कबीर साहिब चेतावनी देते है: कबीर सोता क्या करें, उठ के जपो दयार। एक दिना है सोवना,लंबे पाव पसार।। (कबीर साखी संग्रह पृष्ठ स 62) संतो महात्माओं ने मनुष्य को गाफिल, अचेत, मूर्ख, अज्ञानी, बावरा आदि कई नामों से पुकारते हुए उसको अनेक प्रकार की चेतावनी दी है। सबसे पहली बात महात्मा हमे यह समझाते […]
चिन्ता सर्वव्यापक रोग है। सारा संसार चिंतारूपी आग में जल रहा है। गुरू नानक देव जी कहते है” चिंतत ही दिसे सभ कोई।।” (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ९३२) गुरु अर्जुन देव जी कहते है ” जिस गृह बहुत तिसे गृह चिंता।। जिस गृह थोरी सु फिरे भ्रमंता।। (आदि ग्रंथ पृष्ठ स १०१९) किसी को पैसा […]
संतो महात्माओं ने अंतर में सूक्ष्म रूहानी अनुभवों, रूहानी मंडलो की स्थिति और परमात्मा से मिलाप के सहज ज्ञान और आनंद को अकथ, अकह, ला बयान कहा है। यह गूंगे का गुड़ है। जिस तरह गूंगा व्यक्ति गुड़ के स्वाद बयान नहीं कर सकता, उसी प्रकार इस सूक्ष्म अनुभव को स्थूल इन्द्रियों के स्तर पर […]
तीन चीजों का ध्यान हमारे रूहानी सफ़र में हमारा सहायक हो सकता है : .
परमात्मा का ध्यान नाम या शब्द का ध्यान जो परमात्मा का क्रियात्मक रूप है गुरु का ध्यान जो परमात्मा का प्रकट रूप है .
हमारे जीवन का उद्देश्य मालिक को देखना है , उसका सिमरन और उसका ध्यान करना है । पर उसको हमने कभी देखा नहीं , जिसको देखा नहीं उसका ध्यान कैसे हो सकता है ?
बिनु पेखे कहु कैसो धिआनु ।। आदि ग्रन्थ , पृ .1140
वह मालिक जिसका हमें ध्यान करना है , खण्डों – ब्रह्माण्डों के पार है । वह निराकार है और हमारे मन तथा बुद्धि की पहुँच से परे है । उसका असली स्वरूप शब्द है जो बे – ज़बानी की ज़बान है । लेकिन जिस पवित्र हृदय में उसका वास है और जिसकी आत्मा रूपी बूंद परमात्मा रूपी समुद्र में अभेद हो चुकी है , वह वास्तव में परमात्मा में और परमात्मा उसमें समाया हुआ है । ऐसी हस्ती के लिए सत्य ही कहा गया है :
शब्द ने देह धारण की और हमारे बीच निवास किया । बाइबल , जॉन 1:14
ऐसा महान् व्यक्तित्व , सतगुरु , हमारे ध्यान करने के योग्य है , क्योंकि उसमें पाँच तत्त्व पूर्ण हैं । मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ योनि है । सतगुरु मानव – जाति में सबसे श्रेष्ठ है । इसको छोड़ शेष सारी सृष्टि – पीपल , तुलसी आदि जिनमें एक तत्त्व , साँप आदि जिनमें दो तत्त्व , गरुड़ आदि जिनमें तीन तत्त्व औरगाय आदि जिनमें चार तत्त्व मौजूद हैं – मनुष्य – योनि से नीचे है । इनमें से किसी का भी ध्यान या पूजा करना नीचे की ओर जाना है ।
सब सन्तों – महात्माओं ने गुरु के ध्यान को सफलता का साधन बताया है , क्योंकि गुरु आदर्श मनुष्य है । सतगुरु का स्वरूप साक्षात् अकालमूर्ति है , वह ध्यान करने के लिए सर्वोत्तम है और सबसे अधिक फलदायक है :
अकाल मूरति है साध संतन की ठाहर नीकी धिआन कउ ।। आदि ग्रन्थ , पृ . 1208
सतगुरु में सत्य का जुहूर ( प्रकाश ) है । वह सत्य का स्वरूप है । इसलिए उसको ध्यान का मूल समझो :
सतिगुरु सति सरूपु है धिआन मूलु गुर मूरति जाणै ।। वाराँ भाई गुरदास , 6:19
साधु – सन्तों की देह वह दर्पण है जिसमें मालिक की झलक दिखायी देती है । मालिक अलख है । जो उसको देखना चाहे वह उसे सन्तों में ही देख सकता है :
निराकार की आरसी , साधोंहीं की देंहि ।लखा जो चाहै अलख को , ( तो ) इन्हीं में लखि लेहि ॥ कबीर साखी संग्रह , भाग 1 और 2 , पृ . 119
ध्यान – योग में तीन प्रकार के ध्यान आ जाते हैं : . . स्थूल ध्यान -गुरु के स्थूल रूप का ध्यान, सूक्ष्म ध्यान- निरत के खुलने पर जो ज्योति प्रकट होती है उसका ध्यान, गुरु के नूरी स्वरूप का ध्यान- जो सूक्ष्म और कारण मण्डलों में से शिष्य को ले जाकर उसकी आत्मा को परमात्मा में लीन कर देता है।
जब तक गुरु स्थूल शरीर में बैठा है , वह नहीं कहता कि मैं गुरु हूँ और न ही वह कहता है कि मेरा ध्यान करो । गुरु शीशे के समान है जिसमेंहमारे हृदय की किरणें टकराकर हमें हमारा अपना रूप दिखाती हैं । यदि हँसते हुए देखें तो हँसता चेहरा दिखायी देता है , यदि रोते हुए देखें तो रोता हुआ । शीशा यह नहीं कहता कि मुझे देखो । गुरु को कोई ज़रूरत नहीं कि शिष्य उसका ध्यान करे , गुरु का ध्यान करने में शिष्य का ही लाभ है।
जब तक सिमरन द्वारा अन्तर में गुरुदेव का नूरी स्वरूप प्रकट नहीं होता , तब तक हमें बाहरी स्वरूप के ध्यान की ज़रूरत है । जब यह नूरी स्वरूप प्रकट हो जाता है तो यह शिष्य को खण्डों – ब्रह्माण्डों पर ले जाता है । ऊपरी मण्डलों में उसका दिव्य प्रताप विशेष आकर्शक है और उसका प्रकाश सूक्ष्म देशों में दूर – दूर तक फैल जाता है ।
जिस तरह किसी महल पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों की ज़रूरत होती है और उनके बिना महल पर नहीं चढ़ सकते , उसी तरह गुरु के ध्यान के बिना हम हरि तक नहीं पहुँच सकते :
परमार्थ में जो भी लाभ प्राप्त होता है , जीवित गुरु के ध्यान द्वारा होता है । महात्माओं के चित्रों से यह काम नहीं हो सकता । तुलसी साहिब फ़रमाते हैं कि कल्पवृक्ष का चित्र बनाकर उसके आगे चाहे हजारों विनतियाँ करें , उससे कुछ प्राप्त नहीं हो सकता । तस्वीर का ध्यान करने से उसका कागज और फ्रेम अन्तर में आ जाते हैं जो स्वयं जड़ वस्तुएँ हैं , वे चेतन को कैसे खींच सकती हैं ? चेतन को तो चेतन ही खींच सकता है :
कलप वृक्ष के चित्र लख , कीनै विनय हज़ार । बित न पावें ताहि सिउ , तुलसी करे विचार ।
जब अन्तर में सतगुरु का नूरी स्वरूप प्रकट हो जाये तो शिष्य को चाहिए कि वह अपना ध्यान इसमें इस तरह लीन कर दे कि उसको यह सुध ही न रहे कि वह मैं हूँ या मैं वह हूँ । अमीर ख़ुसरो फ़रमाते हैं कि मैं हो गयाऔर त् मैं बन गया । मैं तन बन गया और तु मेरी जान बन गया और अब कोई यह न कहे कि मैं और तु दो हैं :
मन तू शुदम तू मन शुदी , मन तन शुदम तू जां शुदी , ता कस नगोयद बअद अर्जी मन दीगरम तू दीगरी । अमीर खुसरों , पृ . 112
जब ध्यान पूर्ण हो जाता है तो उपासक , उपास्य और उपासना की त्रिपुटी नहीं रहती । पूजा , पूज्य और पुजारी मिलकर एक हो जाते हैं । गुरु अमरदास जी फरमाते हैं कि अपने आपको छोड़कर गुरु में समा जाओं :
इस अवस्था को मुसलमान फ़क़ीर फ़नाफ़िलशैख ( शेख या मुर्शिद में सम्मा जाना ) होना कहते हैं । गुरु तो पहले ही फनाफ़िल्लाह ( प्रभु में लीन ) है । जो शिष्य गुरु के नूरी स्वरूप में लीन हो जाता है , उसमें अपने आप ही परमात्मा का निवास हो जाता है । गुरु उस परमात्मा का देहस्वरूप है । जो शिष्य गुरुमुख बन जाता है उसके अन्तर में अनायास , बेइजियार , परमात्मा बस जाता है ।
नोट: यह विषय और विचार मूल रूप से आरएसएसबी बियास, द्वारा प्रकाशित पुस्तक गुरूमत सार में से लिया गया है।
संत महात्मा अपनी शरण में आए जीव को परमात्मा से मिलाप की मंजिल पर पहुंचने के लिए अंतर्मुख रूहानी अभ्यास की जो युक्ति सीखते है, उसे संत मत में नाम दान, गुरु मंत्र, गुरु उपदेश, गुरु का शब्द, गुरु का नाम, गुरु का वचन, गुरु की दीक्षा आदि नामों से जाना जाता है। इस दीक्षा,उपदेश […]
गुरु- ज्ञान, गुरुमत या संत मत का अर्थ है – गुरुओं और संतो महात्माओं द्वारा बताया गया प्रभु की प्राप्ति का मार्ग या साधन है। संत महात्मा समझाते है कि जिस परमात्मा ने संसार को चलाने के सब नियम बनाए है, उसने अपने साथ मिलाप या मार्ग या साधन भी सृष्टि के आरम्भ में स्वय […]
मनुष्य जब मालिक का सिमरन लगातार , हर साँस के साथ किया जाता है , तो की चेतना जाग्रत होकर परमात्मा का अनुभव करती है । जिन सन्तों महात्माओं ने परमात्मा का अनुभव किया है , उसका साक्षात्कार किया है , उनके द्वारा दिये गये नाम का सिमरन अत्यन्त लाभदायक होता है , क्योंकि उससे गुरु और शिष्य के बीच सीधा भावनात्मक सम्बन्ध बन जाता है और सफलता जल्दी मिलती है । इस तरह आत्मा को रूहानी मण्डलों में किसी प्रकार की रुकावट नहीं होती और उसका सफ़र जल्दी तय हो जाता है ।
किसी सहज आसन पर बैठकर , आँखों के पीछे दोनों भृकुटियों के बीच में आत्मा के स्थान पर स्थिर होकर , सुरत की ज़बान द्वारा पूरे शौक़ और तत्परता के साथ सिमरन करना चाहिए । इस प्रकार सिमरन करने से मन की चंचलता दूर होती है और पूर्ण एकाग्रता हो जाती है । तन , मन और वचन को स्थिर रखकर , अडोल रहकर , विधिपूर्वक सिमरन करना चाहिए । साथ । ही सुरत और निरत को भी स्थिर करना चाहिए । कबीर साहिब कहते हैं कि ऐसे पूर्ण रीति से किये गये एक पल के सिमरन की बराबरी अन्य प्रकार से कल्प – पर्यन्त किये गये सिमरन भी नहीं कर सकते :
तन थिर मन थिर बचन थिर , सुरत निरत थिर होय । कह कबीर इस पलक को , कलप न पावै कोय ।। कबीर साखी – संग्रह , भाग 1 और 2 , पृ .89
सिमरन संस्कृत के ‘ स्मृ ‘ धातु से बना है जिसका अर्थ है याद करना , किसी मन्त्र आदि को याद करना या बार – बार दोहराना । सिमरन में कई प्रकार के जाप शामिल हैं । कई लोग हाथों की अंगुलियों से , कई जबान से , कई कण्ठ से , कई हृदय से और योगीजन नाभि चक्र पर प्राणों की हिलोर द्वारा सिमरन करते हैं । यदि सिमरन करते समय सुरत साथ रहे तो वह सिमरन लाभदायक होता है । यदि माला हाथ में फिरती है , जबान मुँह में फिरती है और मन चारों ओर दौड़ता फिरता है या सिमरन कण्ठ या हृदय में होता है तो सिमरन से पूरा लाभ प्राप्त नहीं होता :
माला तो कर में फिरै , जीभ फिरै मुख माहिं । मनुवाँ तो दुइ दिसि फिरै , यह तो सुमिरन नाहिं । कबीर साखी – संग्रह , भाग 1 और 2 , पृ .89
क्रिया करै अँगुरी गनै , मन धावै चहूँ ओर । जेहि फेरे साईं मिलै , सो भया काठ कठोर ॥ कबीर साखी – संग्रह , पृ .89
माला या अन्य बाहरी साधनों को लेकर सिमरन करना सबसे कम लाभदायक है , और ज़बान से , कण्ठ से और हृदय से सिमरन करना क्रमश : एक – दूसरे से अधिक लाभदायक है ।
ये सिमरन उतनी हद तक ही फलदायक होते हैं जितनी तीव्र तवज्जुह के साथ ये किये जाते हैं । माला और जबान आदि का सिमरन यंत्रवत् होता है , इसलिए फलदायक नहीं होता । सुरत की ज़बान से , आत्मा के स्थान पर बैठकर सिमरन करना , जिसे जिक्रे – रूही कहा जाता है , विशेषकर सन्तों महत्माओं का तरीका है और उनसे ही इसका ज्ञान होता है ।
सन्तों ने सुरत या तवज्जुह की ज़बान द्वारा जप , सिमरन , जिक्र या विद करने का आदेश दिया है । ‘ सुरत ‘ शरीर , मन और इन्द्रियाँ सबको आधार देनेवाली सत्ता है । इसलिए सुरत के द्वारा सिमरन करने से शरीर , इन्द्रियाँ और मन स्थिर हो जाते हैं ।
इसके सिवाय और जो भी सिमरन हैं , उनसे किसी हद तक हृदय शुद्ध होता है और कुछ रस भी प्राप्त होता है । इनसे अन्तर्यामिता और ऋद्धियाँ सिद्धियाँ भी जाग उठती हैं , लेकिन ये रूहानी अभ्यास के लिए अन्तर्मुख अडोल बैठने में , अन्तर के पट खुलने में , अनहद की झंकार का आनन्द लेने में और आत्मा के रूहानी मण्डलों पर जाने में सहायक नहीं होते ।
प्रभ कै सिमरनि अनहद झुनकार ॥ सुखु प्रभ सिमरन का अंतु न पार ॥ आदि ग्रन्थ , पृ .263
बहुत से लोग पाठ पूजा, तीर्थ व्रत, दान पुण्य , घर बार त्याग कर जंगलों पहाड़ों में भटकना आदि बहार्मुखी क्रियाओं को भक्ति का साधन मान बैठते है। बाहरमुखी साधना के पीछे भाग रही दुनिया को सचेत करते हुए दरिया साहिब फरमाते है:
दुनिया भरम बोराई । आतमराम सकल घट भीतर , जाकी सुध न पाई । मधुरा काशी जाय द्वारिका , अड़सठ तीरथ ह न्याहवे । सतगुरु बिन सोजी नहीं कोई , फिर – किर गोता खावे ॥
संसार के लोग भ्रमों में फंसकर बाक्ले हुए फिर रहे हैं । हालाँकि प्रा अंतर में है , लेकिन इस बात की किसी को सुध या अठसठ तीर्थों पर नहाने से मन की मैल नहीं उतरती और हम जन्म – मरण के चक्र से भी मुक्त नहीं हो सकते । सतगुरु के मार्गदर्शन के बिना हमें सच्चा ज्ञाम नहीं मिल सकता , फलस्वरूप हम भवसागर में गोते खाते रहते हैं ।
दरिया साहिब ने आडंबरों को कोई महत्त्व नहीं दिया है , क्योंकि उनके अनुसार यूजा , अर्चना और आरती मंदिर में नहीं बल्कि घट ( हृदय ) के भीतर होनी चाहिए ।
अज्ञानता के कारण बाहरमुखी साधनों में फंसे हुए जीवों को चेताने का प्रयास करते हुए दरिया साहिब कहते हैं :
दरिया तीनूँ लोक में , ढूंढ्या सवही धाम । तीरथ व्रत विधि करत बहु , बिना राम किण काम ।
उस प्रभु की खोज में जीव चाहे तीनों लोकों में भटकता फिरे , चाहे चारों धाम की यात्रा में समय लगाए या फिर तीर्थ – व्रत आदि अन्य सब प्रकार के धर्म कर्म कर , लेकिन असलियत यही है कि राम नाम के बिना परमात्मा से मिलाप नहीं हो सकता ।
कर्मकांड , मूर्ति पूजा आदि बाहरमुखी साधनों को नकारते हुए दरिया साहिब ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंतर्मुख होकर की गई भक्ति ही सच्ची भक्ति है । वह कहते हैं :
चेतन मूरत जड़ को सेवै , बड़ा थूल मत गैला । देह आचार किया कहा होई , भीतर है मन मैला । तीर्थ दान जग प्रतिमा सेवा , यह सब सुपना लेवा देवा ।
कितने अफ़सोस की बात है कि मनुष्य चेतन प्राणी होते हुए भी जड़ पदार्थों की पूजा में लगा रहता है । इससे बड़ी नासमझी और क्या हो सकती हैं ! जब तक मन के अंदर मैल भरी हुई है , तब तक शरीर को शुद्ध करने या बाहरी भेष धारण करने से क्या लाभ । तीर्थ , दान , प्रतिमा का पूजन आदि सब सपने की तरह हैं और ये सब जीव को लेन – देन के चक्र में फँसाए रखते हैं ।
माला फेरने के बारे में दरिया साहिब कहते हैं :
माला फिरी तो का भया , मन फाटै कर भार । दरिया मन । फेरिये , जामें बसै बिकार ॥168
जो मन फेरे राम दिस , तो कलि बिष नाखै धोय । दरिया माला फेरता , लोग दिखावा होय ॥169
दरिया साहिब प्रश्न करते हैं कि माला फेरने से क्या होता है ? फेरना यानी पलटना तो मन को है जिसमें विषय – विकार भरे हुए हैं । मन की वृत्ति को विषय – विकारों से पलटकर परमात्मा की ओर करना है । मन को राम की ओर फेरना है । जो अभ्यासी मन को परमात्मा की ओर मोड़ देता है , वहीं मन के ऊपर चढ़ी विषय – वासना की मैल को नाम के जल से धो पाता है वरना हाथ में माला फेरना तो केवल लोक दिखावा ही है :
कंठी माला काठ की , तिलक गार का होय । जन दरिया निज नाम बिन , पार न पहुँचै कोय ॥
वह कहते है कि कंठी और माला लकड़ी की होती है । माथे पर लगाया तिलक मिट्टी का होता है । कुछ लोग माथे पर तिलक लगाकर और हाथ में साला लेकर धर्मात्मा होने का दिखावा करते हैं , परंतु तिलक लगाने और साला फेरने से बात नहीं बनती । अंतर्मुखी अभ्यास और सच्चे प्रेम के बिना परमात्मा से मिलाप असंभव है ।
दरिया साहिब निडर होकर कहते हैं कि जिन्होंने सतगुरु की शरण नहीं ली , वे बेशक पाँच – सात साखियाँ सुना दें , दस – बारह पद गा दें , उनकी यह करनी उन्हें संसार – सागर से पार कराने में समर्थ नहीं हो सकती । हाँ , यह पेट भरने का साधन अवश्य हो सकती है :
पद गावे साखी कहे , मन्न रिझावे आन । दरिया कारज ना सरै , देह करी गुजरान ।। पांच सात साखी कही , पद गाया दस दोय । दरिया कारज न सरै , पेट भराई होय ॥171
धार्मिक पुस्तकों से ज्ञान की बातें सीखकर परमात्मा की चर्चा करनेवाले की ओर इशारा करते हुए वह कहते हैं :
सीखत ज्ञानी ज्ञान गम , करै ब्रह्म की बात । दरिया बाहर चाँदना , भीतर काली रात ॥172
ऐसा व्यक्ति कथनी से तो ज्ञानी लगता है , लेकिन अनुभव न होने के कारण उसके अंदर अज्ञानता का अँधेरा छाया रहता है । आपके कहने का मतलब है कि केवल किताबी ज्ञान प्राप्त करके कथा – कहानी सुनाने से कोई भक्त नहीं बन जाता । पद गाने या ज्ञान की बात सुनने – सुनाने से मन और आत्मा की अवस्था में बदलाव नहीं आता । निजी अनुभव के बिना ऐसा ज्ञान थोथा ज्ञान ही साबित होता है ।
दरिया साहिब वाचक ज्ञानी के बारे में एक दृष्टांत देते हुए कहते हैं कि जिसकी कभी संत – सतगुरु से भेंट नहीं हुई , जिसने नाम का भेद नहीं लिया , ऐसे वाचक ज्ञानी की सारी करनी उसी प्रकार निष्फल हो जाती है , जिस प्रकार किसी खेत को जोतने के बाद यदि उसमें पानी न दिया जाए तो सारी मेहनत बेकार हो जाती है :
सतगुरु को परस्या नहीं, सिख्या सबद सो हेत। दरिया कैसे नीपजे, तेह बिहुना खेत।।
ऐ मानव ! तू कब तक घड़े के बाहरी साँचे – ढाँचे और सजावट से मोहित होकर भ्रम में पड़ा रहेगा ? इनसे हटकर , घड़े के अन्दर जो पानी है उसकी ओर दृष्टि डाल । तू कब तक बाहरी सूरतों पर मोहित होता रहेगा ? हक़ीक़त का खोजी बन और हक़ीक़त की तलाश कर । बाहर से दिखायी देनेवाली सूरतें नाशवान् हैं , केवल वह सच्चाई ( हक़ीक़त ) अटल और ( बाहरी शक्लों को देखकर और उनमें मग्न होकर हक़ीक़त चेतना के स्तर निश्चल है । की ओर से बेसुध हो रहा है । यदि समझदार है तो सीप में से मोती को निकाल ले , यह सीप तो केवल बाहरी खोल है । यह खोल केवल किसी बहुमूल्य वस्तु को रखने के लिए बनाया गया है । तुझे इसके अन्दर झाँकने की ज़रूरत है ।
सौभाग्यवश अपनी आत्मा के विकास के लिये हम कुछ क़दम उठा सकते हैं । हमें पिछले महात्माओं के अनमोल वचनों के भण्डार को खोलकर देखना चाहिए , उनमें आत्मा की खुराक छिपी हुई है , जिसे खाकर मन और आत्मा तृप्त हो सकती हैं । गुरु अर्जुन साहिब फ़रमाते हैं :
पीऊ दादे का खोलि डिठा खजाना ॥ ता मेरै मनि भइआ निधाना ॥ आदि ग्रन्थ , पृ .186
मनुष्य – शरीर हाथ , पैर तथा अन्य बहुमूल्य अंगों से लैस है और उसकी बनावट अत्यन्त सुन्दर है । पर यह बात स्पष्ट है कि शरीर के सारे अंगों में आँखों का स्थान सबसे ऊँचा है । इनका कार्य भी सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है । ये हमारी आन्तरिक अशान्त या शान्त अवस्था की झलक देती हैं । इसलिए इन्हें आत्मा के झरोखे कहा जाता है । ये हमारी आन्तरिक गति और भावनाओं का प्रभाव औरों पर डालती हैं । एक ख़याल भी जब इसके अन्दर झलकता है तो सैकड़ों संसार उलट – पलट हो जाते हैं । इनकी एक निराली बोली है , जो मूक है , इशारे – इशारे में ही वह सब प्रकट कर देती है जो और किसी तरह भी प्रकट नहीं किया जा सकता ।
जाग्रत् अवस्था में , आत्मा और मन आँखों के पीछे अपनी बैठक से कार्य करते हैं । यदि किसी अन्धे को आवाज देकर पुकारें तो वह भी आँखों के केन्द्र पर ही जोर देकर कहता है , ” हाँ भाई ! ” सपने में मन और आत्मा आँखों के केन्द्र से नीचे कण्ठ – चक्र में होते हैं और गहरी निद्रा में नाभि चक्र में । यदि हमें उस भेद को जानना है जो मन की जाग्रत् अवस्था से ऊपर है , तो हमें अपनी चेतना ( सुरत ) को जाग्रत् अवस्था से ऊँची अवस्था में ले जाने की कोशिश करनी है । सन्तों का मार्ग , इसलिए , आँखों के केन्द्र से शुरु होकर सुरत को चेतना की उच्चतर अवस्था में ले जाता है ।
इस मार्ग पर चलने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि हम उन मण्डलों का ज़िक्र करें , जो आत्मा अपनी यात्रा के दौरान अनुभव करती है । समस्त सृष्टि को चार मुख्य स्तरों पर बाँटा जा सकता है :
पिण्ड अण्ड ब्रह्माण्ड सचखण्ड
सृष्टि का ज्ञान प्राप्त करने और परमात्मा के पास पहुँचने का मार्ग इस भौतिक शरीर के अन्दर है क्योंकि जो कुछ बाहर की रचना है , वह मनुष्य शरीर के अन्दर भी है :
जो ब्रहमंडे सोई पिंडे जो खोजै सो पावै ॥ पीपा प्रणवै परम ततु है सतिगुरु होइ लखावै ।। आदि ग्रन्थ , पृ .695
ब्रह्माण्ड तक की सारी सृष्टि ब्रह्म की सीमा में है और प्रलय में नष्ट हो जाती सतलोक के प्रवेश – द्वार तक की सृष्टि महाप्रलय में नष्ट हो जाती है । सतलोक अविनाशी देश है जो प्रलय और महाप्रलय की सीमा से परे है । यह सन्तों का निज – धाम है और सन्तमत का लक्ष्य है ।
ब्रह्माण्ड में मुख्य छ : चक्र हैं जिनका प्रतिबिम्ब अण्ड के छ : चक्रों पर पड़ता है , और अण्ड के छ : चक्रों का प्रतिबिम्ब पिण्ड के छ : चक्रों पर पड़ता है । जिस प्रकार पानी में पड़नेवाले सूर्य के प्रतिबिम्ब में सूर्य का आकार होता है , सूर्य की गर्मी या तेज नहीं होता और पानी के उस प्रतिबिम्ब की परछाईं यदि दीवार पर पड़ती है तो उसमें सूर्य का आकार भी नहीं रहता , केवल कुछ झलक – मात्र होती है , उसी प्रकार ब्रह्माण्ड के छ : चक्र , ब्रह्माण्ड से अण्ड और अण्ड से पिण्ड तक प्रतिबिम्बित होकर अपने मूल – रूप के आभास – मात्र रह जाते हैं । पिण्ड के छ : चक्र आँखों तक समाप्त हो जाते हैं । वे इस प्रकार हैं
योगीजन पिण्ड के इन छ : चक्रों को जाग्रत् करके ऊपर आते हैं । वे पहले धौति , वस्ति और नेति द्वारा शरीर की मैल को साफ़ करते हैं । फिर वे अपनी तवज्जुह ( ध्यान ) को मूलाधार या गुदा – चक्र , जिसे गणेश – चक्र भी कहते हैं , पर एकाग्र करते हैं । फिर कुण्डलिनी को जगाकर उसे रीढ़ की हड्डी से जोड़ते हैं , और इस प्रकार अभ्यास द्वारा इन चक्रों को पार करके वे आँखों के पीछे आज्ञा – चक्र में पहुँचते हैं । ये अभ्यास बड़े कठिन है, क्योंकि इनमें प्राणों का संयम करना पड़ता है और गृहस्थ तथा निर्बल मनुष्यो के लिए ये हानिकारक भी ही सकते है।