मूर्ख को समझाना बेकार

उन जैसा बहरा और कौन हो सकता है जो सुनेंगे नहीं ।। कहावत

एक बार किसी मूर्ख व्यापारी ने एक घोड़े पर एक तरफ़ दो मन गेहूँ लाद दिया तथा दूसरी ओर दो मन रेत डाल ली ताकि बोझ बराबर हो जाये और घोड़े को तकलीफ़ न हो । एक ग़रीब आदमी ने , जो उसे बोझ लादते देख रहा था , पूछा , ‘ श्रीमान यह आप क्या कर रहे हैं ? ‘ व्यापारी बोला , ‘ एक तरफ़ गेहूँ और दूसरी तरफ़ भार बराबर करने के लिए रेत है । ‘ वह आदमी कहने लगा कि अगर दो मन गेहूँ को एक मन एक ओर और एक मन दूसरी ओर डाल लेते तो क्या था ? घोड़ेवाले ने कहा , ‘ तेरी कितनी दौलत है ? ‘ उसने कहा कि बस जान ही जान है । घोड़ेवाले ने कहा कि मेरे साथ बात मत कर । कहीं मैं भी तेरे जैसा गरीब न हो जाऊँ । अपनी अक्ल और बदकिस्मती अपने पास रख ।

सो नासमझ लोग नेक सलाह लेने के लिए तैयार नहीं होते । इसी तरह संत भी शिक्षा देते हैं पर हम उनकी एक नहीं सुनते ।

विरह – वेदना

प्रभात – वेला की इबादत और रात भर मालिक के वियोग में विलाप मालिक की प्राप्ति के ख़ज़ाने की कुंजी हैं । ख्वाजा हाफ़िज़

शेख शिबली एक दिन अपने शिष्यों के साथ बैठे थे । सर्दी का मौसम था , आग जल रही थी । अचानक उनका ध्यान चूल्हे में जलती हुई लकड़ी के एक टुकड़े पर गया जो धीरे – धीरे सुलग रहा था । लकड़ी कुछ गीली थी , इसलिए आग की तपिश से पानी की कुछ बूंदें इकट्ठी होकर उसके एक कोने से टपक रही थीं । कुछ देर सोचने के बाद शेख शिबली ने अपने शिष्यों से कहा :

‘ तुम सब दावा करते हो कि तुम्हारे अंदर परमात्मा के लिए गहरा प्रेम और भक्ति है , पर क्या कभी सचमुच विरह की आग में जले हो ? मुझे . तुम्हारी आँखों में न कोई तड़प , न ही विरह की वेदना के आँसू दिखायी देते हैं । इस लकड़ी के टुकड़े को देखो , यह किस तरह जल रहा है और किस तरह आँसू बहा रहा है । इस छोटे , मामूली टुकड़े से कुछ सबक़ सीखो । ‘

भ्रंगी की सृजना

जिस नाम रिदै सो सभ ते ऊचा ॥ गुरु अर्जुन देव

भ्रंगी के साथ एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है । कहा जाता है कि यह एक छोटे से बिल में अंडा देती है । फिर यह अपने लार्वे के लिए कोई कीड़ा ढूँढ़ लाती है । उस कीड़े को लार्वे के सामने रखकर बिल को बंद कर देती है । भ्रंगी बिल के बाहर धूं – धूं करती रहती है । जब लार्वा बड़ा हो जाता है तो दोनों बिल तोड़कर बाहर आ जाते हैं ।

इस बात से यह धारणा बन गयी है कि भ्रंगी अपनी घूं-घूं की तेज़ आवाज़ से दूसरी जाति के किसी कीड़े को भंगी ही बना लेती है । भ्रंगीें बिल में कैद कीड़े को अपनी तवज्जुह देती है । अगर कीड़ा वह तवज्जुह लेता है तो वह कीड़ा भी भंगी बन जाता है और दोनों भ्रंगी बिल से बाहर निकलकर उड़ जाते हैं । कबीर साहिब इसी बात को इस प्रकार प्रकट करते हैं :

सुमिरन से मन लाइये , जैसे कीट भिरंग । कबीर बिसरे आपको , होय जाय तेहि रंग ॥

अगर हम भी परमात्मा के नाम का ध्यान करें तो हम उसमें समा जायेंगे । जिसके अंदर प्रभु का प्रकाश प्रकट हो जाता है , वह उस प्रकाश का ही रूप हो जाता है ।

जिसका भी कोई लगातार ध्यान करता है , उसी का रूप बन जाता है ।

अमृत वेला- Time of Nectar

ग्रंथो शास्त्रों में सुबह सवेरे यानी रात के पिछले पहर को अमृत वेला, ब्रह्म मुहूर्त, ब्रह्म घड़ी आदि कहा गया है। परमेश्वर के भक्तों ने अमृत वेला को भक्ति के लिए खास तौर से लाभदायक माना है। सुबह का वातावरण भक्ति के लिए बहुत उत्तम होता है। सबह के समय रात भर सोने के बाद […]

अमृत वेला- Time of Nectar

संत कैसे जिंदगी बदल देते हैं ?

सतगुरु की क्या महिमा करें , वह नीच से नीच और पापी से पापी जीवों को भी गले से लगा लेते हैं ।। महाराज सावन सिंह एक बार बारिश के मौसम में कुछ साधु – महात्मा अचानक कबीर साहिब के घर आ गये । बारिश के कारण कबीर साहिब बाज़ार में कपड़ा नहीं बेच सके […]

संत कैसे जिंदगी बदल देते हैं ?

ज्योतिष आद्यात्म की नजर से…

ज्योतिष द्वारा लोग भविष्य में घटनेवाली शुभ और अशुभ घटनाओं का पता लगाने का प्रयत्न करते है।लोग ज्योतिष विद्या द्वारा यह जानने का प्रयत्न करते है कि किस काम के लिए कौन सी घड़ी या कोन सा मुहूर्त शुभ है। इसी तरह वे यह जानने की भी कोशिश करते है कि किन स्थानों पर जाना […]

ज्योतिष आद्यात्म की नजर से…

असली विद्वान कौन ?

मैं अपनी मूर्खता भरी बातें करनेवाली ज़बान से परमात्मा की भेद भरी बातों को बयान करने की हिम्मत नहीं कर सकता । अगर मैं हिम्मत करूँ तो भी बयान नहीं कर सकता । क्लाउड ऑफ़ अननोइंग

एक बार एक विद्यार्थी अपनी बी . ए . की पढ़ाई पूरी करके अपने घर जा रहा था । रास्ते में उसे एक जाट ने पूछा कि कहाँ से आ रहे हो ? उसने कहा कि मैं विद्या प्राप्त करके आ रहा हूँ । जाट ने पूछा , ‘ तुझे सोहनी – महीवाल का क़िस्सा आता है ? ‘ बोला कि नहीं । दोबारा फिर पूछा , ‘ हीर – राँझा का आता है ? ‘ कहता है कि नहीं । जाट ने फिर कहा , ‘ सस्सी – पुन्नूँ का क़िस्सा आता है ? ‘ कहता है कि कोई नहीं । जाट ने कहा , ‘ फिर तुम कैसे पढ़े – लिखे हो ! ‘ अब सोचने की बात है कि जिसने ख़ुद विद्या प्राप्त नहीं की , उसे विद्या के बारे में कैसे समझाया जाये । विद्यार्थी बेचारा क्या कहता , चुप हो गया ।

इसी तरह अब आप बताओ , जो अंदर नहीं गये उनको क्या बतायें ? क्योंकि जो नज़ारे संत अपने अंदर ध्यान लगाकर देखते हैं , उनकी मिसाल बाहर है ही नहीं ।

अंधा और भूलभुलैयाँ

कई जनम भए कीट पतंगा ॥ कई जनम गज मीन कुरंगा ॥ कई जनम पंखी सरप होइओ ॥ कई जनम हैवर ब्रिख जोइओ । मिल जगदीस मिलन की बरीआ ॥ चिरंकाल इह देह संजरीआ ॥ गुरु अर्जुन देव

एक आदमी अंधा भी था और साथ ही गंजा भी था । थोड़ी सी ग़लती के कारण राजा ने उस बेचारे को एक ऐसी जेल में बंद कर दिया जो खास तौर पर भूलभुलैयाँ जैसी बनायी गयी थी । उस जेल के कई नक़ली दरवाज़े थे पर बाहर जाने के लिए एक ही दरवाज़ा था । राजा का हुक्म था कि जो कोई उस ठीक दरवाज़े को ढूँढ़कर बाहर निकल जायेगा , उसको छोड़ दिया जायेगा ।

काफ़ी देर तक वह अंधा आदमी जेल की दीवारों के साथ – साथ असली दरवाज़े को ढूँढ़ता रहा , परंतु जब वह दरवाज़े के पास आता तो अचानक उसके सिर में खुजली होने लगती । वह सिर में खुजली करने लग जाता और दरवाज़े से आगे निकल जाता । इसी तरह हर बार जब वह दरवाजे के पास आता , तो उसके सिर में खुजली हो जाती और वह असली दरवाज़े को ढूँढ़ न पाता । इस प्रकार वह जेल की दीवारों के साथ – साथ घूमता रहता और हर बार असली दरवाज़े से आगे निकल जाता ।

यही हाल हमारा है । जब मनुष्य – जन्म मिलता है तो उसे मन की लज्ज़तों में गुज़ार देते हैं और फिर से चौरासी के चक्कर में जाते हैं । यही वक़्त मुक्ति का होता है , जिसे हम गँवा देते हैं । पड़

जो कछु किया साहिब किया

क्या जीवन इन हड्डियों और मांस के शरीर से अधिक मूल्यवान नहीं ? और क्या शरीर पोशाक से अधिक आदर योग्य वस्तु नहीं ? सेंट मैथ्यू

कबीर साहिब ने मगहर से काशी में रिहाइश कर ली थी और वहीं सत्संग करना शुरू कर दिया था । उनका उपदेश था कि मनुष्य को अपने अंदर ही परमात्मा की तलाश करनी चाहिए । बाहरमुखी रीति – रिवाजों का पालन करने से , मंदिरों और मसजिदों में जाकर पूजा करने से कुछ हासिल नहीं हो सकता । उनकी यह शिक्षा पंडितों और मौलवियों के विचारों से बहुत भिन्न थी , इसलिए दोनों उनके कट्टर विरोधी हो गये , लेकिन कबीर साहिब ने उनकी परवाह नहीं की । जो जिज्ञासु सच्चे परमार्थ की खोज में उनके पास आते , आप खुले लफ़्ज़ों में उन्हें अपना उपदेश समझाते । धीरे – धीरे उनके शिष्यों की गिनती बढ़ती गयी और कबीर साहिब का नाम दूर – दूर तक फैल गया ।

जब पंडितों और मौलवियों ने देखा कि उनके विरोध का कबीर साहिब पर कुछ असर नहीं हुआ है तो उन्होंने उनको नीचा दिखाने के लिए एक योजना बनायी । उन्होंने काशी और उसके आसपास यह ख़बर फैला दी कि कबीर साहिब बहुत धनवान हैं और अमुक दिन एक धार्मिक पर्व पर बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं जिसमें भोज भी किया जायेगा , जो चाहे इसमें शामिल हो सकता है ।

जब कथित भोज का दिन आया तो क्या ग़रीब , क्या अमीर , हज़ारों लोग बड़े उत्साह के साथ कबीर की कुटिया की ओर चल पड़े । एक मामूली जुलाहे के पास इतने लोगों को भोजन कराने के लिए न तो धन था ,न ही सामान । इस मुश्किल से बचने के लिए कबीर साहिब शहर से बाहर बहुत दूर चले गये और एक पेड़ की छाया में मालिक के ध्यान में बैठ गये ।

जैसे ही कबीर साहिब घर से बाहर निकले , स्वयं परमात्मा ने उनके में प्रकट होकर भोजन की व्यवस्था की और हज़ारों लोगों को स्वयं भोजन कराया । भोज के लिए आनेवाला हर व्यक्ति यह कहते हुए लौटा , ‘ धन्य है कबीर , धन्य है कबीर । ‘

जैसे ही साँझ के अँधेरे में कबीर साहिब घर पहुँचे तो उन्हें सारा हाल मालूम हुआ । आप ख़ुशी में कुलमालिक का शुक्र करते हुए कह उठे :

ना कछु किया न करि सका , ना करने जोग सरीर । जो कछु किया साहिब किया , ता तें भया कबीर ॥

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