ज्योतिष द्वारा लोग भविष्य में घटनेवाली शुभ और अशुभ घटनाओं का पता लगाने का प्रयत्न करते है।लोग ज्योतिष विद्या द्वारा यह जानने का प्रयत्न करते है कि किस काम के लिए कौन सी घड़ी या कोन सा मुहूर्त शुभ है। इसी तरह वे यह जानने की भी कोशिश करते है कि किन स्थानों पर जाना […]
ज्योतिष आद्यात्म की नजर से…
प्रेम की मस्ती
ऐसे प्रेमी , सतगुरु के प्रेम और मुहब्बत में फ़ना होकर ( अपने आप को पूर्णतया खोकर ) अमर जीवन का रस पीते हैं और उसका आनंद प्राप्त करते हैं । महाराज सावन सिंह
एक बार जब कृष्ण जी विदुर के घर गये , उस समय वह घर पर नहीं थे । उनकी पत्नी नहा रही थी । द्वार पर कृष्ण जी ने आवाज़ दी । आवाज़ सुनते ही वह प्रेम में इतनी मस्त हो गयी कि उसे इतना भी होश न रहा कि कपड़े पहन लूँ । बिना कपड़ों के ही उठ भागी । ऐसी हालत में न पाप है , न पुण्य । कृष्ण जी ने कहा कि कपड़े तो पहन । तब उसने कपड़े पहने ।
अब घर में खाने – पीने का कोई सामान नहीं था । सिर्फ केले रखे थे । वह प्रेम में इतनी मग्न हो गयी कि केले छील – छीलकर छिलका कृष्ण जी को देने लगी और गूदा फेंकने लगी । इतने में विदुर आ गये । जब उन्होंने देखा तो कहा , ‘ अरी पगली ! यह क्या कर रही है ? ‘ यह सुनकर वह बोली , ‘ ओहो ! मुझे पता नहीं चला । ‘ फिर उसने कृष्ण जी को केले का फल दिया तो कृष्ण जी ने कहा , ‘ विदुर ! इसमें वह स्वाद नहीं है जो छिलके में था । ‘
यह है प्रेम की अवस्था ।
लफ़्ज़ों का फेर
गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज ने ‘ जाय साहिब ‘ में मालिक के हजार से अधिक नाम बताये हैं । पर वे केवल नामों के तात्पर्य को ग्रहण करने का आदेश देते हैं और कहते हैं कि तुम नामों से चलकर उस नामी को पकड़ो जो सबका इष्ट है । महाराज सावन
सिंह चार अलग – अलग मुल्कों के आदमी इकट्ठे हुए । उन्होंने मिलकर सलाह की कि कोई काम करें । उन्होंने कुछ ज़मीन ख़रीद ली । उनमें से एक उत्तर प्रदेश का था । उसने कहा कि मैं तो गेहूँ बोऊँगा । दूसरा जो पंजाबी था वह बोला कि मैं तेरी बात मानने को तैयार नहीं , मैं तो कनक बोऊँगा । तीसरा जिसकी ज़बान फ़ारसी थी कहने लगा कि मैं गंदुम बोऊँगा । चौथा अंग्रेज़ था । उसने कहा कि नहीं जी , हम तो व्हीट ( wheat ) बोयेंगे । वे चारों आपस में झगड़ने लगे । कोई समझदार आदमी उधर से निकला , उसने देखा कि ये बेकार में लफ़्ज़ों पर झगड़ रहे हैं । उसने कहा कि आप सब अपना – अपना बीज ले आओ । जब बीज लाये तो सबका बीज एक जैसा ही था । सारा झगड़ा ख़त्म हो गया ।
इसी तरह अगर हम अपनी रूह को अंदर नाम के साथ लगा दें तो मज़हबों और मुल्कों का कोई झगड़ा न रहे , सारे झगड़े लफ़्ज़ों के हैं ।
माँ की शिक्षा

अपने अंदर प्रियतम के सिवाय और कोई चाह न रखो । भक्त और भगवान के बीच किसी दूसरे का ख़याल तक बाक़ी न रहे । मौलाना रूम
कहा जाता है कि जब प्राचीन भारत के एक राजा गोपीचंद ने दुनिया की ऐशो – इशरत से तंग आकर अपना राज्य छोड़ दिया और गोरखनाथ के पास योगी बनने के लिए चला गया तो गोरखनाथ ने उसे योग की दीक्षा दे दी । मगर यह सोचकर कि यह राजा है , इसके अंदर लोकलाज है , जो परमार्थ में बड़ी भारी दीवार है और जिसे दूर करना ज़रूरी है , उसने हुक्म दिया , ‘ बच्चा ! जैसा मैं तुझे कहूँ वैसा करो । साधू का भेष धारण करके , हाथ में कमंडल लेकर , वापस अपने राज्य में भिक्षा के लिए जाओ और जो कुछ तुम्हारी पूर्व प्रजा से मिले , ले आओ । ‘ अब राजा होकर अपने शहर में जाकर अपनी प्रजा से भिक्षा माँगना कोई छोटी – सी बात नहीं ।
गोपीचंद ने श्रद्धापूर्वक अपने गुरु का आदेश माना । जब शहर में गया , लोगों ने देखा कि यह राजा है , जिसने पैसा देना था उसने उसे रुपया दिया । वह आगे योगियों को देता गया और योगी गुरु के पास पहुँचाते गये । शहर में माँगकर फिर रानियों के पास गया । उन्होंने देखा कि यह तो राजा है , जो अच्छे कपड़े और गहने थे , सब उतारकर योगी को दे दिये कि अब राजा के बिना ये सब हमारे किस काम के ! गोपीचंद सब वस्तुएँ अपने साथी शिष्यों को देता गया और वे इन्हें अपने गुरु के पास भेजते रहे । अंत में गोपीचंद ने माँ के दरवाज़े पर जाकर अलख जगायी ।
माँ ने उसे देखकर कहा , ‘ योगी ! मैं गृहस्थ औरत हूँ , तू त्यागी पुरुष है । गृहस्थ का धर्म नहीं कि त्यागी को उपदेश दे , लेकिन इस समय तू मेरे दरवाज़े पर माँगने आया है , मुझे अधिकार है कि मैं जो चाहूँ , भिक्षा में दूँ !
जो कुछ तू माँगकर लाथा , ये तो योगी लोग खा जायेंगे , तेरे पास तो कुछ नहीं रहेगा । इसलिए मैं तुझे ऐसी भिक्षा नहीं देती , बल्कि तीन बातों की भिक्षा देती है :
‘ पहली यह कि रात को मज़बूत से मज़बूत किले में रहना । दुसरी यह कि स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन खाना और तीसरी यह कि नरम से नरम बिस्तर पर सोना ।
यह सुनकर योगी बोला , ‘ माँ ! तेरे उपदेश से मैं साधु हुआ हूँ , लेकिन अब तू मुझे क्या उलटा उपदेश दे रही है । अगर कोई और स्त्री यह कहती तो मैं उसे समझाता । देख माँ ! जंगलों में मज़बूत किले और स्वादिष्ट भोजन कहाँ ? इसी तरह नरम बिछौने कहाँ ? वहाँ तो सूखे टुकड़े खाने पड़ते हैं । वास पर लेटना पड़ता है । ‘ माँ ने उत्तर दिया , ‘ योगी ! तूने मेरा मतलब नहीं समझा ।
‘ गोपीचंद द्वारा मतलब पूछने पर उसने कहा , ‘ मेरा मतलब यह है कि तू दिन – रात जागना , अभ्यास करना । जिस वक़्त तुझे नींद तंग करे , गिराने लगे तो वहीं सो जाना , चाहे नीचे काँटे हों या कंकर , वही नरम से नरम बिछौना होगा । तुझे ऐसी नींद आयेगी जैसी कभी फूलों की सेज पर भी नहीं आयी होगी । दूसरे , जहाँ तक हो सके , थोड़ा खाना और भूखे रहना । जब भूख से प्राण तड़प उठे , प्राण निकलने लगें , तो रूखा – सूखा , बासी , जैसा भी टुकड़ा मिले , खा लेना । उस वक़्त सात दिनों का सूखा टुकड़ा भी तुझे हलवे और पुलाव से बढ़कर स्वादिष्ट लगेगा । तीसरे , तू राज्य छोड़कर योगी हुआ है । तेरे पास जवान स्त्रियों को भी आना है , वृद्ध और कम अवस्था की स्त्रियों को भी आना है । गुरु की संगति से बढ़कर और कोई मज़बूत क़िला नहीं है । अगर गुरु की संगति करेगा , गुरु के अधीन रहेगा , सत्संग सुनेगा तो इनसे बचा रहेगा । महात्मा के वचनों से मन को ठोकर लगती रहती है , मन सीधा रहता है । बस ! मैं तुझे इन तीनों बातों की भिक्षा देती हूँ और कुछ नहीं । ‘
गुरु रामदास और मिट्टी के चबूतरे

एक व्यक्ति हज़ार बार युद्ध में हज़ार लोगों को जीत लेता है , जब कि दूसरा व्यक्ति केवल अपने आप पर विजय प्राप्त करता है । वास्तव में दूसरा व्यक्ति ही सबसे बड़ा विजेता है । महात्मा बुद्ध
जब तीसरे गुरु , गुरु अमरदास जी ने अपना उत्तराधिकारी चुनने का मन बनाया तो उनके शिष्यों में से बहुत से ऐसे थे जिन्हें विश्वास था कि शायद गुरु साहिब उन पर दया करके उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दें । पर जैसा कि आम तौर पर ऐसी स्थिति में होता है , गुरु साहिब ने सबको इम्तिहान की कसौटी पर रख दिया । हुक्म दिया कि अमुक मैदान में अपनी – अपनी मिट्टी लाकर चबूतरे बनाओ ।
सेवकों ने चबूतरे बनाये । आपने कहा , ‘ ये ठीक नहीं हैं , फिर बनाओ । ‘ लोगों ने फिर बनाये । आपने कहा , ‘ ये भी ठीक नहीं हैं । ‘ लोगों ने तीसरी बार बनाये । आपने कहा , ‘ यह जगह ठीक नहीं है , अपनी – अपनी मिट्टी उस मैदान में ले जाओ और फिर बनाओ । ‘ लोगों ने फिर बनाये , लेकिन आपने पसंद न किये । जब आपके सतगुरु अंगद देव जी ने आपको अपना उत्तराधिकारी बनाया था तो उस समय आप काफ़ी बड़ी उम्र के थे । इस वक़्त गुरु साहिब लगभग 95 साल के थे । जब चार – पाँच बार इस तरह हुआ , तब लोगों ने सोचा कि सत्तर साल के बाद आदमी की अक्ल क़ायम नहीं रहती । गुरु साहिब की उम्र तो लगभग 95 साल है । सो यह सोचकर बहुत – से लोग हट गये । जो लगे रहे , उनसे गुरु साहिब चबूतरे बनवाते रहे और गिरवाते रहे ।
आखिर कब तक ! एक – एक करके सभी छोड़ गये । केवल एक रामदास जी रह गये , जो चबूतरे बनाते और गुरु साहिब के पसंद न करनेपर गिरा देते । दूसरे शिष्य जो आपको गुरु जी के आदेश का पालन करते गुरु रामदास और मिट्टी के चबूतरे देख रहे थे , आपका मजाक उड़ाते हुए कहने लगे कि आप तो सौदाई हैं को गुरु को प्रसन्न करने के लिए बार – बार चबूतरे बना रहे हैं । रामदास जी ने थोड़ी देर काम रोककर उनसे कहा , ‘ भाइयो , सारी दुनिया अंधी है । केवल एक व्यक्ति है , जिसे दिखायी देता है , और वह हैं मेरे सतगुरु । सतगुरु के सिवाय बाक़ी सारी दुनिया पागल है । ‘ इस पर शिष्य कहने लगे कि आप और आपके गुरु दोनों की अक्ल क़ायम नहीं है । रामदास जी रो पड़े और बोले कि आप मुझे चाहे जो मरज़ी कह लो , लेकिन गुरु साहिब को कुछ न कहो , क्योंकि अगर गुरु साहिब की अक़्ल क़ायम नहीं तो किसी की भी अक़्ल क़ायम नहीं है । गुरु साहिब अगर इसी तरह सारी उम्र त रामदास सारी उम्र चबूतरे बनाता रहेगा ।
आपने ख़ुशी – ख़ुशी सत्तर बार चबूतरे बनाये और सत्तर बार गिराये । इस पर गुरु अमरदास जी ने कहा , ‘ रामदास ! अब तुम भी चबूतरे बनाना छोड़ दो । मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ क्योंकि एक तुम ही हो जिसने बिना कुछ कहे पूरे समर्पण से मेरा हुक्म माना है । ‘ गुरु साहिब चबूतरे क्यों बनवाते और गिरवाते थे ? केवल इसलिए कि जिस हृदय में नाम रखना है और जहाँ से करोड़ों जीवों को फायदा उठाना है , वह हृदय भी किसी क़ाबिल होना चाहिए । रामदास जी का दृढ़ प्रेम देखकर आख़िर गुरु अमरदास जी ने उनको अपनी छाती से लगा लिया और रूहानी दौलत से भरपूर कर दिया ।
मालिक सब देखता है

ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ मालिक नहीं है । तेरी बादशाहत से कहाँ जाऊँ ? तेरी हुजूरी से भागकर कहाँ जाऊँ ? यदि मैं आसमानों पर चढ़ जाऊँ , तू वहाँ भी मौजूद है । यदि पाताल में अपना डेरा तान लूँ तो तू वहाँ भी है ।129 साम्ज़
किसी महात्मा के पास दो आदमी नाम लेने आये । उनमें से एक अधिकारी था , दूसरा अनधिकारी । महात्मा कमाईवाले थे । उन्होंने दोनों को एक – एक बटेर * दे दिया और कहा कि जाओ , इनको उस जगह जाकर मार लाओ , जहाँ कोई और न देखे । उनमें से एक तो झट से पेड़ की ओट में जाकर बटेर को मारकर ले आया । जो दूसरा था वह उजाड़ में चला गया ।
अब वह सोचता है कि जब मैं इसे मारता हूँ तो यह मुझे देखता है और मैं इसे देखता हूँ । तब तो हम दो हो गये , तीसरा परमेश्वर देखता है , मगर महात्मा का हुक्म था इसे वहाँ मारो जहाँ कोई न देखे । आखिर सोच – सोचकर बटेर को महात्मा के पास ले आया और बोला कि महात्मा जी ! मुझे तो ऐसी कोई जगह नहीं मिली जहाँ कोई न देखता हो क्योंकि मालिक हर जगह मौजूद है । महात्मा ने कहा , मैं तुझे नाम दूंगा और दूसरे से कहा , जाओ , अपने घर !
इसलिए अगर मालिक को हर जगह हाज़िर – नाज़िर समझें , तो हम कोई ऐब , पाप या बुरा काम न करें ।
संतों के सामने घमंड
होह सभना की रेणुका तउ आउ हमारे पास ॥131 गुरु अर्जुन देव
शेख़ फ़रीद को बहुत कम आयु में ही रूहानियत की गहरी लगन थी । उन्होंने ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का नाम सुना हुआ था जो राजस्थान के एक शहर अजमेर में रहते थे । उनसे दीक्षा लेने जब वे अजमेर पहुँचे तो देखा कि वे एक सूखे पेड़ का सहारा लेकर बैठे हैं ।
फ़रीद को इस बात पर बहुत हैरानी हुई कि एक कामिल फ़क़ीर ने पेड़ का सहारा लिया हो और वह पेड़ फिर भी सूखा हो ! उन्होंने अपनी योगशक्ति का प्रयोग करते हुए सूखे पेड़ पर दृष्टि डाली और वह एकदम हरा हो गया । ख़्वाजा साहिब ने यह सब देखा और पेड़ पर नज़र डाली , वह फिर पहले की तरह सूख गया । फ़रीद नहीं चाहता था कि पेड़ इसी तरह सूखा रहे । उन्होंने एक बार फिर उसे हरा कर दिया और ख़्वाजा साहिब ने पल – भर में उसे वापस उसी हालत में पहुँचा दिया । ख़्वाजा साहिब फ़रीद की ओर मुड़े और बोले , ‘ बेटा , तुम यहाँ रूहानी राज़ जानने और मालिक से मिलाप करने के लिए आये हो या कुदरत के क़ानूनों में दखल देने के लिए ? परमात्मा के हुक्म से ही यह पेड़ सूख गया है । तुम कुदरत की व्यवस्था में दखल देकर इस सूखे पेड़ को बार – बार हरा क्यों करना चाहते हो ? जाओ , अब तुम दिल्ली में कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी के पास जाओ । वही तुम्हारे मन की हालत देखकर तुम पर बख्रिशश करेंगे । ‘
हुक्म के अनुसार फ़रीद दिल्ली पहुँच गये । वहाँ पहुँचकर क्या देखते हैं कि कुतुबुद्दीन , जो उस समय अभी बालक ही थे , अपने साथियों के साथ खेल रहे हैं । कुछ देर तक संदेहपूर्ण दृष्टि से फ़रीद उन्हें देखते रहे , फिर अपने मन में सोचा , यह नादान बालक भला मुझे क्या शिक्षा देगा !
हज़रत कुतुबुद्दीन देखने में तो बालक थे , लेकिन उनकी रूहानी अवस्था ऊँची थी । खेल छोड़कर वे पास की कोठरी में गये और एक मिनट बाद ही सफ़ेद लंबी दाढ़ी वाले बुजुर्ग के रूप में बाहर आ गये और कहने लगे , ‘ अब तो तुम्हारा मुर्शिद बनने के लिए मैं पूरा बुजुर्ग और समझदार दिखायी देता हूँ ? ‘ फ़रीद को अपनी अज्ञानता और अहंकार का एहसास हो गया और शर्म से उनकी गर्दन झुक गयी । घुटनों के बल गिरकर उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और दया की भीख माँगी । फिर उनकी संगति में रहकर उनके सच्चे शिष्य बने और समय बीतने पर खुद कामिल फ़क़ीर बने ।
संतों की संगति का लाभ प्राप्त करने के लिए दीनता और नम्रता आवश्यक है ।
मुर्दा खाने का हुक्म

अपनी बुद्धि का सहारा न लेना बल्कि संपूर्ण मन से यहोवा ( प्रभु ) पर भरोसा रखना । उसी को याद करके सब काम करना , वह तेरा मार्गदर्शन करेगा ।42 प्रॉवर्बज़
एक बार गुरु नानक साहिब ने अपने सेवकों को मुर्दा खाने के लिए कहा । तो देखने में यह मुनासिब हुक्म नहीं था । हम तो मुर्दा छू जाने पर नहाते हैं । फिर मुर्दा खाये कौन ? एक भाई लहणा खड़े रहे , बाक़ी सब शिष्य चले गये । यह सबको नामुनासिब हुक्म लगा था , लेकिन भाई लहणा को नहीं । जब वह मुर्दे के इर्दगिर्द घूमने लगा तो गुरु साहिब ने उससे पूछा , ‘ क्या कर रहे हो ? ‘ भाई लहणे ने उत्तर दिया , ‘ हुजूर ! मुझे समझ नहीं आ रही कि मुर्दे को किस तरफ़ से खाना शुरू करूँ । ‘ जब वह खाने लगा तो देखता है कि वहाँ कोई मुर्दा नहीं था , बल्कि मुर्दे की जगह उसके सामने गुरु का प्रसाद , मीठा हलवा पड़ा था । गुरु नानक साहिब ने उनको गुरु – गद्दी का हक़दार बना दिया और वह भाई लहणा से गुरु अंगद साहिब बन गये । अंगद का अर्थ है , ‘ गुरु का अपना अंग या हिस्सा ‘ । इसी तरह जब गुरु गोबिन्द सिंह ने अपने शिष्यों की परख की , तब पाँच हज़ार में से सिर्फ पाँच प्यारे निकले ।
जब गुरु परखता है तो बड़े – बड़े फ़ेल हो जाते हैं । जीव का इम्तिहान में पास होना बड़ी मुश्किल बात है । गुरु किसी का इम्तिहान न ले ।
इंद्र का तीर – कमान

जेती लहरि समंद की , तेते मनहिं मनोरथ मारि । बैसै सब संतोष करि , गहि आतम एक बिचारि।।56 संत दादू दयाल
एक ऋषि ने इतनी तपस्या की कि स्वर्ग के राजा इंद्र को डर लगने लगा कि कहीं ऋषि उसका सिंहासन न छीन ले । वह हाथ में तीर – कमान लेकर शिकारी का रूप धारण करके ऋषि की कुटिया पर आया और अर्ज़ की कि मैं किसी काम से जा रहा हूँ , मेरे पास यह तीर – कमान है जो बहुत भारी है , मुझे अभी इसकी ज़रूरत नहीं है , इसलिए इसे अपने पास रख लें । थोड़ी देर बाद आकर ले जाऊँगा । ऋषि ने कहा कि मैं ऋषि ! यह तीर – कमान ! मेरा इसका क्या संबंध ! इंद्र ने मिन्नत की कि कृपा करके रख लो । मैं थोड़ी देर में आकर इसे ले जाऊँगा । ऋषि ने कहा , ‘ यह तो जीवों को मारने के लिए इस्तेमाल किया जाता है । मेरा हृदय तो ऐसी चीजें देखकर भी दु : खी होता है । इसलिए मैं इसका ख़याल कैसे रखूगा ? ‘ शिकारी ने नम्रता से कहा , ‘ मान्यवर ! मेरे पास एक सुझाव है । मैं तीर – कमान को कुटिया के पीछे रख देता हूँ । आप इसे कभी न देखेंगें और इस तरह आप मुझे एक बड़ी आपत्ति से बचा लेंगे । ‘ और फिर इंद्र ने ऋषि की बड़ाई करनी शुरू कर दी कि आप ऐसे हैं , आप वैसे हैं , मुझ पर दया करो । जब बहुत बार कहा तो ऋषि ने मान लिया और कहा कि इसको कुटिया के कोने में रख दो ।
इंद्र तो तीर – कमान रखकर चलता बना , अब वापस किसे आना था ? ऋषि पहले राजा था और तीर – कमान चलाने में अच्छी तरह माहिर था । इसलिए जब भजन से उठता तो तीर – कमान का ख़याल आ जाता । रोज़ – रोज़ तीर – कमान का ध्यान मन में पक्का होता गया । एक दिन कहता है , ‘ कभी हम भी तीर चलाते थे , ज़रा चलाकर तो देखें , किसी को मारेंगे नहीं । ‘ यह सोचकर , तीर – कमान हाथ में लेकर तीर चलाया , सीधा निशाने पर जा लगा । और शौक़ बढ़ा । रोज़ – रोज़ अभ्यास करने लगा । आख़िर वह पूरा शिकारी बन गया । भजन – बंदगी छूट गयी और लगा शिकार के पीछे – पीछे फिरने ।
सो ऐसे हैं मन के धोखे । ज़रा – सा इसको ढीला छोड़ो , झट बुरी आदतें अपना लेता है ।
चोर से कुतुब

यदि खुश्क पत्थर या संगमरमर है तो कामिल फकीर की सोहबत में जाने पर तू हीरा बन जायेगा ।67
हजरत अब्दुल कादिर जीलानी फ़ारस देश के बहुत कमाई वाले महात्मा थे । मुसलमानों में फकीरों के दर्जे होते हैं – कुतुब , गौस आदि । किसी जगह मौलाना रूम का क्रुतुब मर गया था । वहाँ के लोगों ने आकर अर्ज़ की कि हज़रत , हमें कुतुब चाहिए । आपने कहा कि भेज देंगे । कुछ दिनों तक जब कुतुब न भेजा तो उन्होंने सोचा शायद हममें से किसी को क़ुतुब चुनना होगा , तो वे फिर आये और अर्ज़ की कि हज़रत , कुतुब चाहिए । कहने लगे , ‘ भेज देंगे । थोड़ा और धैर्य रखिये , यह इतना आसान नहीं , ऐसे काम के लिए कुछ समय चाहिए । ‘
कुछ दिन इंतज़ार करने के बाद लोगों ने तीसरी बार अर्ज़ की कि कुतुन की सख्त ज़रूरत है इसलिए क़ुतुब जल्दी भेजा जाये । आपने कहा , ‘ अच्छा कल ले जाना । ‘ हज़रत अब्दुल क़ादिर अंतर्यामी थे । उन्हें मुरीदों में कोई भी ऐसा कमाईवाला नज़र नहीं आया जो क़ुतुब के लायक हो । मन में सोचा कि क़ुतुब कहाँ से देंगे ।
रात को एक चोर पीर साहिब के यहाँ उनकी घोड़ी चुराने के लिए आया । पहले आगे के पैर खोले , फिर पीछे के । जब पीछे के खोले तो आगे के बँध गये । जब आगे के खोले तो पीछे के बँध गये । चोर हठीला था । तय कर लिया कि घोड़ी ज़रूर लेकर जानी है । सारी रात खोलता रहा । जब भजन का वक़्त हुआ तो पीर साहिब जागे । क्या देखते हैं कि एक व्यक्ति घोड़ी खोल रहा है । आपने पूछा , ‘ भाई , तू कौन है और क्या कर रहा है ? ‘ उसने कहा , ‘ हज़रत ! मैं चोर हूँ , सारी रात लगा रहा और बना कुछ भी नहीं ! ‘ आपको उसकी यह अदा पसंद आ गयी कि इसने सच कहा है । प्यार के साथ कहा , ‘ आ तुझे यह घोड़ी दे दूँ । ‘ ज्यों ही नज़र भरकर उसे देखा , उसे चोर से क़ुतुब बना दिया । जब दिन हुआ तो उन लोगों ने आकर अर्ज़ की कि हज़रत , हमें क़ुतुब दो । आपने कहा कि जैसा मैंने आप से वायदा किया था , यह रहा तुम्हारा क़ुतुब और तुम देखोगे कि इतना श्रेष्ठ क़ुतुब सारी दुनिया में नहीं होगा ।
गुरु अपनी दयादृष्टि से जो चाहे कर दे ।