पीर की जूती का मोल

जब हमारा प्रेम सबकी ओर से हटकर केवल गुरु के साथ – लग जाता है , तो हम दुनिया के सब बंधनों और मलिनताओं से मुक्त हो जाते हैं और परमात्मा से जुड़ जाते हैं। महाराज सावन सिंह

अमीर खुसरो , निज़ामुद्दीन औलिया का शागिर्द और काबुल के हाकिम का मुलाज़िम था । बड़ा कमाई वाला भक्त था । किसी बात पर उसकी हाकिम से अनबन हो गयी और उसने नौकरी छोड़ दी । उन दिनों पक्की सड़कें नहीं होती थीं । उसने अपना सामान ऊँटों पर लदवाया और मुर्शिद के दर्शनों के लिए दिल्ली की ओर चल पड़ा ।

उधर एक ग़रीब आदमी हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के पास गया और कहा कि मेरी लड़की की शादी है , मैं ग़रीब हूँ , कुछ दो । अब फ़क़ीरों के पास क्या होता है , उनका लंगर ही मुश्किल से चलता था । इसलिए उन्होंने कहा कि तीन दिन तक ठहर जा , जो भेंट आयेगी तू ले जाना । मालिक की मौज ! उस दिन कुछ न आया । दूसरे दिन भी कुछ न आया और तीसरे दिन भी कुछ न आया । यह देखकर वह ग़रीब आदमी बोला , ‘ हज़रत ! अब मैं जाता हूँ । मेरी क़िस्मत में ही कुछ नहीं है । ‘ तब निज़ामुद्दीन ने कहा , ‘ अच्छा ! यह जूती ले जा । मेरे पास तो बस एक यही वस्तु । तुम इसे बेचकर कम से कम एक दिन के लिए खाने की सब सामग्री ख़रीद सकते हो । ‘ उसने टूटे हुए दिल से पीर का धन्यवाद किया , जूती ले ली और घर की ओर चल पड़ा ।

जब वह थका हुआ धूल भरे कच्चे रास्ते पर अपने घर को जा रहा था , तो उसने देखा कि सामने क़ीमती सामान से लदे हुए ऊँटों का एक क़ाफ़िला आ रहा है । यह अमीर ख़ुसरो का काफ़िला था जो काबुल के हाकिम की नौकरी से सेवा – मुक्त होकर आ रहा था । ऊँट की सवारी करता हुआ ,आदमी के पास पहुँचा तो उसे महसूस हुआ कि कहीं से पीर की खुशबू आ रही है , पता नहीं कहाँ से आ रही है । जब वह आदमी सामने से आकर उसके पास से गुज़र गया , तो ख़ुशबू पीछे की ओर से आनी शुरू हो गयी । वह हैरान हो गया । समझ गया कि इस आदमी के पास कोई भेद है । ऊँट से नीचे उतरकर उसे बुलाकर पूछा , ‘ तू कहाँ से आया है ? ‘ उसने लड़की की शादी है । मैंने कहा , कुछ दो । लेकिन फ़क़ीर भूखे , नंगे होते जवाब दिया कि दिल्ली गया था , निज़ामुद्दीन औलिया के पास । ग़रीब हूँ , हैं । जब ख़ुदा कुछ न दे तो फ़क़ीर भी कुछ नहीं देते ।

अमीर ख़ुसरो प्रेमी शिष्य था , इस बात से उसके दिल को ठेस लगी और पूछा , ‘ कुछ दिया भी ? ‘ मुसाफ़िर ने कहा , ‘ हाँ , यह पुरानी जूती दी है । ‘ अमीर ख़ुसरो ने कहा कि क्या इसे बेचना चाहते हो ? मैं तुझे इसकी मुँह – माँगी क़ीमत दे सकता हूँ । उसने जवाब दिया , ‘ हाँ , ले लो । मैंने तो इसे अगले गाँव में किसी को बेचकर कुछ खाने के लिए लेना था क्योंकि मुझे भूख लगी हुई है । ‘ अमीर ख़ुसरो ने एक ऊँट अपना और एक अपनी स्त्री तथा बच्चों का रख लिया , बाक़ी सारे ऊँट , माल – असबाब समेत उसको दे दिये और कहा , ‘ जा ! लड़की की शादी कर लेना । ‘

मुसाफ़िर ख़ुसरो का बार – बार शुक्रिया अदा करता हुआ माल से लदे ऊँट लेकर चला गया । इधर जब अमीर ख़ुसरो अपने पीर के दरबार में पहुँचा तो जूती झाड़कर आगे रख दी । पीर ने पूछा ‘ इसका मोल क्या दिया है ? ‘ ख़ुसरो ने अर्ज़ की , ‘ हज़रत ! मैं जो कुछ भी दे सकता था , सब दे दिया है । ‘ निज़ामुद्दीन ने कहा , ‘ फिर भी सस्ती है । ‘ उसके बाद अमीर ख़ुसरो के इश्क़ को देखकर निज़ामुद्दीन ने यहाँ तक कह दिया था कि ख़ुसरो को मेरी क़ब्र पर न आने देना , कहीं ऐसा न हो कि उसे मिलने के लिए मेरी क़ब्र फट जाये । यह अवस्था प्रेमियों की है ।

कबीर साहिब का कथन है : सीस दिये जो गुरु मिलें , तो भी सस्ता जान ॥

पक्षी का प्रभुप्रेम

प्रेम और नम्रता के साथ प्रभु से दिल लगाओ । … प्रभु और केवल प्रभु को पाने की सच्ची तड़प ही काफ़ी है क्लाउड ऑफ़ अननोइंग

एक फ़कीर था जो अपने आप को पैगंबर समझता था । एक बार उसके मन में ख़याल आया कि मैं पैगंबर हूँ , ख़ुदा मुझसे खुश है ; मुझसे बढ़कर उसका कोई और प्यारा नहीं । उसने अर्ज़ की , ‘ या ख़ुदा ! जो मुझसे भी ज्यादा तेरा प्रेमी है , मुझसे ज़्यादा तेरा ध्यान करता है , मुझे बता । मैं उससे मिलना चाहता हूँ । ‘ ख़ुदा ने कहा , ‘ ऐ फ़क़ीर ! बड़े – बड़े प्रेमी हैं । ‘ फ़क़ीर बोला , ‘ कोई एक बताओ । ‘ ख़ुदा ने कहा कि आदमी तो क्या मैं एक पक्षी बताता हूँ । वह अमुक पेड़ पर रहता है । उसके पास जा । फ़क़ीर ने अर्ज की कि मैं उसकी बोली नहीं समझता । ख़ुदा ने कहा , ‘ जा ! मैं तुझे वर देता हूँ कि तू उसकी बोली समझ लेगा ।

‘ खैर फ़क़ीर वहाँ गया , पक्षी को बैठे देखा । फ़क़ीर ने उससे कहा , ‘ कोई ख़ुदा की बात सुना । ‘ पक्षी बोला , ‘ ऐ फ़क़ीर ! मुझे फुरसत नहीं । मैंने इतनी बात भी तेरे से इसलिए की है कि तू मेरे प्रीतम के पास से आया है । ‘ फ़क़ीर ने कहा , ‘ तू क्या काम करता है जिससे तुझे फुरसत नहीं है ? ‘ पक्षी ने जवाब दिया , ‘ मैं दिन – रात परमात्मा का ध्यान करता हूँ , सिर्फ़ एक तकलीफ़ है । ‘ फ़क़ीर ने पूछा कि वह कौन – सी तकलीफ़ है ? उसने कहा , ‘ यहाँ से कुछ दूर एक चश्मा है , जहाँ जाकर मुझे पानी पीना पड़ता है । ‘ फ़क़ीर ने पूछा कि चश्मा कितनी दूर है ? उसने कहा कि यह मेरे सामने जो गेहूँ का खेत है , इससे आगे है । फ़क़ीर बोला , ‘ यह तो कोई दूर नहीं । ‘ इस पर पक्षी ने कहा , ‘ मैं तुझे क्या बताऊँ ? मेरे लिए तो इतना भी मुश्किल है , क्योंकि सुमिरन छोड़कर वहाँ जाना पड़ता है । ‘ फ़क़ीर ने कहा कि अगर कोई सेवा हो तो बता । उसने कहा , ‘ बस , चश्मे को मेरे पास ला दो । ‘ फ़क़ीर ने कहा कि यह तो नहीं हो सकता । ‘ फिर और कोई सेवा नहीं है ‘ , कहकर पक्षी सुमिरन करने लग गया ।

मतलब तो यह है कि जो ख़ुदा के आशिक़ हैं , उनका उसके साथ इतना प्यार होता है कि पल – पल उनका ध्यान ख़ुदा में ही लगा रहता है । जिस तरह अगर कोई कौआ समुद्री जहाज़ पर बैठ जाये और जहाज़ चल पड़े तो वह कहीं और नहीं जा सकता । नीचे समुद्र है , ऊपर आसमान । उड़ता है और वापस जहाज़ पर ही आ बैठता है , और कोई जगह नहीं है । इसी तरह ख़ुदा के आशिक़ों का भी जहाज़ के कौए जैसा हाल होता है ।

प्रभु की इच्छा या इंसान की मरज़ी

मनुष्य अपनी विपत्तियों को निमंत्रण देता है और फिर इन दुःखदायी अतिथियों के प्रति विरोध प्रकट करता है , क्योंकि वह भूल जाता है कि उसने कैसे , कब और कहाँ उन्हें निमंत्रण पत्र लिखे तथा भेजे थे । परंतु समय नहीं भूलता ; समय उचित अवसर पर हर निमंत्रण – पत्र ठीक पते पर दे देता है , और समय ही हर अतिथि को मेज़बान के घर पहुंचाता है । किताब – ए – मीरदाद

जल्हण नौशहरा में एक अच्छा कमाई वाला महात्मा हुआ है । ज़िक्र है कि उसके एक लड़की थी । जब वह जवान हुई तो जल्हण की पत्नी ने कहा कि किसी पंडित के पास जाओ और लड़की के लिए कोई अच्छा – सा वर और उसकी शादी का मुहूर्त निकलवाओ । अब जल्हण कमाईवाला महात्मा था , यह काम उसके स्वभाव के अनुकूल नहीं था क्योंकि उसके विचार बिलकुल अलग तरह के थे । वह हमेशा मालिक की मौज में ख़ुश रहता था और हर कार्य को प्रभु प्रियतम की इच्छा पर छोड़ देता था । वह अपने लंबे अनुभव से जानता था कि अंत में होता वही है जो प्रभु की इच्छा हो । लेकिन जब पत्नी ने मजबूर किया तो एक जाने – माने पंडित के घर गया । आगे उसके दरवाज़े पर एक जवान लड़की देखी । पता चला कि वह पंडित की लड़की है और विवाह के थोड़े समय बाद ही विधवा हो गयी है । वह सोचने लगा , सभी लोग पंडित से अपनी लड़कियों की शादी का मुहूर्त निकलवाते हैं पर यहाँ पंडित की अपनी लड़की विधवा हो चुकी है । क्या उसने अपनी बेटी की शादी का मुहूर्त नहीं निकाला था ? उसने पंडित के पास जाने का विचार छोड़ दिया और गली में आगे चलता गया । आगे गया तो हकीम का मकान नज़र आया । क्या देखते हैं कि उसके घर रोना – पीटना हो रहा है । जल्हण ने हकीम के नौकर से पूछा कि क्या कोई भयंकर हादसा हो गया है ? नौकर ने बताया कि हकीम का बेटा मर गया है । जल्हण फिर सोचने लगा कि संसार की नित्य प्रतिक्रिया कैसे चल रही है ? उसने अपने आप से कहा , ‘ यहाँ इस घर में एक सयाना हकीम है जो अपने इकलौते बेटे को बचाने का भरपूर यत्न करता है , पर उत्तम इलाज के बावजूद उसका बेटा चल बसा है । यह हकीम उसे क्यों नहीं बचा सका ? ‘ लोग कहने लगे , ‘ परमात्मा की मौज को कौन टाल सकता है । ‘ उसने धूल भरी गली में चलते – चलते मुस्कराते हुए अपने मन में कहा :

घर वैदां दे पिटणा , घर ब्राह्मण दे रंड । चल जल्हण घर आपणे , साहा देख न संग ॥

हीरे का मोल

आठ गांठ कोपीन के , साधु न मानै शंक । नाम अमल माता रहै , गिनै इंद्र को रंक । कबीर साहिब

मेवाड़ की रानी मीराबाई पंद्रहवीं शताब्दी के मशहूर संत गुरु रविदास जी की शिष्या थीं । उनकी सखियाँ – सहेलियाँ गुरु रविदास जी पर नाक – मुँह चढ़ाती थीं । वे मीराबाई को ताने देती थीं कि आप ख़ुद शाही महलों में रहती हैं पर आपके गुरु जूते गाँठकर बड़ी मुश्किल से गुज़ारा करते हैं ।

मीराबाई को इस बात का बहुत दु : ख हुआ । उनके हृदय में सतगुरु रविदास जी के लिए सच्चा प्रेम और आदर था । उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे करें तो क्या करें । अंत में एक दिन उन्होंने हीरों के डिब्बे में से एक क़ीमती हीरा निकाला ताकि गुरु रविदास जी को दे सकें , जिसे बेचकर उन्हें काफ़ी धन मिल सकता था । वे हीरा लेकर गुरु रविदास जी के पास चली गयीं । उन्होंने माथा टेककर और हाथ जोड़कर अर्ज़ की , ‘ गुरु जी , मुझे आपकी ग़रीबी देखकर बहुत दुःख होता है और लोग मुझे ताने देते हैं कि तेरा गुरु इतना ग़रीब है । आप यह हीरा स्वीकार कर लें और इसको बेचकर सुंदर – सा घर बना लें ताकि आप सुख की जिंदगी गुज़ार सकें । ‘

गुरु रविदास जी उसी तरह जूते गाँठते हुए बोले , ‘ बेटी , मुझे जो कुछ मिला है , कुंड के पानी और जूते गाँठने से मिला है । अगर तुझे लोकलाज का डर है तो घर में बैठकर ही भजन – सुमिरन कर लिया कर , मेरे पास आने की कोई ज़रूरत नहीं । यह हीरा मेरे किसी काम का नहीं । चाहे लोग मुझे ग़रीब समझते हैं पर मुझे ग़रीबी में ही आनंद है । मुझे दुनिया की किसी नाशवान वस्तु की ज़रूरत नहीं । ‘

मीराबाई हर हालत में गुरु रविदास जी को हीरा देना चाहती थीं । वह बहुत देर तक मिन्नत करती रहीं , पर गुरु जी ने एक न सुनी । अंत में निराश होकर मीराबाई कहने लगीं , ‘ गुरु जी , मैं हीरा आपकी कुटिया की छत में छोड़े जाती हूँ । जब ज़रूरत पड़े , आप निकाल लेना ताकि आपका जीवन सुखमय हो जाये ।

यह कहकर मीराबाई अपने महल में वापस आ गयीं । इस बात को कई महीने बीत गये । जब वह फिर गुरु रविदास जी के दर्शनों को गयीं तो यह देखकर हैरान रह गयीं कि वह अब भी ग़रीबी की हालत में जूते गाँठ रहे थे । उन्होंने आदरपूर्वक माथा टेककर कहा , ‘ गुरु जी , मैं बड़े प्यार और आदर से आपके लिए एक हीरा छोड़ गयी थी , आपने उसका फ़ायदा क्यों नहीं उठाया ? ‘

गुरु रविदास जी बोले , ‘ बेटी , मुझे हीरे का क्या करना है ? मुझे परमात्मा ने नाम का वह अथाह धन बख़्शा है जिसका हिसाब लगा सकना असंभव है । तुम वापस जाती हुई हीरा साथ ले जाना । ‘

मीराबाई ने छत टटोली तो हीरा वहीं पड़ा मिला जहाँ वह रखकर गयी थीं । गुरु रविदास जी ने हीरे की ओर ध्यान ही नहीं दिया था । यह देखकर मीराबाई को अपने गुरु की बड़ाई का सच्चा ज्ञान हो गया और उन्हें एहसास हो गया कि उनके सतगुरु किस अपार रूहानी दौलत के मालिक हैं । वह प्रेम , श्रद्धा और नम्रता के साथ सतगुरु के चरणों में गिर पड़ीं ।

गड़रिये की भेंट

वे लोग धन्य हैं जिनका मन पवित्र है , क्योंकि केवल उन लोगों को ही प्रभु का दीदार हासिल होगा । सेंट मैथ्यू

मनुष्य के अंदर दो बड़े गुण हैं । एक भय और दूसरा भाव यानी डर और प्यार । जिसको परमात्मा का डर है , उसको परमात्मा से प्यार भी है । जिसको परमात्मा से प्यार है , उसको परमात्मा का डर भी है ।

कहा जाता है कि एक दिन एक बकरियाँ चरानेवाला गड़रिया मालिक के प्यार में आकर कहने लगा , ‘ हे परमात्मा , अगर तू मुझे मिले तो मैं तुझे दूध पिलाऊँगा , मक्खन खिलाऊँगा , लेलों ( मेमनों ) की ऊन का कंबल बनाकर पहनाऊँगा । ‘ इस तरह बहुत कुछ कहता रहा । अभी वह अपनी बात खत्म कर ही रहा था कि इत्तफ़ाक़ से वहाँ एक फ़क़ीर आ गया । उसको चरवाहे की बात बहुत बुरी लगी । उसने उस ग़रीब चरवाहे से कहा , ‘ क्या बकवास कर रहे हो ? यह सब मूल् वाली बातें हैं । । तुम ने बहुत बड़ा गुनाह किया है । ‘ चरवाहे ने हैरानी से पूछा , ‘ क्या गुनाह ? क्यों हज़रत ! मेरी ख़ुदा के आगे की हुई यह साधारण – सी विनती गुनाह कैसे हो सकती है ? ‘

फ़क़ीर ने कहा , ‘ ज़रा सोच , तू क्या कह रहा था । तूने सचमुच ख़ुदा की निंदा करके गुनाह किया है । ‘ उसने गड़रिये से कहा कि परमात्मा न दूध पीता है न मक्खन खाता है और न ही कंबल ओढ़ता है । गड़रिये ने पूछा , ‘ तो क्या मैंने गुनाह किया है ? ‘ फ़क़ीर ने कहा कि हाँ ।

फ़क़ीर तो अपनी बात कहकर चला गया , बाद में गड़रिया पछतावे में आकर बहुत रोया और कहने लगा , ‘ परमात्मा , मैंने गुनाह किया है , तू मुझे बख़्श दे । ‘ रोते – रोते उसका परदा खुल गया । परमात्मा ने दर्शन दे दिये । वह कहीं दूर तो था नहीं , उसके अंदर ही था । परमात्मा ने कहा , ‘ तू घबरा मत । मैं तेरा मक्खन भी खाऊँगा , दूध भी पीऊँगा और कंबल भी ओढूँगा । ‘ उधर फ़क़ीर पर परमात्मा की नाराज़गी ज़ाहिर हुई । परमात्मा ने कहा , ‘ तूने मेरे एक प्यारे का दिल दुखाया है , जा उससे माफ़ी माँग । ‘ फ़क़ीर गड़रिये के पास आया और कहने लगा , ‘ मुझे माफ़ी दे दे , मैंने ग़लती की है । ‘ गड़रिया हँसकर बोला , ‘ भाई , जो परमात्मा तेरे पास आया है , वह मेरे पास भी आ गया है । ‘

सो जिसको प्रभु से प्यार है , उसे प्रभु का भय भी है । हम एक दूसरे की निंदा करते हैं क्योंकि हमें मालिक का डर और प्यार नहीं । हमारे अंदर उसका डर और प्यार होना चाहिए । अगर मालिक से मिलना है तो गुरु के पास जाकर नाम की कमाई करनी होगी , फिर वह दया करके हमारे अंदर भय और भाव पैदा कर देगा ।

पैगंबर और उसके शिष्य

जब लग मेरी मेरी करै । तब लग काज एक नही सरै ॥ जब मेरी मेरी मिट जाए । तब प्रभ काज सवारह आए ॥ कबीर साहिब

एक बार हज़रत मुहम्मद साहिब अपने दोस्तों और इमामों को मसजिद में ले गये और पूछा , ‘ आपके पास क्या – क्या है ? ‘ हज़रत उमर ने कहा कि मेरी औरत है , लड़के – लड़कियाँ हैं , ऊँट वगैरह हैं । सब कुछ गिनते – गिनाते उसे बहुत समय लग गया । दूसरों ने भी इसी तरह बताया । जब हज़रत अली की बारी आयी तो वह अपनी जगह से उठे और बोले , ‘ मेरा तो एक ख़ुदा है और एक आप हैं , इसके अलावा मेरा कुछ नहीं । ‘ हज़रत मुहम्मद साहिब का मतलब उनको समझाना था , सो इस तरह समझा दिया ।

हज़रत मुहम्मद अपने शिष्यों से बातचीत के माध्यम से अपना उपदेश दिया करते थे । परमार्थ में सांसारिक पदार्थों की कोई ख़ास महत्ता नहीं , वे हमारे पास थोड़े समय के लिए होते हैं और दुनिया से कूच करते समय हमारे साथ नहीं जाते । जो दुनिया में ज़्यादा फँसा हुआ है , उसका यही हाल होता है । वह बार – बार दुनिया में जन्म लेता है । जो ख़ुदा से प्यार करता है , वह दुनिया में क्यों भटकेगा ? यह समझने की बात है ।

एक घड़ी की संगति

गोबिंद जीउ सतसंगत मेल हर धिआईऐ । गुरु रामदास

एक साहूकार का नियम था कि वह अपने असामियों से सूद – दर – सूद लिया करता था । एक दिन वह एक गाँव में किसी ग़रीब किसान के घर अपने पैसों की वसूली करने गया । ब्याज कम करने के लिए किसान ने बहुत ज़ोर लगाया , पर साहूकार ने एक न सुनी । उसके बछड़े – बछड़ियाँ और जो अनाज था सभी ब्याज में गिन लिया , एक कौड़ी भी न छोड़ी । किसान ने दिल में कहा , ‘ अच्छा लाला ! अब जा और अपना बिस्तरा अपने आप उठाकर ले जा । ‘ साहूकार मज़दूर ढूँढ़ रहा पा , क्योंकि किसान ने उसके इस व्यवहार के कारण उसे कोई मज़दूर लाकर नहीं दिया था । अब गाँव में मज़दूर कहाँ से मिले ? संयोग से वहाँ नज़दीक ही एक महात्मा बैठा भजन कर रहा था । उसने साहूकार और किसान के बीच हुई सारी बात को सुन लिया था । महात्मा ने उस घमंडी साहूकार से कहा , ‘ मैं तेरा बिस्तरा उठाकर ले चलता हूँ , लेकिन एक शर्त है कि या तो तू मालिक की स्तुति और प्यार की बातें करते जाना और मैं सुनता जाऊँगा , या मैं करता जाऊँगा और तू सुनते जाना । ‘ लाला ने सोचा कि यह कौन – सी मुश्किल बात है । यह बातें करता जायेगा और मैं हाँ हाँ करता जाऊँगा । महात्मा ने उसका बिस्तरा उठा लिया और प्रभुप्रेम की बातें करते हुए चल पड़ा । जब उसका गाँव आ गया तो महात्मा ने कहा कि लो लाला जी , मैं अब जाता हूँ , पर महात्मा ने दिल में सोचा कि यह भी क्या याद करेगा कि मेरा किसी महात्मा से मिलाप हुआ था , इसलिए इसको कुछ बताना चाहिए । महात्मा ने साहूकार से कहा , ‘ आज से आठ दिन के बाद तेरी मौत हो जायेगी । तेरी सारी उम्र में कोई अच्छे कर्म नहीं हैं । यह जो एक घंटा मेरे साथ बातें की हैं , वही एक श्रेष्ठ कर्म है । जब तुम्हें यमदूत ले जायेंगे और पूछेगे कि इस एक घंटे के सत्संग का फल पहले लेना है कि बाद में ? तब तुम कह देना कि पहले , और फल यही माँगना कि मुझे उस महात्मा के दर्शन कराओ । फिर जो होगा तुम ख़ुद देख लोगे । ‘

जब मौत आयी , धर्मराज के यमदूत आये और साहूकार को पकड़कर ले गये । जब पेश हुआ तो धर्मराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इसके कर्मों का लेखा देखो । उसका कोई श्रेष्ठ कर्म नहीं था , सिवाय इसके कि उसने एक महात्मा के साथ एक घंटा बातें की थीं । धर्मराज ने पूछा कि तुझे इसका फल पहले लेना है कि बाद में ? साहूकार कहने लगा कि पहले दे ” दो और जहाँ वह महात्मा है , मुझे वहाँ ले चलो । महात्माओं का शरीर इस दुनिया में होता है , लेकिन उनकी सुरत खंडों – ब्रह्मांडों पर रहती है । यमदूत उसे अपने साथ वहाँ ले गये जहाँ वह महात्मा भजन कर रहा था । महात्मा ने कहा , ‘ भाई साहूकार , तू आ गया ? ‘ साहूकार ने कहा , ‘ जी हाँ , आपकी कृपा से से आ गया हूँ , लेकिन यमदूत बाहर खड़े मेरा इंतज़ार कर रहे हैं । ‘

अब जहाँ मालिक का भजन – सुमिरन हो वहाँ यमदूत नहीं जा सकते । साहूकार को उस महात्मा के पास बैठे आनंद लेते हुए काफ़ी देर हो गयी । उसका एक घंटे के सत्संग का फल ख़त्म हो गया । बाहर यमदूत खड़े थे और आवाज़ों से तथा इशारों से उसे बुला रहे थे । लेकिन वह बाहर नहीं आया । महात्मा ने कहा , ‘ चुपचाप बैठे रहो , यमदूत यहाँ नहीं आ सकते । ‘ हारकर यमदूत चले गये । धर्मराज के आगे शिकायत की कि जी ! वह नहीं आता । धर्मराज ने कहा कि वहाँ न मेरा गुज़ारा है न तुम्हारा , इसलिए अब उसका ख़याल छोड़ दो । सो पूर्ण साधु के एक मिनट के सत्संग के बराबर कोई कर्म नहीं है ।

गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं : जह साधू गोबिद भजन कीरतन नानक नीत ॥ शाणा हउ णा तूं णह छुटह निकट न जाईअहो दूत।।

फ़क़ीर और साहूकार

मम कारण सब परिहरै , आपा अभिमान । सदा अखंडित उर धरै , बोलै भगवान ।। संत दादू दयाल

एक फ़क़ीर का नियम था कि वह जिस गाँव में जाता था , रोटी ऐसे व्यक्ति के घर खाता था जिसकी कमाई हक़ की होती थी । वह पहले पूछताछ कर लेता था । एक दिन इत्तफ़ाक़ से वह एक जंगल में जा रहा था । वहाँ उसे एक आदमी मिला । फ़क़ीर ने उससे पूछा कि पासवाले गाँव में क्या कोई हक़ की कमाई करनेवाला व्यक्ति है ? उसने कहा कि अमुक साहूकार है । पूछा , ‘ उसके पास कितना रुपया है ? ‘ कहने लगा कि एक लाख के क़रीब । ‘ उसके कितने पुत्र हैं ? ‘ ‘ चार । ‘

ये पूछकर वह उस गाँव में गया । साहूकार के पास पहुंचा और कहा , ‘ लाला जी , रोटी खानी है । ‘ साहूकार ने कहा , ‘ आओ महात्मा जी , बड़ी ख़ुशी से खाओ । ‘ फिर फ़क़ीर ने कहा कि केवल दो बातें आपसे पूछनी हैं । साहूकार ने कहा , ‘ हुक्म करो । ‘ महात्मा ने पूछा कि तुम्हारे पास कितना रुपया है ? साहूकार ने जवाब दिया कि पचास हज़ार । फिर पूछा कि तुम्हारे कितने पुत्र साहूकार ने जवाब दिया कि एक । महात्मा उठकर चल पड़ा ।

यह सोचते हुए कि साहूकार झूठ बोल रहा है , फ़क़ीर उसके घर से जाने लगा । साहूकार को बड़ी हैरानी हुई । साहूकार ने हाथ जोड़कर अर्ज़ की , ‘ महात्मा जी , नाराज़ हो गये , चल क्यों पड़े ? ‘ महात्मा क्रोधित होकर बोला कि मैंने तो तुमको धर्मात्मा समझा था । हक़ की कमाईवाला समझा तो की गठरी निकला । तू बता ! मैं तेरे पुत्र ले जाता कि तेरी कमाई बाँट लेता ? साहूकार ने उत्तर दिया , ‘ महात्मा जी , पहले मेरी अर्ज़ सुन लो , रोटी चाहे खाओ , चाहे न खाओ । मेरा एक बेटा परमार्थ में मेरी था । तूमदद करता है , बाक़ी सब शराबी – कबाबी हैं । वे अपना पिछला क़र्ज़ वसूल करने आये हैं । और मैंने आज तक पचास हज़ार रुपया परमार्थ में लगाया है । बाक़ी का पता नहीं चोरों ने ले जाना है कि ठगों ने । इसलिए मैंने कहा था कि मेरा एक पुत्र है और पचास हज़ार रुपया है । ‘ फ़क़ीर ने दयालु होकर मुस्कराते हुए कहा , ‘ बेटा ! माफ़ करना । मुझे अब पता चला कि आपने सच बोला था । मैं बड़ी प्रसन्नता से आपका भोजन स्वीकार करूँगा । ‘

मतलब यह है कि जो धन और संबंधी परमार्थ में मदद दें , वे ही असल में अपने हैं ।

तीर्थ आद्यात्म की नजर से

संत महात्मा प्रभु की प्राप्ति के लिए मन की निर्मलता का उपदेश देते है। हम इसके लिए आसान से आसान साधन ढूंढने की कोशिश करते है। हम समझते है कि तीर्थो में स्नान करने से मन निर्मल हो जाएगा और हम प्रभु मिलाप करने में सफल हो जायेगे। पर ऐसा सोचना ठीक नहीं है। तीर्थ […]

तीर्थ आद्यात्म की नजर से

जाति- पाति आध्यात्म की नजर से

संतो महात्माओं ने हमेशा से एकता का उपदेश दिया है। वे हमको हर प्रकार के द्वैत से ऊपर उठकर समदर्शी बनने का उपदेश देते है। संत महात्मा समझाते है कि परमात्मा ने सब इंसान एक जैसे बनाए है। मजहब, मुल्क, कोम, नस्ल और जाति पाति के सब तरह के भेद भाव इंसान के बनाए हुए […]

जाति- पाति आध्यात्म की नजर से
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