अमृत वेला- Time of Nectar

ग्रंथो शास्त्रों में सुबह सवेरे यानी रात के पिछले पहर को अमृत वेला, ब्रह्म मुहूर्त, ब्रह्म घड़ी आदि कहा गया है। परमेश्वर के भक्तों ने अमृत वेला को भक्ति के लिए खास तौर से लाभदायक माना है। सुबह का वातावरण भक्ति के लिए बहुत उत्तम होता है। सबह के समय रात भर सोने के बाद […]

अमृत वेला- Time of Nectar

अमृत कैसे प्राप्त होगा

अमृत का नाम सुनकर ऐसा लगता है कि जिसके सेवन से हम अमर हो जाय । सूफी फकीरो ने इसे ‘ आबे हयात’ यानी अमर जीवन प्रदान करने वाला जल कहा है। यह संसार, इसके सब पदार्थ और रिश्ते- नाते नाशवान है यानी एक दिन सबको खत्म हो जाना है। सारी त्रिलोकी मृत्यु और विनाश […]

अमृत कैसे प्राप्त होगा

रूहानियत की जरूरत

रूहानियत की जरूरत आजकल सारे संसार में खींच – तान , चिन्ता और फ़िक्र का राज्य नज़र आ रहा है । पहुँचे हुए महात्माओं को छोड़कर कोई भी , चाहे वह किसी भी वर्ग से सम्बन्धित है , इससे नहीं बच सका है । यह इस बात का प्रमाण है कि आजकल रूहानियत का दिवाला निकला हुआ है । इस अराजकता का कारण आजकल के लोगों की अशान्त हालत है । दुनिया के लोगों ने हरएक विद्या में तरक्की की है , लेकिन वे अपनी आत्मा की उन्नति से बिलकुल कोरे हैं । उन्होंने नदियों , पहाड़ों और समुद्रों को खोज डाला है , पर अपने आपकी खोज नहीं की । सारी विद्याओं का मूल उद्देश्य क्या है ? यही कि मनुष्य स्वयं को पहचाने :

जाने – जुमला इल्म – हा ईनस्त ईं , किह ब – दानी मन क़ियम दर यौमे – दीं । कीमते – हरकाला मी दानी किह चीस्त , कीमते – खुदरा न – दानी अहमक़ीस्त । मसनवी मौलाना रूम , दफ़्तर 3 , पृ .256

प्रत्येक इल्म के बारे में हम जानते हैं , पर अपनी आत्मा के बारे में , जिसके सहारे सब विद्याओं की प्राप्ति होती है , जिसके आधार पर शरीर , मन और बुद्धि का कारोबार चल रहा है , हम कुछ भी नहीं जानते । अपना मूल्य न जानकर इनसान बेवकूफ़ बना हुआ है । मनुष्य चाहे संसार के सब पदार्थों पर अधिकार प्राप्त कर ले , पर यदि वह अपनी आत्मा के सम्बन्ध में कुछ नहीं जानता तो उसका सारा जीवन निष्फल चला जाता है । बाइबल ( मैथ्यू 16:26 ) का कथन है , ” मनुष्य को क्या लाभ होगा यदि वह सारे संसार पर अधिकार पा ले , परन्तु अपनी आत्मा को खो बैठे । “

अपनी आत्मा को न जानने और अपने मूल स्रोत से न मिलने के कारण हम अशान्त रहते हैं । हमारी इसी आन्तरिक अशान्ति का प्रभाव संसार पर पड़ रहा है , जिसके फलस्वरूप हम एक ही पिता की सन्तान होते हुए भी आपसी भ्रातृ – भाव को भूल चुके हैं । इसीलिए भाई – भाई , समाज समाज , क़ौम – क़ौम और देश – देश आपस में टकराकर तबाह हो रहे हैं और एक दूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं । बाहरी धर्म के उपदेश और आचारसंहिता की शिक्षाएँ हममें आपसी प्रेम उत्पन्न नहीं कर सकीं ।

आजकल इस बात की अत्यन्त आवश्यकता है कि परमार्थ का नये सिरे से प्रचार हो , जिससे मानव – जाति इस दुर्दशा से निकल सके । हमें रूहानी जीवन की ज़रूरत पर जोर देना चाहिए ताकि मानव – जाति , जो दुःखों में डूबी हुई है और जो मैं – मेरी के भयंकर दौर से गुजर रही है , बच सके । आज दुनिया एक ओर नयी रोशनी और दूसरी ओर पुराने धार्मिक बन्धनों और मत – मतान्तरों के भ्रमों में उलझकर आपसी वैर – विरोध और तू – तू , मैं में फँसी हुई है । प्रचारक और विद्वान लोग , जिन्हें इन कठिनाइयों को हल करना चाहिए था , लोगों को साम्प्रदायिकता , कर्मकाण्ड और मनमाने धार्मिक विश्वासों की उलझनों में फँसाकर एक दूसरे से दूर कर रहे हैं ।

कुछ लोग पश्चिमी रोशनी के सिद्धान्त ‘ खाओ , पीयो और मौज करो ‘ ( ईट , ड्रिंक एण्ड बी मैरी ) से प्रभावित हैं । वे कहते हैं कि हमें परमात्मा की आवश्यकता ही क्या है । सबकी नज़र अखरोट के छिलके तक ही जाती है , वे उसे ही हज़म करने के पीछे पड़े हुए हैं , पर वह हज़म हो नहीं सकता । उसकी गिरी की ओर वे ध्यान नहीं देते , जिसकी रक्षा के लिए यह बाहरी आडम्बर बना था । इसी खींच – तान की दशा में हम परमात्मा को खो चुके हैं और हक़ीक़त से दूर जा रहे हैं ।

ऐ ख़ुदा जूयां ख़ुदा गुम करदा ईद , गुम दरी अमवाजे – कुलज़म करदा ईद । फ़रीद – उद् – दीन – अत्तार

ऐ परमात्मा को खोजने वालो! तुमने परमात्मा को अपने मन रूपी समुंद्र की लहरों में खो दिया है।

ऐसे अवसरों पर सन्त जीवों की नज़र सदा असलियत की ओर मोड़ते हैं , और संसार को एक ऐसे सरल मार्ग का संकेत देते हैं जो मनुष्य के अन्दर है , जो सत्पुरुष – कृत है और जो युगों – युगान्तरों से चला आया है । सन्त कहते हैं कि परमात्मा है और सब धर्म उसी को प्राप्त करने का यत्न करते हैं । ईश्वर – प्राप्ति के मार्ग का नाम ही धर्म है । इसी को अंग्रेजी में ‘ रिलीजन ‘ कहते हैं । यह शब्द लैटिन भाषा के शब्द ‘ रिलीगेअर ‘ से निकला है , जिसका अर्थ है पुनः बाँधना या जोड़ना । इस शब्द के मूल में ही इसका असली तात्पर्य छिपा हुआ है । इसलिए इसका अर्थ है फिर से ईश्वर के साथ जुड़ना ।

यह रूहानी परम्परा सबकी साँझी है । जो परमात्मा के साथ अन्तर में जुड़ जाये , वही सच्चा धर्मात्मा , मोमिन , सिक्ख , ईसाई और भक्त है । सन्त बताते हैं कि परमात्मा हमारे अन्दर है । वह इस शरीर रूपी मन्दिर में ही मिलता है । इस शरीर में आत्मा और परमात्मा दोनों एक साथ रहते हैं । लेकिन इन दोनों के बीच में हौंमैं ( अहं ) या ख़ुदी का पर्दा तना है जिसके कारण आत्मा परमात्मा के दर्शन नहीं कर पाती ।

एका संगति इकतु ग्रिहि बसते मिलि बात न करते भाई ॥ आदि ग्रन्थ , पृ . 205

या यों कहें कि आत्मा रूपी स्त्री और परमात्मा रूपी पति दोनों एक ही सेज पर हैं , अर्थात् दोनों ही शरीर के अन्दर हैं , लेकिन अफ़सोस की बात है कि कई युग बीत गये पर आत्मा रूपी स्त्री ने परमात्मा रूपी पति के दर्शन नहीं किये , क्योंकि स्त्री सोई हुई है और पति सदा जागता है :

एका सेज विछी धन कंता ॥ धन सूती पिरु सद जागंता ॥ आदि ग्रन्थ , पृ .737

सारांश यह है कि मालिक की प्राप्ति के मार्ग पर चलने के लिए किसी को अपनी जाति या धर्म छोड़ने की आवश्यकता नहीं , न ही अपना रहन सहन बदलने की ज़रूरत है , क्योंकि वही परमात्मा सबके अन्दर है और अपने अन्दर ही वह मिल सकता है ।

यह लेख rssb द्वारा प्रकाशित पुस्तक गुरमत सार में से लिया गया है।

असल सुख को पाने का तरीका

आज एक सुखद अहसास हुआ जब ये वीडियो देखा। शायद हमारे में ही कमी है जो सिर्फ हम अपना ही सुख देखते है। इसलिए दुखी है। अगर हम दुसरो को सुख बाटेंगे तो ये बात तो पक्की है कि हम कभी दुखी नहीं होंगे।

इसीलिए संत महात्मा कहते है कि अपनी कमाई का 10 वा हिस्सा हमेशा जरूरत मंदो के लिए रखे या उनमें बाटे तो हमारे दुखी होने का सवाल ही नहीं उठता। एक बार करके देख ले!

दुनियाँ भरम भूल बौराई (संत दरिया)

दुनियाँ भरम भूल बौराई ।। आतम राम सकल घट भीतर जाकी सुद्ध न पाई । मथुरा कासी जाय द्वारिका , अरसठ तीरथ न्हावै । सतगुर बिन सोधा नहिं कोई , फिर फिर गोता खावै ॥ चेतन मूरत जड़ को सेवै बड़ा थूल मत गैला । देह अचार किया कहा होई , भीतर है मन मैला । जप तप संजम काया कसनी , सांख जोग ब्रत दाना । या तें नहीं ब्रह्म से मेला , गुन हर करम बँधाना ॥ बकता होय होय कथा सुनावै , स्रोता सुन घर आवै । ज्ञान ध्यान की समझ न कोई , कह सुन जनम गँवावै ॥ जन दरिया यह बड़ा अचंभा , कहे न समझे कोई । भेड़ पूँछ गहि सागर लाँधै , निस्चय डूबै सोई ॥ दरिया साहब की बानी और जीवन – चरित्र , पृ . 40

परमार्थ की प्राप्ति के लिए बाहरमुखी साधनों का खंडन करते हुए दरिया साहिब कहते हैं कि परमात्मा तो सबके घट में समाया है , लेकिन सारी दुनिया उसे बाहर ढूँढ़ती फिर रही है । मथुरा , काशी आदि तीर्थों पर स्नान करने से , जप – तप , योग , व्रत – दान आदि क्रियाओं से प्रभु से मिलाप नहीं होता , बल्कि कर्मों का बंधन और मज़बूत हो जाता है । देह को साफ़ करने से क्या होगा जब भीतर मन मैला है । चेतन होकर जड़ की पूजा करना तो सूखता है । भ्रमों में पड़े जीव भवसागर से पार नहीं उतर सकते और सतगुरु के बिना परमात्मा से मिलाप नहीं हो सकता ।

शब्दार्थ……1. बौराई= बावली , पगली 2. सोधा … कोई= खोज नहीं कर पाया 3. थूल= स्थूल 4. मत गैला – नादान , नासमझ 5. काया कसनी= काया से किए कठोर तप 7. स्रोता = श्रोता 6. बकता= वक्ता 8. गहि=पकड़कर

हमारे लिए चेतावनी

कबीर साहिब चेतावनी देते है: कबीर सोता क्या करें, उठ के जपो दयार। एक दिना है सोवना,लंबे पाव पसार।। (कबीर साखी संग्रह पृष्ठ स 62) संतो महात्माओं ने मनुष्य को गाफिल, अचेत, मूर्ख, अज्ञानी, बावरा आदि कई नामों से पुकारते हुए उसको अनेक प्रकार की चेतावनी दी है। सबसे पहली बात महात्मा हमे यह समझाते […]

हमारे लिए चेतावनी

A Divine warning

Kabir Sahib warns: What to do, Kabir sleeps, wake up and chant.  One day is Sovna, long pav pasar.  (Kabir Sakhi Collection Page 62) Saints Mahatmas have given many types of warnings to the man calling him with many names like Gafil, unconscious, stupid, ignorant, Bavra etc.  The first thing Mahatma explains to us is […]

A Divine warning

“लौटना कभी आसान नहीं होता”

“यदि जीवन के 40 वर्ष पार कर लिए है तो अब लौटने की तैयारी प्रारंभ करें….इससे पहले की देर हो जाये… इससे पहले की सब किया धरा निरर्थक हो जाये…..”✍️

लौटना क्यों है
लौटना कहाँ है
लौटना कैसे है

इसे जानने, समझने एवं लौटने का निर्णय लेने के लिए आइये टॉलस्टाय की मशहूर कहानी आज आपके साथ साझा करता हूँ :

“लौटना कभी आसान नहीं होता

एक आदमी राजा के पास गया कि वो बहुत गरीब था, उसके पास कुछ भी नहीं, उसे मदद चाहिए…
राजा दयालु था..उसने पूछा कि “क्या मदद चाहिए..?”

आदमी ने कहा..”थोड़ा-सा भूखंड..”

राजा ने कहा, “कल सुबह सूर्योदय के समय तुम यहां आना..ज़मीन पर तुम दौड़ना जितनी दूर तक दौड़ पाओगे वो पूरा भूखंड तुम्हारा। परंतु ध्यान रहे,जहां से तुम दौड़ना शुरू करोगे, सूर्यास्त तक तुम्हें वहीं लौट आना होगा,अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा…!”

आदमी खुश हो गया…
सुबह हुई..
सूर्योदय के साथ आदमी दौड़ने लगा…
आदमी दौड़ता रहा.. दौड़ता रहा.. सूरज सिर पर चढ़ आया था..पर आदमी का दौड़ना नहीं रुका था..वो हांफ रहा था,पर रुका नहीं था…थोड़ा और..एक बार की मेहनत है..फिर पूरी ज़िंदगी आराम…
शाम होने लगी थी…आदमी को याद आया, लौटना भी है, नहीं तो फिर कुछ नहीं मिलेगा…
उसने देखा, वो काफी दूर चला आया था.. अब उसे लौटना था..पर कैसे लौटता..? सूरज पश्चिम की ओर मुड़ चुका था.. आदमी ने पूरा दम लगाया..
वो लौट सकता था… पर समय तेजी से बीत रहा था..थोड़ी ताकत और लगानी होगी…वो पूरी गति से दौड़ने लगा…पर अब दौड़ा नहीं जा रहा था..वो थक कर गिर गया… उसके प्राण वहीं निकल गए…!

राजा यह सब देख रहा था…
अपने सहयोगियों के साथ वो वहां गया, जहां आदमी ज़मीन पर गिरा था…
राजा ने उसे गौर से देखा..
फिर सिर्फ़ इतना कहा…
“इसे सिर्फ दो गज़ ज़मीं की दरकार थी…नाहक ही ये इतना दौड़ रहा था…! “

आदमी को लौटना था… पर लौट नहीं पाया…
वो लौट गया वहां, जहां से कोई लौट कर नहीं आता…

अब ज़रा उस आदमी की जगह अपने आपको रख कर कल्पना करें, कही हम भी तो वही भारी भूल नही कर रहे जो उसने की
हमें अपनी चाहतों की सीमा का पता नहीं होता…
हमारी ज़रूरतें तो सीमित होती हैं, पर चाहतें अनंत..
अपनी चाहतों के मोह में हम लौटने की तैयारी ही नहीं करते…जब करते हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है…
फिर हमारे पास कुछ भी नहीं बचता…

अतः आज अपनी डायरी पैन उठाये कुछ प्रश्न एवं उनके उत्तर अनिवार्य रूप से लिखें ओर उनके जवाब भी लिखें
मैं जीवन की दौड़ में सम्लित हुवा था, आज तक कहाँ पहुँचा?
आखिर मुझे जाना कहाँ है ओर कब तक पहुँचना है?
इसी तरह दौड़ता रहा तो कहाँ ओर कब तक पहुँच पाऊंगा?

हम सभी दौड़ रहे हैं… बिना ये समझे कि सूरज समय पर लौट जाता है…
अभिमन्यु भी लौटना नहीं जानता था…हम सब अभिमन्यु ही हैं..हम भी लौटना नहीं जानते…

सच ये है कि “जो लौटना जानते हैं, वही जीना भी जानते हैं…पर लौटना इतना भी आसान नहीं होता…”

काश टॉलस्टाय की कहानी का वो पात्र समय से लौट पाता…!

“मै ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हम सब लौट पाए..! लौटने का विवेक, सामर्थ्य एवं निर्णय हम सबको मिले…. सबका मंगल होय….”✍️

लेखक मनीष विजयवर्गीय

आंतरिक मार्ग

अगर हमें अपने घर के अन्दर जाना हो तो सबसे पहले घर के दरवाजे की तलाश करनी पड़ती है । निज – घर का वह दरवाजा आँखों के पीछे तीसरी आँख , एक आँख या तीसरा तिल है । उसी को खोलने के लिए हम उसको खटखटाते हैं यानी बार – बार सिमरन और ध्यान के द्वारा अपने फैले हुए ख्याल को आँखों के पीछे इकट्ठा करते हैं । जब बार – बार खटखटाने से यानी सिमरन और ध्यान से हमारा ख्याल इकट्ठा हो जाता है , तब उस घर का दरवाज़ा खुल जाता है । फिर हमें घर जाने का रास्ता मिलता है । जब हम अपने ख्याल को वहाँ जाकर शब्द के साथ जोड़ते हैं , तो शब्द का मार्ग खुल जाता है । उसके द्वारा हम वापस जाकर परमात्मा से मिलाप कर सकते हैं ।

तुलसी साहिब समझाते हैं : कुदरती काबे की तू महराब में सुन ग़ौर से । आ रही धुर से सदा तेरे बुलाने के लिये ।। 143

मुसलमानों का ख़्याल है कि हज यानी काबा की यात्रा करने से हम नजात प्राप्त कर सकते हैं । तुलसी साहिब फ़रमाते हैं कि जो असली क़ाबा है वह हमारा शरीर है । पैरों के तलवों से हमारा हज शुरू होता है और सिर की चोटी पर जाकर ख़त्म होता है । इस हज की दो मंजिलें हैं – एक आँखों तक और दूसरी आँखों से ऊपर । मौलवी हमेशा मेहराब के अन्दर खड़ा होकर बांग देता है । हमारे माथे की बनावट भी मेहराब की तरह है । जो मालिक की दरगाह की तरफ़ से क़ुदरती कलमा आ रहा है , वह इस मेहराब यानी माथे के अन्दर आ रहा है । जब हम उस आवाज़ या कलमे को पकड़ते हैं , तो हम उसके पीछे – पीछे चलकर अपनी मंज़िले – मक़सूद पर पहुँच जाते हैं जहाँ से यह आवाज़ आ रही है ।

गुरु अमरदास जी फ़रमाते हैं : इसु काइआ अंदरि वसतु असंखा ॥ गुरमुखि साचु मिलै ता वेखा । नउ दरवाजे दसवै मुकता अनहद सबदु वजावणिआ ॥44

हमारा यह शरीर सिर्फ हड्डियों और मांस का ही बना हुआ नहीं है और न सिर्फ पाँच – छ : फुट लम्बा मिट्टी का पुतला ही है । परमात्मा ने इसके अन्दर बेशुमार ख़ज़ाने रखे हुए हैं । बल्कि वह परमात्मा भी खुद इसके अन्दर बैठा हुआ है । जब तक कोई सच्चा गुरमुख नहीं मिलता तब तक हम शरीर में उस परमात्मा को देखने और अन्दर खोज करने के तरीके का पता नहीं लगा सकते । आप समझाते हैं कि शरीर के दो हिस्से हैं , एक आँखों से नीचे और दूसरा आँखों से ऊपर । आँखों के नीचे नौ द्वारों में सिर्फ इन्द्रियों के भोग और विषयों – विकारों के स्वाद हैं । जब तक हमारा ख्याल आँखों से नीचे – नीचे है , हम मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते , क्योंकि मुक्ति का दरवाज़ा आँखों के पीछे है । उसकी यही पहचान है कि उस जगह अनहद शब्द धुनकारें दे रहा है ।

गुरु अमरदास जी फ़रमाते हैं : गुर सबदि मिलहि से विछुड़हि नाही सहजे सचि समावणिआ ॥5

जब हम गुरमुखों के जरिये शब्द को पकड़ लेते हैं तो फिर शब्द हमें छोड़ता नहीं , अपने साथ लेकर परमात्मा में ही समा जाता है । हमें उस शब्द के ज़रिये अपने अन्दर , अपने घर का रुख क़ायम करना है और शब्द के प्रकाश के ज़रिये अपने घर का रास्ता देखना है । हमारी आत्मा की जो देखने की शक्ति है , उसे महात्मा ‘ निरत ‘ कहते हैं और जो सुनने की शक्ति है उसे सुरत ‘ कहते हैं । सुरत के द्वारा शब्द की आवाज़ को सुनना है और निरत के द्वारा उसके प्रकाश को देखना है ।

(यह लेख साइंस ऑफ द सोल रिसर्च सेंटर द्वारा पुस्तक “संत मार्ग” में से लिया गया है)

सिद्धों के साथ सँवाद

भक्त रविदास जी उसतति सुनकर सिद्धों के मन में भी दर्शन करने की चाह पैदा हो गई। गोरखनाथ समेत सिद्ध-मण्डली तीर्थ यात्रा करती हुई काशीपुरी में पहुँची। भक्त रविदास जी के स्थान पर वह आदेश आदेश कहकर बैठ गए। गोरखनाथ ने परख करने के लिए अपने पैरों का एक पैला बनाने के लिए दिया। जब भक्त रविदास जी ने प्रेम के साथ बनाकर गोरखनाथ जी को दिया।

तो गोरखनाथ ने अपने थैले का मुँह खोलकर कहा: भक्त रविदास जी ! आप घर से गरीब हैं, संत महात्मा काफी आते हैं, परन्तु सेवा करने की आप में इतनी समर्था नहीं दिखाई देती, आप उठकर मेरे पास आओ और झोली करो मैं हीरे जवाहरातों से भर देता हूँ और एक रसायन भी लो, जिससे ताँबे से सोना बनता है। मैं अपनी मण्डली समेत आपको कुछ दान देने के लिए आया हूँ।

यह सुनकर भक्त रविदास जी हँस पड़े और कहने लगे: गोरखनाथ जी ! मुझे आपके पत्थर, कँकर की जरूरत नहीं है। जो अतिथियों के खान-पान का प्रबंध होता है, उसके लिए परमात्मा जी आप ही दे देते हैं। यह पत्थर तो आप ही सम्भालकर रखो। यह आपको ही शोभा देते हैं। घर बाहर त्यारकर भगवा वस्त्र पहनकर माया के पीछे भटकना यह संतों को शोभा नहीं देता। माया जैसे-जैसे बढ़ती है, वैसे-वैसे ही मनुष्य की तृष्णा ओर बढ़ती जाती है। माया के साथ प्यार करके मन सपने में भी शान्ति नहीं पा सकता। हे योगी जनो ! नाम रत्न जिसके भी पल्ले में है, दुनियाँ में वो ही सच्चा साहूकार है बाकी सारे जीव भिखारी कमीने हैं, जिनको ना तो दिन में सुख है और ना ही रात को नींद नसीब होती है, सुनो:

बिनु देखे उपजै नही आसा ॥

जो दीसै सो होइ बिनासा ॥

बरन सहित जो जापै नामु ॥

सो जोगी केवल निहकामु ॥१॥

परचै रामु रवै जउ कोई ॥

पारसु परसै दुबिधा न होई ॥१॥ रहाउ ॥

सो मुनि मन की दुबिधा खाइ ॥

बिनु दुआरे त्रै लोक समाइ ॥

मन का सुभाउ सभु कोई करै ॥

करता होइ सु अनभै रहै ॥२॥

फल कारन फूली बनराइ ॥

फलु लागा तब फूलु बिलाइ ॥

गिआनै कारन करम अभिआसु ॥

गिआनु भइआ तह करमह नासु ॥३॥

घ्रित कारन दधि मथै सइआन ॥

जीवत मुकत सदा निरबान ॥

कहि रविदास परम बैराग ॥

रिदै रामु की न जपसि अभाग ॥४॥१॥  अंग 1167

अर्थ: “(देखे बिना प्यार नहीं उपजता, बाकी जो कुछ दिखाई देता है, वह नाश होने वाला है। चारों वर्णों को बनाने वाले करतार का जो जीव दिखावा छोड़कर सिमरन करता है, सच्चा जोगी वो ही है, भाव यह है कि जिस प्रकार से परमात्मा ने चारों वर्णों पर अपनी रहमत की है, वैसे ही मनुष्य भी उसके द्वारा बनाए गए सभी मनुष्यों को मान की दृष्टि से देखे और उनमें कोई फर्क नहीं करे यानि कि ऊँच-नीच ना माने। क्योंकि जो ऐसा करता है, वह अहँकारी होता है। जो राम नाम के सिमरन को अपने मन में टिकाए तो वह इस प्रकार शुद्ध हो जाता है, जिस प्रकार से लोहा पारस के स्पर्श से सोना बन जाता है। फिर दुविधा उसको दुख नहीं दे सकती। असल मुनी वो ही तो है जिसने अपने मन में से दुविधा दूर कर ली है और हर एक जीव मात्र को हरि का रूप समझकर सम्मान देता है।

वो परमात्मा तीनों लोकों में व्यापक है, उसका कोई स्थान नियत नहीं है, वह बिना दरवाजे के सभी स्थानों पर रहता है। जो मुनी इस बात को समझ जाता है, उसकी दुविधा मिट जाती है। मन के स्वभाव अनुसार सभी जीव कार्य कर रहे हैं, जो अपने मन को बस में कर लेता है, वो किसी से भी नहीं डरता, माँगता नहीं और हमेशा अडोल और निरभय रहता है। भक्त जन भक्ति करते समय जो कोई मूर्ति आदि चिन्ह सामने रखते है, तो मन को टिकाने के लिए अभ्यास करते हैं। वो चिन्ह को नहीं पूजते, जैसे कि फल लाने के लिए पौधे फुलते हैं पर जब फल लगते हैं तो फुल झड़ जाते हैं।

ज्ञान को प्रकट करने के लिए किसी कर्म का अभ्यास करते हैं, जब ज्ञान हो जाता है, तो सारे कर्म छुट जाते हैं। समझदार स्त्री घी या मक्खन के लिए दुध रिड़कती है। जब घी यक मक्खन प्राप्त हो जाए तो रिड़कना छोड़ देती है। वैसे ही संत जन निरबाण पद (मुक्ति) को पाने के लिए कर्म करता है, जब परमात्मा की प्राप्ति हो जाए तो वो सारे कर्म छोड़कर परमात्मा का रूप हो जाता है। मौत का भय नहीं रहता। रविदास जी वैराग्य का बड़ा सुन्दर तरीका बताते हैं– हे अभागे जीव ! तुम क्यों नही अपने दिल में परमात्मा को बसाते।)”

यह शब्द सुनाकर भक्त रविदास जी ने सभी सिद्ध योगियों को अपने पास बुलाया, जब सारे पास आ गए तो आपने चमड़े काटने वाली राँती और कुण्डी और उठाया और कहा इसे देखो। सबने देखा तो उन्हें उसमें तीनों लोकों की माया तैरती हुई नजर आई,कई हीरे, जवाहरात, लाल, सोना, कई पारस आदि।

भक्त रविदास जी ने कहा: हे सिद्धों ! आपको जो भी रत्न चाहिए वह ले लो। यह सब परमात्मा की लीला है। भक्त जन जिस मिट्टी पर हाथ डालें वह सोना हो जाती है। हरि के प्यारे तो पलक झपकते ही पत्थर के पहाड़ को भी पारस बना सकते हैं। परन्तु यह रिद्धियाँ-सिद्धियाँ तो भूलावे हैं, यह परमात्मा से दूर ले जाते हैं। इसलिए एक परमात्मा की ही भक्ति करो और सब कुछ फालतु काम छोड़ दो।

श्री रविदास जी का यह पवित्र उपदेश सुनकर सारे योगी और सिद्ध उनके चरणों में गिर पड़े। कईयों ने तो मुन्दरीयाँ यानि कान की बालियाँ निकालकर नाम दान लेकर रविदास जी को सच्चा करतार का रूप समझकर तन, मन और धन अरपन कर दिया। किन्तु कुछ अहँकारी सिद्ध और योगी भी थे जो कि उनकी निन्दा करते कराते खाली हाथ गए।

नोट: यही तो बात है जो इन्सान का अगला पिछला किया गया सब कार्य खराब ओर व्यर्थ कर देती है और वह बात है– “अहँकार”। जैसे कि मैंने बहुत सेवा की, मैंने बहुत माला फेरी, मेरा जैसा कोई सेवा करने वाला नहीं है। मैं सभी सेवा करने वालों का कमाण्डर हूँ, मैं मुख्य सेवादार हूँ, मैंने बहुत दान किया है, मै बहुत त्यागी हूँ। यह सब अहँकार की बातें हैं,जो कि अगला पिछला किया गया सब कार्य व्यर्थ कर देता है।

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