ़ा बाँधता हुआ भागा तो कोई धोती पहनता हुआ । हरएक आदमी दूसरों की कारगुज़ारी बताकर कि यह घोड़ों की बड़ी सेवा करता है , इसने चमकौर के युद्ध में बड़ी मदद की थी , इसने अमुक काम किया था या अमुक काम का जानकार है , यही कहता कि इसको न मारो बल्कि मुझे निशाना बनाओ । इसके बाद गुरु साहिब ने सबको एक लाइन में एक दूसरे के आगे – पीछे खड़ा करके बंदूक़ की गोली ऊपर से निकाल दी । मारना तो किसे था , सिर्फ़ इम्तिहान लेना था । डल्ला बहुत पछताया और बोला ‘ अगर मुझे पता होता कि गुरु साहिब ने सिर्फ़ आज़माना ही था , मारना नहीं था , तो मैं भी अपने आप को पेश कर देता । ‘ इम्तिहान में कोई – कोई ही पास होता है । मालिक कभी किसी का भी इम्तिहान न ले ।

किसका सेवक ?

कुटुम्ब परिवार मतलब का । बिना धन पास नहिं आई।।स्वामी जी महाराज

गुरु गोबिन्द सिंह जी का दरबार लगा हुआ था । सिक्खी का मज़मून चल रहा था । गुरु साहिब ने कहा कि गुरु का शिष्य कोई – कोई है , बाक़ी सब अपने मन के गुलाम हैं या स्त्री और बच्चों के गुलाम हैं ।

एक शिष्य को आज़माते हुए , जो अपने आप को बड़ा भक्त ज़ाहिर करता था , कहने लगे कि हमें कपड़े के थान की ज़रूरत है । शिष्य ने अगले दिन दरबार में हाज़िर करने का वायदा किया ।

जब माथा टेककर वह शहर गया और कपड़ा ख़रीदकर घर लौटा , तो उसकी स्त्री ने पूछा , ‘ यह कपड़ा कैसा है ? ‘ उसने उत्तर दिया कि गुरु साहिब के लिए ख़रीदा है । कल इसे दरबार में देना है । वह बोली , ‘ यह तो मैं नहीं दूंगी । बाल – बच्चों के लिए ज़रूरत है । कपड़ा बहुत अच्छा है , गुरु साहिब के लिए और ले आना । ‘ उसने कहा , ‘ दुकानदार के पास तो यही एक थान था । इसके साथ का और कपड़ा नहीं है । ‘ इस पर वह बोली , ‘ तब तो मैं इसको ज़रूर रखूगी । ‘ उसने पूरी कोशिश की , लेकिन स्त्री के सामने उसकी एक न चली । उसने यह कहकर टाल दिया कि गुरु साहिब को क्या पता है ? कल जब पूछेगे तो कह देना कि अभी पसंद का कपड़ा नहीं मिला । वह चुप हो गया ।

अगले दिन जब दरबार में गया , तब गुरु साहिब ने पूछा , ‘ कपड़ा लाये हो ? ‘ बोला , ‘ जी नहीं ! अभी नहीं मिला । ‘

शिष्य अपने गुरु को तन और धन दोनों सौंप देता है लेकिन मन का सौंपना बहुत मुश्किल है । अगर गुरु को मन सौंप दे तो गुरुमुख बन जाये ।

मन बेचै सतगुर के पास ॥ तिस सेवक के कारज रास ॥

झूठे वायदों की सज़ा

अनेक लोग अपने ज्ञान का प्रदर्शन करके अपनी प्रशंसा करवाने का प्रयास करते हैं पर वे धन्य हैं जिन्होंने प्रभु प्रेम के लिए अपने मन को अन्य सभी इच्छाओं से ख़ाली कर दिया है ।सेंट फ्रांसिस ऑफ़ असिसी

ज़िक्र है कि बुल्लेशाह बड़ा आलिम – फ़ाज़िल था । चालीस साल खोज की , बहुत – से शास्त्र और धार्मिक किताबें पढ़ीं , अनेक महात्माओं और नेक लोगों से वार्तालाप किया लेकिन कुछ हासिल न हुआ । आख़िर उसको एक मित्र ने जो परमार्थ में काफ़ी आगे था और जिसे बुल्लेशाह की हालत का ज्ञान था , कहा , ‘ भाई साहिब , किताबों से क्यों माथापच्ची करते हो , ये सब बेकार हैं । इनायत शाह के पास जाओ । शायद वह परमार्थी खोज में तुम्हारी मदद कर सकें । ‘ जब उनके पास गया , उन्होंने रास्ता बताया तो अंदर परदा खुल गया । परदा तो खुलना ही था , क्योंकि अंदर प्रेम था ।

जब परदा खुला तो उसने वे कार्य किये , जिनको बाहर की आँखें रखनेवाले लोग अनुचित समझते हैं क्योंकि मुल्ला और क़ाज़ी तो शरीअत को ही परमार्थ समझते हैं पर सच्चे या आंतरिक भेद के बारे में वे बिलकुल बेख़बर हैं । जब शरीअतवाले लोगों ने सुना तो कहा कि यह कुफ्र कर रहा है । इस पर फ़तवा लगाना चाहिए । सारे इकट्ठे होकर बुल्लेशाह के पास गये और कहा कि तुम ऐसी बातें करते हो जो शरीअत के विरुद्ध हैं । क्या आप अपने पक्ष में कुछ कहना चाहते हो ?

बुल्लेशाह ने कहा , ‘ पहले आप मेरे एक मुक़द्दमे का फ़ैसला कर दो , फिर जो आपकी मरज़ी हो करना । ‘ उन्होंने पूछा , ‘ तेरा मुक़द्दमा क्या है ? ‘ तब बुल्लेशाह ने कहा , ‘ अगर कोई आदमी रोज़ कहे कि मैं अमुक चीज़ तुझे आज दूंगा , कल दूंगा , यहाँ से दूँगा , वहाँ से दूंगा , लेकिन दे कुछ न ,बल्कि चालीस साल इसी तरह टालता रहे , आप उस पर क्या फ़तवा लगाओगे ? ‘ वे कहने लगे , ‘ ऐसे व्यक्ति को जिंदा जला देना चाहिए । ‘ यह सुनकर बुल्लेशाह ने कहा कि वह ये किताबें हैं । इन शरीअतवालों ने चालीस साल वायदे किये लेकिन दिया कुछ नहीं । सब ला – जवाब होकर अपने – अपने घर चले गये । तब बुल्लेशाह ने कहा :

इल्मों बस करीं ओ यार ।… इक्को अलफ़ तेरे दरकार ।

परमार्थ में इल्म की नहीं , प्रेम और अमल की ज़रूरत है ।

प्रेम से प्रेम , घृणा से घृणा

परमात्मा प्रेम है । जो प्रेम में डूबा हुआ है , वह परमात्मा में समाया हुआ है , और परमात्मा उसमें समाया हुआ है । सेंट जॉन

कहते हैं कि एक बार अकबर बादशाह और बीरबल कहीं जा रहे थे । कुछ फ़ासले पर उन्हें एक जाट आता नज़र आया । अकबर बादशाह ने बीरबल से कहा कि इसे देखकर अचानक मेरा मन कहता है कि इसे गोली मार दूं । देखें उसके दिल में मेरे लिए क्या विचार आते हैं ? जब वह जाट उनके नज़दीक आया तो बीरबल ने बादशाह की ओर इशारा करते हुए उस जाट से पूछा कि भाई , डरो न , सच – सच बताओ , जब तेरी नज़र इस आदमी पर पड़ी तो तेरे मन में क्या ख़याल आया था ? उस जाट ने कहा कि मेरा दिल चाहता था कि इस आदमी की दाढ़ी खींच लूँ । इस ख़याल की तरजुमानी ( पुष्टि ) हो गयी कि दिल को दिल से राह होती है ।

इसलिए कहते हैं कि अगर शिष्य गुरु को प्यार करेगा तो गुरु भी ज़रूर उसे प्यार करेगा ।

एक कान से सुनना , दूसरे से निकाल देना

उस प्रभु ने अपार कृपा करके आपको एक ऐसी उत्तम दात बख्शी है जिसके सामने इस संसार की सारी धन – दौलत तुच्छ है । पर इस दात का लाभ आपको तभी पहुँचेगा जब आप उसका अभ्यास करेंगे । महाराज सावन सिंह

दिल्ली में एक महाजन था । उसे साधु – संतों के सत्संग सुनने का बहुत शौक था । वह रोज़ सत्संग में जाता और अपने लड़के को दुकान पर छोड़ जाता । एक दिन उसके लड़के ने कहा , ‘ पिता जी , आप बिना नागा सत्संग सुनने जाते हो , आपको इससे अवश्य आनंद आता होगा । एक दिन मुझे भी सत्संग में जाने की आज्ञा देना और आप दुकान पर रहना । मेरा मन भी करता है कि देखू सत्संग कैसा होता है ? ”

पिता ने कहा , ‘ क्यों नहीं , तुम भी ज़रूर जाना । तुम्हें भी इसमें आनंद आयेगा ।

जब लड़का सत्संग में गया तो वहाँ महात्मा ने वचन कहे , ‘ सबकी सेवा करनी चाहिए , कभी किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए । ‘ वह सत्संग सुनकर दुकान पर आ गया । बाज़ार में गायें फिरती रहती थीं । एक गाय आकर आटा खाने लगी । वह चुपचाप बैठा रहा । इतने में उसका पिता आ गया । उसने देखा तो गुस्से से बोला , ‘ ओ अंधे ! गाय आटा खा रही है । ‘ पुत्र ने जवाब दिया , ‘ तो क्या हो गया ! अगर दो – चार सेर खा जायेगी तो क्या घट जायेगा । हमारे पास बहुत है , कितना खा जायेगी ? हमारे कितने मकान हैं जिनका हमें किराया आता है और जो रकम हमने लोगों को उधार दे रखी है , उस से कितना ब्याज आता है । अगर गाय थोड़ा – सा आटा खा जायेगी तो क्या हुआ ? ‘ महाजन ने कहा , ‘ आज तू यह कहाँ से सीखकर आया है ? तुम अच्छी तरह समझ लो कि मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं है । ‘लड़के ने झट कहा , ‘ यह सत्संग में सुना था कि सबकी सेवा करनी चाहिए , किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए । ‘ यह सुनकर बाप ने आग बबूला होकर कहा , ‘ दोबारा कभी सत्संग में मत जाना । देख , मैं तीस साल से सत्संग सुनता आया हूँ पर मुझे सत्संग का एक भी शब्द याद नहीं । तूने ऐसा क्यों नहीं किया ? यह बात याद रखना कि सत्संग सुनने के बाद वहीं पल्ला झाड़कर आ जाना । मैं एक कान से सुनता हूँ और दूसरे से निकाल देता हूँ । ऐसी बातें पल्ले नहीं बाँधा करते । मेरी ओर देख । मुझे कितना समय हो गया है सत्संग में जाते , मैं हमेशा पल्ला झाड़कर चला आता हूँ । ‘

इसी तरह हम भी सत्संग सुनते हैं लेकिन अमल नहीं करते ।

ईश्वर के दर्शन क्यो नहीं होते ?

एक महात्मा के पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं का समाधान पाने के लिए आते थे।


एक बार एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला,’महाराज, मैं लंबे समय से ईश्वर की भक्ति कर रहा हूं, फिर भी मुझे ईश्वर के दर्शन नहीं होते। कृपया मुझे उनके दर्शन कराइए।’
महात्मा बोले,–‘तुम्हें इस संसार में कौन सी चीजें सबसे अधिक प्रिय हैं ?’
व्यक्ति बोला,’महाराज, मुझे इस संसार में सबसे अधिक प्रिय अपना परिवार है और उसके बाद धन-दौलत।’
महात्मा ने पूछा,’क्या इस समय भी तुम्हारे पास कोई प्रिय वस्तु है?’
व्यक्ति बोला,’मेरे पास एक सोने का सिक्का है जो मेरी प्रिय वस्तु है।’
महात्मा ने एक कागज पर कुछ लिखकर दिया और उससे पढ़ने को कहा। कागज देखकर व्यक्ति बोला,’महाराज, इस पर तो ईश्वर लिखा है।’
महात्मा ने कहा,’अब अपना सोने का
सिक्का इस कागज के ऊपर लिखे ईश्वर पर रख दो।’ व्यक्ति ने ऐसा ही किया।
फिर महात्मा बोले,’अब तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?’ वह बोला,’इस समय तो मुझे इस कागज पर केवल सोने का सिक्का रखा दिखाई दे रहा है।’


महात्मा ने कहा,’ईश्वर का भी यही हाल है। वह हमारे अंदर ही है, लेकिन मोह-माया के कारण हम उसके दर्शन नहीं कर पाते। जब हम उसे देखने की कोशिश करते हैं तो मोह-माया आगे आ जाती है। धन-संपत्ति, घर-परिवार के सामने ईश्वर को देखने का समय ही नहीं होता। यदि समय होता भी है तो उस समय जब विपदा होती है। ऐसे में ईश्वर के दर्शन कैसे होंगे?’
महात्मा की बातें सुनकर व्यक्ति समझ गया कि उसे मोह-माया से निकलना है !!

इसलिये “गुरु चरणी चित्त ला बंदया

चार राम

जग में चारों राम हैं , तीन राम व्यवहार । एक्कारमा चौथा राम निज सार है , ताका करो विचार ॥ एक राम दशरथ घर डोलै , एक राम घट घट में बोले । एक राम का सकल पसारा , एक राम त्रिभुवन ते न्यारा ॥ कबीर समग्र , भाग 1 , पृ .462

एक राम तो राजा दशरथ के पुत्र रामचंद्र जी का नाम है , दूसरा राम मन है जो घट – घट के अंदर है , तीसरा राम काल है जिसका यह त्रिलोकी या तीनों गुणों का पसारा है और चौथा राम इन सबसे और त्रिगुणों ( तीनों गुणों ) से न्यारा है ।

तीन लोकों का सब कोई ध्यान करते हैं , पर चौथे देव का मर्म कोई नहीं जानता :

तीन देव को सब कोई ध्यावे, चोथा देव का मरम न पावै।। कबीर समग्र , भाग 1 , पृ .461

सारा जहान तीनों गुणों की भक्ति में लगा हुआ है । सतनाम के बगैर जीव भूला पड़ा है , सतनाम के बगैर वह भवसागर से कैसे पार हो सकता है ?

तीन गुनन की भक्ति में , भूलि पर्यो संसार । कह कबीर निज नाम बिनु , कैसे उतरै पार ॥ कबीर साखी – संग्रह , पृ .104

यह ‘ राम ‘ वास्तव में सतनाम यानी सत्पुरुष है । यही चौथा पद है जिसकी ओर संत संकेत करते हैं और जिसको अपना आदर्श मानते हैं ।

काल या धर्म राए इसी अकालपुरुष , राम राए यानी सत्पुरुष के हुक्म में कार्य कर रहा है । सत्पुरुष के अवतार , संतजन भी इस संसार में काम कर रहे हैं , पर उनका काम आत्माओं को सत्पुरुष की गोद में पहुँचाने का है ।

राम राए अलख है , उसके मिलाप से अटल सुहाग मिलता है । राम राए की प्राप्ति सत्संग , सतगुरु और शब्द के अभ्यास द्वारा होती है । ब्रह्मज्ञान के बिना उसकी प्राप्ति कठिन है । राम राए का मिलाप सहज अवस्था में ही होता है । उसकी प्राप्ति से सब दु : खों का नाश हो जाता है , यम पास नहीं फटकता और निर्भय पद की प्राप्ति होती है राम राए घट – घट में रम रहा है और वह हरि यानी स्वामी का ही रूप है ।

फटा कुर्ता

वह हमारी सब अच्छाइयों और बुराइयों को जानता है । उससे कुछ भी छिपा नहीं है । वह जानता है कि हमारे रोग की दवा क्या है और हम पापियों का उद्धार कैसे हो सकता है । दीन बनो , क्योंकि वह दीनों पर दया करता है । अन्सारी ऑफ़ हैरात

हजरत यूसुफ़ जिसको बाइबल में जोसफ़ कहा गया है , बहुत सुंदर और बुद्धिमान था । उसके बड़े भाई उससे ईर्ष्या करते थे । दरअसल वे उससे घृणा करते थे क्योंकि वह बचपन से ही हर क्षेत्र में उनसे आगे रहता था । इस ईर्ष्या के कारण उन्होंने एक योजना बनायी कि उसे एक गुलामों के व्यापारी के पास बेच दिया जाये । उस व्यापारी ने उसे खरीदकर , एक बड़ी रक़म लेकर उसे मिस्र के बादशाह के पास बेच दिया ।

उस बादशाह की बेगम का नाम था जुलेखा । हज़रत यूसुफ़ की शक्ल देखकर वह उस पर मोहित हो गयी । एक दिन वह हज़रत यूसुफ़ को अपने महल के अंदर ले गयी , बाहर से दरवाज़े बंद कर दिये और अपना बुरा विचार प्रकट किया । अब हज़रत यूसुफ़ ने सोचा कि एक ओर तो मेरा ईमान जाता है और मालिक की दरगाह से सज़ा मिलती है , दूसरी ओर यह बादशाह की बेगम है , अगर इसका कहना नहीं मानता तो यह मुझ पर झूठा इलज़ाम लगाकर सुबह मुझे मरवा देगी , इसलिए मैं करूँ तो क्या करूँ ? यह सोच ही रहा था कि जुलेखा ने वहाँ पड़ी पत्थर की मूर्ति पर कपड़ा डालकर उसे ढक दिया ।

वह पत्थर की मूर्ति की पूजा किया करती थी । हज़रत यूसुफ़ ने देखा तो पूछा , ‘ यह क्या है ? ‘ उसने कहा , ‘ यह मेरा देवता है । मैं इसकी पूजा करती हूँ , इसलिए परदा डाला है ताकि यह देख न ले । ‘

हज़रत यूसुफ़ ने कहा , ‘ जिसकी तू पूजा करती है उसके ऊपर तो कपड़ा डाल दिया , वह तो अब नहीं देखता , लेकिन जो मेरा खुदा है वह तो हर जगह मौजूद है , सब कुछ देखता है । ‘ यह कहकर वह बाहर की ओर भागा । जुलेखा ने पीछे से कुर्ता पकड़ा , कुर्ता फट गया , लेकिन वह दौड़कर बाहर निकल गया ।

जुलेखा ने अपने पति बादशाह से शिकायत की कि यूसुफ़ ने मुझे छुआ है , यह बदमाश है , इसे फाँसी पर चढ़ा दो । बादशाह दुविधा में पड़ गया कि रानी की बात का यकीन करे कि उस सुंदर गुलाम का । इसलिए उसने तहक़ीक़ात की । यूसुफ़ से पूछा । उसने सच – सच बता दिया । फिर बादशाह ने अपने अमीरों , वज़ीरों से सलाह ली , तो उन्होंने कहा कि इसका एक ही पक्का सबूत है । बादशाह ने पूछा कि वह क्या ? उन्होंने कहा कि अगर कुर्ता आगे से फटा है तो यूसुफ़ की ग़लती है , अगर पीछे से फटा है तो यूसुफ़ भागा है और जुलेखा ने कुर्ता पकड़ा है , तब वह फटा है । जब देखा , पता चला कि उसका कुर्ता पीछे से फटा हुआ था । अब जुलेखा की शर्मनाक हरकत साबित हो गयी और हज़रत यूसुफ़ को छोड़ दिया गया ।

अगर हमारे अंदर यह ख़याल पक्का हो जाये कि वाक़ई ख़ुदा हर जगह हाज़िर – नाज़िर है , तो दुनिया में बहुत से बुरे कर्मों में कमी हो जाये ।

कबीर साहिब द्वारा राजा की परीक्षा

जब आप नौ दरवाज़ों को छोड़कर ब्रह्म , पारब्रह्म में जायेंगे तो आपको पता लग जायेगा कि गुरु क्या है और क्या देता है ।अगर अंदर जाकर देख लो तो यक़ीन पुख़्ता हो जायेगा ।महाराज सावन सिंह

कबीर साहिब जुलाहा थे । राजा बीर सिंह राजपूत उनका सेवक था । उसका उनके साथ बहुत प्यार था । जब कबीर साहिब उसके पास आते थे तो वह तख़्त छोड़ देता , कबीर साहिब को ऊपर बैठाता और आप नीचे बैठता । एक बार कबीर साहिब ने राजा को आज़माना चाहा । एक वेश्या थी जिसने अपना पेशा छोड़कर कबीर साहिब की शरण ले ली थी । एक तरफ़ उसको लिया , दूसरी तरफ़ संत रविदास जी को लिया , दोनों हाथों में शराब जैसे रंगदार पानी की बोतलें पकड़ लीं और काशी के बाज़ारों में झूमते हुए शब्द पढ़ते निकले । चूँकि हिंदू और मुसलमान दोनों जातियाँ उनके विरुद्ध थीं , इसलिए शोर मच गया । लोग कहने लगे कि एक तरफ़ वेश्या और दूसरी ओर जूतियाँ गाँठनेवाला रविदास है , हाथों में शराब की बोतलें हैं ! कबीर साहिब इसी तरह राज – दरबार में पहुँच गये । जब राजा ने कबीर साहिब को इस हालत में देखा तो अभाव आ गया , तख़्त से नहीं उठा । कबीर साहिब ने सोचा कि यह तो गिर गया है , अभी सँभाल लें , नहीं तो मुश्किल हो जायेगी । उन्होंने दोनों बोतलें पैरों पर उड़ेल लीं ।

जब राजा ने यह देखा तो सोचने लगा कि शराबी कभी अपनी शराब नहीं गिराता , यह शराब नहीं , कोई और चीज़ है । तख़्त से उतरा और संत रविदास से पूछा , ‘ महाराज ! यह क्या कौतुक है ? ‘ उन्होंने कहा कि तू अंधा है , तुझे पता ही नहीं । जगन्नाथ के मंदिर में आग लग गयी है , कबीर साहिब उसे बुझा रहे हैं । राजा ने तारीख़ और वक़्त नोट कर लिया और इसका पता लगाने के लिए दो साँड़नी सवार भेजे । जब वे वहाँ पहुँचे और मालूम किया , तो लोगों ने कहा , ‘ ठीक है , आग लगी थी और कबीर साहिब बुझा रहे थे । ‘ राजा का विश्वास पक्का हो गया ।

ऐसे मौक़े पर बड़े – बड़े अभ्यासी लोक – लाज में बह जाते हैं । गुरु की कृपा से कोई – कोई प्रेमी ही ऐसी परीक्षा में खरा उतरता है । यह आसान बात नहीं ।

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