कोई बोले राम,कोई खुदा

आदि ग्रंथ में गुरु अर्जुन देवजी ने फरमाया है:

कोई बोलै राम राम कोई खुदाइ ।। कोई सेवै गुसईआ कोई अलाहि ।। कारण करण करीम । किरपा धारि रहीम ॥ कोई नावै तीरथि कोई हज जाइ ।। कोई करै पूजा कोई सिरु निवाइ ॥ कोई प . बेद कोई कतेब । कोई ओढे नील कोई सुपेद ॥ कोई कहै तुरकु कोई कहै हिंदू ॥ कोई बाछै भिसतु कोई सुरगिंदू ॥ कहु नानक जिनि हुकमु पछाता ॥ प्रभ साहिब का तिनि भेदु जाता । आदि ग्रन्थ , पृ .885

गुरु अर्जुन साहिब फ़रमाते हैं , चाहे कोई राम कहे या ख़ुदा , गोसाईं को पूजे या अल्लाह को , ‘ करन कारन करीम ‘ वह एक ही है । वह कृपालु सब पर समान रूप से कृपा कर रहा है , चाहे कोई तीर्थों में नहाये या हज को जाये , पूजा करे या सिर झुकाये , वेदों को पढ़े या अन्य धर्म – पुस्तकों का पाठ करे , नीले कपड़े पहने या सफ़ेद बाना , तुर्क कहलाये या हिन्दू , बिहिश्तों की लालसा करे या स्वर्गों की । इन सबमें जो मालिक के हुक्म (divine power) को पहचानता है , वही मालिक के भेद को पा सकता है।

(पढ़ने के दौरान जो भी अच्छे पद, वाणी या कलाम मिलता है वहीं मै आपके साथ बाटता हूं। जिससे हम सब को फायदा मिलता है इन पदों को पढ़ने के बाद यह लगता है कि हमारी छोटी सोच ने परमात्मा तक को बाट दिया है उनकी असली पहचान उसका हुक्म है। यह तक हम भूल गए है। )

सच्चे धर्म का सार

यह लेख मूल रूप से राधा स्वामी ब्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तक “गुरूमत सार” में से लिया है। इसमें जो अधिकतर बाणी या आयते है वो फारसी या अरबी में है उनका अर्थ साथ ही दिया गया है।

सच्चो धर्म का सार अंश और अंशी मूल रूप में एक ही हैं । सब मनुष्य उसी एक जौहर से पैदा हुए हैं । बाहरी रंग रूप , पोशाकों के भेद या फिरकों के झगड़े उनके आत्मिक तौर पर एक होने में फर्क नहीं डाल सकते । खिलकत के साथ प्रेम करना भी , एक तरह से , मालिक के साथ प्रेम करना है । फारस के एक फ़कीर तो यहाँ तक कह देते हैं कि तू शराब पी , कुरान शरीफ़ जला दे , काबा में आग लगा दे , जो चाहे कर , पर किसी इनसान के दिल को न दुखा :

मैं खर ओ मुसहफ़ बसोज ओ आतिश अंदर कअबा जन , हर चिह वाही कुन व – लेकिन मर्दुम आजारी मकुन ।

यही सच्चा मजहब , सच्चा धर्म , दीन और ईमान है । शेख सादी ने इस बारे में फरमाया है कि ऐ मालिक , तेरी बन्दगी तेरे बन्दों की ख़िदमत करने में है ; तसबीह ( माला ) फेरने , सज्जादा ( आसन ) पर बैठे रहने या गुदड़ी पहन लेने में नहीं

तरीक़त बजुज़ ख़िदमते – ख़ल्क नीस्त , ब – तस्बीह ओ सज्जादा ओ दल्क़ नीस्त । बोस्तान , पृ .40

कबीर साहिब कहते हैं कि हर घट में मेरा साई है , कोई सेज उससे सूनी नहीं , लेकिन जिस घट के अन्दर वह प्रकट है , वह बलिहार जाने के योग्य है :

सब घट मेरा साइयाँ , सूनी सेज न कोय । बलिहारी वा घट्ट की , जा घट परघट होय । कबीर साखी संग्रह , पृ . 106 ‘

फारस के एक सूफी दरवेश कहते हैं कि अगर इनसान यह जान ले कि सबके अन्दर मेरा साईं बस रहा है , कोई उससे खाली नहीं , तो अपने आप ही उसके अन्दर हरएक दिल के लिए आदर पैदा हो जायेगा :

चू बदनिस्ती किह दर हू दिल – हा खुदा अस्त , बस तुरा आदावे – हर दिल मुदआ अस्त ।

तू जिन्दा दिलों की परिक्रमा कर , क्योंकि यह दिल हजारों काबों से बेहतर है । काबा तो हजरत इब्राहीम के पिता का बुतखाना था , पर यह दिल प्रभु के प्रकट होने का स्थान है :

कसबा बुंगाहे – खलीले – आजर अस्त , दिल गुज़रगाहे – जलीले – अकबर अस्त । दिल बदस्त आवर किह हज्जे – अकबर अस्त , अज हजारां कसबा यक दिल बिहतर अस्त ।

किसी फ़क़ीर ने क्या सुन्दर वचन कहे हैं कि ऐ दिल , तू दिलों की परिक्रमा कर , क्योंकि यही छिपा हुआ सच्चा काबा है । काबा शरीफ़ तो हजरत इब्राहीम ने बनवाया था , पर यह दिल उस परमात्मा ने खुद बनाया है :

दिला तवाफ़े – दिलाँ कुन कि कअबा मख़्फी अस्त , किह औं खलील बिना करद ओ ईं ख़ुदा ख़ुद सात ।

दिल दुखाने से मालिक कभी प्रसन्न नहीं होता , चाहे कोई हजारों तरह की पूजा , इबादत और तौबा करे , हज़ारों रोजे रखे और हरएक रोजे में हज़ार – हज़ार नमाजें पढ़े और हज़ारों रातें उसकी याद में गुजार दे । यह सबकुछ मालिक को मंजूर नहीं अगर वह एक भी दिल को सताता है :

हजार जुह्दो इबादत हज़ार इस्तिग़फ़ार , हजार रोजा ओ हर रोजा रा नमाज्ञ हजार । हज़ार ताअते – शब – हा हज़ार बेदारी , कबूल नीस्त अगर खातरे ब्याजारी । बू अली कलन्दर

इसलिए जब तक तू खुदा के बन्दों के दु : खी दिलों को राहत नहीं पहुँचातात मालिक की रज़ा की प्राप्ति से ख़ाली रहेगा । अगर तू चाहता है कि मालिक तुझ पर बख्शीश करे तो तू उसकी ख़िलक़त के साथ नेकी कर :

हासिल न – शवद रज़ाए – सुलतान , ता ख़ातिरे – बन्दगां न जूई । ख़्वाही किह ख़ुदाए बर तू बख़्शद , बा ख़ल्के – ख़ुदाए ब – कुन निकूई । शेख सादी , गुलिस्तान , पृ .58

परमात्मा की नजर में सब बराबर है..

जब – जब महात्मा संसार में आते हैं , वे संसार को यही उपदेश देते हैं कि सब इनसान मालिक ने पैदा किये हैं , इसलिए सब बराबर हैं । अगर दुनियावी परमात्मा की नजर में सब बराबर हैं नजर से विचार करें , तो भी मूल रूप से सब समान हैं – चाहे वे राजा हो या प्रजा , अमीर हों या गरीब , या किसी भी देश , क़ौम व धर्म के हों ।

पहली बात यह है कि सब की पैदाइश एक तरह से होती है । सब अपने माता – पिता के द्वारा संसार में आते हैं और माता के गर्भ में नौ – दस महीने रहकर , समान रूप से ही जन्म लेते हैं । यह नहीं कि ब्राह्मण का जन्म और तरह से होता है और मुसलमान का किसी और तरह से । कबीर साहिब एक ब्राह्मण जाति के व्यक्ति से कहते हैं कि अगर तू किसी ब्राह्मणी का जाया ब्राह्मण है , तो किसी और तरह से पैदा क्यों नहीं हुआ :

जौ तूं ब्राहमणु ब्रहमणी जाइआ ॥ तउ आन बाट काहे नही आइआ ॥ आदि ग्रन्थ , पृ .324

सबकी मौत भी एक तरह से ही होती है । यह नहीं कि एक क़ौम के इनसान की मौत एक प्रकार से होती है और दूसरे की दूसरी तरह से । सबको एक जैसी बीमारियाँ होती हैं । यह नहीं कि एक क़ौम के बन्दे को बुख़ार एक तरह से चढ़ता हो और दूसरी क़ौम के बन्दे को दूसरी तरह से । इसी तरह सबकी बीमारियों का इलाज भी एक – सा ही होता है । क्या मच्छर एक क़ौम के आदमी को काटता है और दूसरी क़ौम के आदमी को नहीं ?

हँसना – रोना भी सबका एक – सा ही है । सर्दी – गर्मी भी सबको एक – सी ही लगती है । जीवन के आवश्यक पदार्थ – हवा , पानी , प्रकाश , फल आदि – सबके लिए एक जैसे ही हैं । सब क़ौमों के लोगों की बनावट भी समान ही है। एक जैसी आंखे, एक जैसे कान, एक जैसे ही शरीर और उनके अंदर एक से ही प्राण है। फिर ये शरीर भी पांच तत्वों – मिट्टी, पानी, आग, हवा और आकाश- के बने हुए है। सब लोग एक ही धरती के ऊपर और एक ही आकाश के नीचे रहते है।

मनुष्य धर्म

परमात्मा ने मनुष्य बनाये धर्मों की स्थापना बाद में हुई । मनुष्य धर्म के लिए नहीं बनाये गये थे , लेकिन धर्म मनुष्य की आत्मिक उन्नति के लिए बनाये गये थे ताकि वे उस परम आनन्द का अनुभव कर सकें जो केवल परमात्मा से मिलाप करने पर होता है ।

आजकल नयी सुविधाओं , भौतिक प्रगति , बुद्धि की उपलब्धियों और बढ़ते हुए नैतिक तथा धार्मिक संगठनों के होते हुए भी मनुष्य ख़ुश नजर नहीं आता । लाखों लोग अपने आपसे और जीवन की दौड़ – धूप से सन्तुष्ट नहीं हैं , उनके लिए जीवन नीरस है । उनमें से हरएक अपने आपको एक या दूसरे धर्म को माननेवाला कहता है – कोई हिन्दू , कोई मुसलमान , कोई सिक्ख , कोई ईसाई , कोई बौद्ध , कोई जैन आदि । लेकिन उनमें से बहुत कम ऐसे लोग हैं जिन्हें जीवन से वह सन्तुष्टि मिलती है जिसकी उन्हें चाह है ।

प्रत्येक धर्म का बाहरी स्वरूप दूसरे धर्मों के स्वरूपों से अलग लगता है लेकिन , वास्तव में , पूरी इनसानियत के लिए केवल एक ही धर्म है । अगर प्रत्येक धर्म की तह तक पहुँचा जाये तो एक ही मार्ग और एक ही नियम सब धर्मों की बुनियाद में काम करता नज़र आता है । मनुष्य होने के नाते हम सब एक ही मानव जाति के हैं और हमारी प्रेरणा का स्रोत , हमारा अन्दरूनी आधार , भी एक ही है ।

सब पवित्र आत्माओं और भक्तों का एक ही मज़हब है , ‘ मालिक की भक्ति और उसकी ख़िलक़त से प्यार । ‘ इनसान तब ही इनसान कहलाने का हक़दार है जब उसमें इनसानियत के गुण मौजूद हों , जब मनुष्य मनुष्य को भाई समझे , उसका दुःख – दर्द बँटाये , दिल में हमदर्दी रखे और मालिक तथा उसकी सृष्टि के प्रति अटूट प्रेम पैदा करे।

इसके विपरीत , अगर ईर्ष्या , जुल्म , हरामखोरी , चुग़लख़ोरी , दुश्मनी , लालच , लोभ , पाखण्ड , पक्षपात , हठ – धर्म आदि हमारे अन्दर बसते हों , तो हृदय का शीशा साफ़ किस प्रकार हो सकता है ? इनसे मनुष्य – जीवन की सारी ख़ुशी और मिठास ख़त्म हो जाती है । इतनी मैल के होते हुए दिल के शीशे में मालिक की झलक कहाँ !

हमारी आत्मा परमात्मा का अंश है , इसलिए इसका दर्जा सृष्टि में सबसे ऊँचा है । परमात्मा और उसकी रचना के साथ प्यार का गुण जितना बढ़ता है , उतना ही मनुष्य मालिक के नज़दीक होता जाता है । सब एक ही नूर से पैदा हैं और उसी एक का नूर सबके अन्दर चमक रहा है । फिर इनमें कोई बुरा और कोई भला कैसे हो सकता है ?

अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरति के सभ बंदे ॥ एक नूर ते सभु जगु उपजिआ कउन भले को मंदे ॥ आदि ग्रन्थ , पृ . 1349

असली सूरमा या बहादुर

स्वामी जी महाराज की बाणी में आता है।

सारबचन संग्रह (19:2:7-11)

जिन्होने मार मन डाला। उन्हीं को सूरमा कहना।।

बड़ा बेरी यह मन घट में। इसी का जीतना कठिना।।

पड़ो तुम इस ही के पीछे। और सबहि जतन तजना।।

गुरु की प्रीत कर पहिले। बहुर घट शब्द को सुनना।।

मान दो बात यह मेरी। करे मत और कुछ जतना।।

संत महात्मा उसी को बहादुर या सूरमा कहते है जिन्होंने मन को मार दिया। “मन जीते जग जीत।” यानि जिसने मन को जीत लिया उसी ने सारे संसार को जीत लिया। क्यो कि यही बेरी यानी दुश्मन है हमारा इसी को जीतना कठिन है। जब तक इस के पीछे नहीं लगते ये हमको गलत कामों में लगाए रखता है। परमात्मा की भक्ति से मन दूर दूर भागता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार इसके मुख्य हथियार है। इसको मारने के लिए पहला साधन गुरु से प्रेम है और दूसरा गुरु के बताएं तरीके से शब्द या नाम (divine Music) को अपने अंतर में सुनना है। यही दो साधनों के अलावा जितने भी साधन है वो सिर्फ कुछ समय के लिए है। इसके अलावा कोई जतन नहीं हैं।

कलाम हजरत सुल्तान बाहू

पढ़ पढ़ इलम हजार कताबां, आलिम होए भारे हूं ।

हरफ़ इक इश्क दा पढ़ न जाणन, भुल्ले फिरन विचारे हूं ।

इक निगाह जे आशिक वेखे, लख हजारां तारे हूं ।

लक्ख निगाह जे आलिम वेखे,किसे न कधी चाढ़े हूं।

इश्क अक़ल विच मंजल भारी,सैआं कोहां दे पाड़े हू।

जिन्हां इश्क खरीद न कीता, दोहीं जहानी मारे हूं ।

शब्दार्थ : कद्धी – किनारा ; मंज़िल = फ़ासला , पड़ाव ; पाड़े – दूरी ।

भावार्थ : पण्डित और मौलवी हज़ारों किताबें पढ़ कर विद्वान तो बन गये पर यह न समझ पाये कि इश्क़ होता क्या है , इश्क़ कहते किसे हैं । वे लाचार होकर , कोरे इल्म के भ्रम – जाल में पड़े भटक रहे हैं । रब्ब के आशिक़ की दया – मेहर की एक निगाह ही लाखों को पार उतारने का सामर्थ्य रखती है जब कि विद्वान की लाख नज़रें एक को भी किनारे नहीं लगा सकती । इश्क़ और अक्ल के बीच की खाई बहुत गहरी और लम्बी है ; दोनों एक – दूसरे से कोसों दूर हैं । बाहू कहते हैं कि जो इस ज़िन्दगी में इश्क़ का सौदा नहीं खरीदते वे लोक और परलोक , दोनों गँवा बैठते हैं ।

आत्मा की विनती और पुकार

*करू बेनती दऊ कर जोरी अरज सुनो राधास्वामी मोरी
स्वामीजी यहा पर आत्मा की पुकार का इस बेनती के जरीये वर्णन कर रहे है

यह प्रार्थना आत्मा अपने पती रूपी परमात्मा से यहा पर कर रही है , हे सच्चे पातशाहा मै दोनो हाथ जोडकर तुम्हारे सामने अरदास कर रही हू आप मेरी अरदास स्वीकार कर ले,आगे समझाते है

*सतपुरुष तुम सतगुरू दाता सब जीवन के पीता ओर माता
अब आत्मा बयान कर रही है , हे परमात्मा तुम ने ही यहा पर सतपुरुष का सतगुरू का साक्षात रूप धारण किया है और तुम इस जल थल मे सभी जीव जंतु पशु पक्षी पेड़ पोधे प्राणी के रखवाले हो माता पिता हो ये मे अच्छी तरह से समझ गई हु , आगे समझाते हैं

*दया धार अपना कर लीजे काल जाल से न्यारा कीजे
अब आत्मा समझ गई है की उसका रचनाकार कौन है और सब की यहा पर सभाल कौन कर रहा है , इसीलिए आत्मा यहा पर वो सतपुरुष सतगुरू को अरदास कर रही है पुकार रही है , कि हे सतगुरू आप अपनी दया करके मुझे इस आवागमन से, काल के जाल से आप मुक्त करालो आजाद करा लो, आगे

*सतयुग त्रेता व्दापर बीता काहुन जानी शबद की रीता
अब आत्मा अपनी खुद की अवस्था का बयान कर रही है , कि मै सतयुग मे भी किसी शरीर मे थी , ओर द्वापर युग मे भी किसी शरीर मे थी , पर मै तब आपको पहचान नही पाई तब मुझे आपका ज्ञात नही हुवा इसलिए चौरासी के चक्कर मे जनम जनम भटक रही हू , आगे समझाते है

कलयुग मे स्वामी दया वीचारी परकट करके शबद पुकारी*
अब मैने कलयुग मे भी एक नया शरीर धारण किया है , और आप भी यहा पर सतगुरू बनकर आये है , सब जीवो से शबद की नाम की भक्ती करवाने के लिए और आत्मा ये भी समझ गई है सतगुरू यहा पर क्यो आये है आप अगली कड़ी मे समझाते है

जीव काज स्वामी जग मे आये भव सागर से पार लगाये
यह आत्मा जन्मों जन्मों से जीवो जंतु के नये नये शरीर धारण करके दरबदर भटक रही है ओर अब आइ कलयुग मे भी उसने एक मनुष्य का नया शरीर धारण किया है सतगुरू की कृपा से , और उस परमात्मा ने भी इस युग मे सतगुरू बनकर शरीर धारण किया है जीवो को इस संसाररुपी भवसागर से पार करने के लिए ही सतगुरू यहा पर आये है ,ये भी यहा पर आत्मा समझ गई है, आगे समझाते है

*तीन छोड चोथा पद दीन्हा सतनाम सतगुरु गत चीन्हा
अब आत्मा यहा पर बेनती करके सतगुरू को कुछ मांग रही है आत्मा सतगुरू से बोल रही है दाता अब मुझे ये तीनो लोको का यानी आकाश पाताल पुथ्वी का आभासीक सुख नही चाहीये, ये तीनो लोक छोड के जो चोथा लोक सतलोक उस सतलोक मे अब मुझे कायम तेरे चरनो मे समा जाना है , आगे समझाते है

जगमग जोत होत ऊजीयारा गगण सोत पर चदर नीहारा
अब आत्मा को ये भी पता हो गया है की वो कहा से आई थी, इसीलिए वो अपने देश का यानी सचखंड का वर्णन कर रही है वो सतलोक मे एक अविनाशी अवर्णनीय परम जोत है , कई चंद्रमा की वहा पर शीतलता है , वहा पर प्रकाश ही प्रकाश है , गगन स्त्रोत यानी ,वो सब पाने के लीये दशम द्वार से तुरिया पद तक नाम की साधना से जाना है , अगली कड़ी मे स्वामीजी समझाते है

सेत सीहासन क्षत्र बीराजे अनहद शबद गैब धुन गाजे
आत्मा अपने देश का वर्णन कर रही है , उस सत लोक मे वो परम जोती का सेत यानी एक सफेद रग का तेजस्वी सिंहासन है , वहा पर गैब यानी गुप्त धुन सुननै में आती है उसे अनहद नाद कहते है , वो दिन रात बजता रहता है , उसका वर्णन शब्दो मे करना असंभव है वो अकथ है वो कहा नही जाता, आगे समझाते है

क्षर अक्षर नीक्क्षर पारा बीनती करे जहा दास तुम्हारा
अब आत्मा अपने निजघर का यानी सतलोक का परम परमात्मा के धाम का पता बता रही है
क्षर यानी त्रीकुटी देश के बाहर, अक्षर यानि सुन्न देश के आगे ,और निक्षर यानी महासुन्न देश भवरगुफा को पार करके वो सतलोक धाम की शुरुवात होती है , वहा पर सब जीव परमात्मा मे समाये है सब परम सुख से आनंदित है ,वो देश सुख ओर दुख के परे है इस प्रकार आत्मा अपना ठिकाना बता रही है , अब शबद की अंतिम कड़ी मे आत्मा अपनी बेनती पुरी करती है

लोक अलोक पाऊ सुख धामा चरन सरण दीजे बीसरामा
अब आत्मा परमात्मा से कहे रही है, लोक यानी तीनो लोक का संसार सुख के रहित, वो अलोक यानी परलोक का शाश्वत अविनाशी सतलोख मे सुख है , और अब मुझे इस संसार सागर मे नही अटकना है , मुझे अब आपके सतलोक सुख धाम से वापिस नही जाना है , अंत मे आत्मा परमात्मा से कह रही है , मुझे अब आपके चरनो मे ही ले लो ।

वो सबकी सुनता है ….

वो सबकी सुनता है ….
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शहर में एक अमीर सेठ रहता था। उसके पास बहुत पैसा था। वह बहुत फैक्ट्रियों का मालिक था।
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एक शाम अचानक उसे बहुत बैचेनी होने लगी। डॉक्टर को बुलाया गया सारे जाँच करवा लिये गये। पर कुछ भी नहीं निकला। लेकिन उसकी बैचेनी बढ़ती गयी।
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उसके समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है। रात हुई, नींद की गोलियां भी खा ली पर न नींद आने को तैयार और ना ही बैचेनी कम होने का नाम ले।
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वो रात को उठकर तीन बजे घर के बगीचे में घूमने लगा। घुमते -घुमते उसे लगा कि बाहर थोड़ा सा सुकून है तो वह बाहर सड़क पर पैदल निकल पड़ा।
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चलते- चलते हजारों विचार मन में चल रहे थे। अब वो घर से बहुत दूर निकल आया था। और थकान की वजह से वो एक चबूतरे पर बैठ गया।
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उसे थोड़ी शान्ति मिली तो वह आराम से बैठ गया।
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इतने में एक कुत्ता वहाँ आया और उसकी चप्पल उठाकर ले गया। सेठ ने देखा तो वह दूसरी चप्पल उठाकर उस कुत्ते के पीछे भागा।
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कुत्ता पास ही बनी जुग्गी-झोपड़ीयों में घुस गया। सेठ भी उसके पीछे था, सेठ को करीब आता देखकर कुत्ते ने चप्पल वहीं छोड़ दी और चला गया।
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सेठ ने राहत की सांस ली और अपनी चप्पल पहनने लगा। इतने में उसे किसी के रोने की आवाज सुनाई दी।
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वह और करीब गया तो एक झोपड़ी में से आवाज आ रहीं थीं।
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उसने झोपड़ी के फटे हुए बोरे में झाँक कर देखा तो वहाँ एक औरत फटेहाल मैली सी चादर पर दीवार से सटकर रो रही हैं।
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और ये बोल रही है, हे भगवान मेरी मदद कर ओर रोती जा रहीं है।
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सेठ के मन में आया कि यहाँ से चले जाओ, कहीं कोई गलत ना सोच लें।
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वो थोड़ा आगे बढ़ा तो उसके दिल में ख़्याल आया कि आखिर वो औरत क्यों रो रहीं हैं, उसको तकलीफ क्या है ?
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और उसने अपने दिल की सुनी और वहाँ जाकर दरवाजा खटखटाया।
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उस औरत ने दरवाजा खोला और सेठ को देखकर घबरा गयी। तो सेठ ने हाथ जोड़कर कहा तुम घबराओं मत, मुझे तो बस इतना जानना है कि तुम रो क्यों रही हो।
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वह औरत के आखों में से आँसू टपकने लगें। और उसने पास ही गोदड़ी में लिपटी हुई उसकी 7-8 साल की बच्ची की ओर इशारा किया।
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और रोते -रोते कहने लगी कि मेरी बच्ची बहुत बीमार है उसके इलाज में बहुत खर्चा आएगा।
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और में तो घरों में जाकर झाड़-ूपोछा करके जैसे-तैसे हमारा पेट पालती हूँ। मैं कैसे इलाज कराऊं इसका ?
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सेठ ने कहा, तो किसी से माँग लो। इसपर औरत बोली मैने सबसे माँग कर देख लिया खर्चा बहुत है कोई भी देने को तैयार नहीं।
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सेठ ने कहा तो ऐसे रात को रोने से मिल जायेगा क्या ?
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औरत ने कहा कल एक संत यहाँ से गुजर रहे थे तो मैने उनको मेरी समस्या बताई तो उन्होंने कहा बेटा…
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तुम सुबह 4 बजे उठकर अपने ईश्वर से माँगो। बोरी बिछाकर बैठ जाओ और रो -गिड़गिड़ा के उससे मदद माँगो वो सबकी सुनता है तो तुम्हारी भी सुनेगा।
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मेरे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था। इसलिए में उससे माँग रही थीं और वो बहुत जोर से रोने लगी।
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ये सब सुनकर सेठ का दिल पिघल गया और उसने तुरन्त फोन लगाकर एम्बुलेंस बुलवायी और उस लड़की को एडमिट करवा दिया।
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डॉक्टर ने डेढ़ लाख का खर्चा बताया तो सेठ ने उसकी जवाबदारी अपने ऊपर ले ली, और उसका इलाज कराया।
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उस औरत को अपने यहाँ नौकरी देकर अपने बंगले के सर्वेन्ट क्वाटर में जगह दी। और उस लड़की की पढ़ाई का जिम्मा भी ले लिया।

वो सेठ कर्म प्रधान तो था पर नास्तिक था। अब उसके मन में सैकड़ो सवाल चल रहे थे।
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क्योंकि उसकी बैचेनी तो उस वक्त ही खत्म हो गयी थी जब उसने एम्बुलेंस को बुलवाया था।
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वह यह सोच रहा था कि आखिर कौन सी ताकत है जो मुझे वहाँ तक खींच ले गयीं ?क्या यहीं ईश्वर हैं ?
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और यदि ये ईश्वर है तो सारा संसार आपस में धर्म, जात -पात के लिये क्यों लड़ रहा है। क्योंकि ना मैने उस औरत की जात पूछी और ना ही ईश्वर ने जात -पात देखी।
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बस ईश्वर ने तो उसका दर्द देखा और मुझे इतना घुमाकर उस तक पहुंचा दिया।
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अब सेठ समझ चुका था कि कर्म के साथ सेवा भी कितनी जरूरी है क्योंकि इतना सुकून उसे जीवन में कभी भी नहीं मिला था !
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तो दोस्तों मानव और प्राणी सेवा का धर्म ही असली इबादत या भक्ति हैं।
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यदि ईश्वर की कृपा या रहमत पाना चाहते हो तो इंसानियत अपना लो और समय-समय पर उन सबकी मदद करो जो लाचार या बेबस है। क्योंकि ईश्वर इन्हीं के आस -पास रहता हैं।।

पूर्ण गुरु परमात्मा का ही रूप है

संसार की चौरासी लाख योनियों का सिरजन होते हुए भी मनुष्य की कुछ अपनी मजबूरियां है। अगर मनुष्य को कुछ बताना या समझाना हो तो वह उससे ही समझ सकेगा जो उसी जैसा होकर उससे बात करे। सिरजनहार प्रभु जब अपनी दया मेहर के कारण अपनी पैदा की हुईं विशेष आत्माओं का उद्धार करना चाहता […]

पूर्ण गुरु परमात्मा का ही रूप है

सत्संग बड़ा है या तप

सत्संग बड़ा है या तप

एक बार विश्वामित्र जी और वशिष्ठ जी में इस बात‌ पर बहस हो गई, कि सत्संग बड़ा है या तप?
विश्वामित्र जी ने कठोर तपस्या करके ऋध्दि-सिध्दियों को प्राप्त किया था, इसीलिए वे तप को बड़ा बता रहे थे। जबकि वशिष्ठ जी सत्संग को बड़ा बता रहे थे।
आखिर वे दोनों इस बात का फैसला करवाने ब्रह्मा जी के पास चले गए।

उनकी बात सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा- मैं सृष्टि की रचना करने में व्यस्त हूं, आप विष्णु जी के पास जाइए। विष्णु जी आपका फैसला अवश्य कर देगें।

अब दोनों विष्णु जी के पास चले गए।
विष्णु जी ने सोचा, यदि मैं सत्संग को बड़ा बताता हूं तो विश्वामित्र जी नाराज होंगे, और यदि तप को बड़ा बताता हूं तो वशिष्ठ जी के साथ अन्याय होगा। इसलिए उन्होंने भी यह कहकर उन्हें टाल दिया, कि मैं सृष्टि का पालन करने में व्यस्त हूं, आप शंकर जी के पास चले जाइए।

अब दोनों शंकर जी के पास पहुंचे।
शंकर जी ने उनसे कहा- ये मेरे वश की बात नहीं है। इसका फैसला तो शेषनाग जी कर सकते हैं।

अब दोनों शेषनाग जी के पास गए।
शेषनाग जी ने उनसे पूछा- कहो ऋषियों! कैसे आना हुआ?

वशिष्ठ जी ने बताया- हमारा फैसला कीजिए, कि तप बड़ा है या सत्संग बड़ा है? विश्वामित्र जी कहते हैं कि तप बड़ा है, और मैं सत्संग को बड़ा बताता हूं।

शेषनाग जी ने कहा- मैं अपने सिर पर पृथ्वी का भार उठाए हूं, यदि आप में से कोई भी थोड़ी देर के लिए पृथ्वी के भार को उठा ले, तो मैं आपका फैसला कर दूंगा।

तप में अहंकार होता है, और विश्वामित्र जी तपस्वी थे, उन्होंने तुरंत अहंकार में भरकर शेषनाग जी से कहा- पृथ्वी को आप मुझे दीजिए।
और विश्वामित्र जी ने पृथ्वी अपने सिर पर ले ली।

अब पृथ्वी नीचे की और चलने लगी।
शेषनाग जी बोले- विश्वामित्र जी! रोको, पृथ्वी रसातल को जा रही है।

विश्वामित्र जी ने कहा- मैं अपना सारा तप देता हूं, पृथ्वी! रूक जा।
परंतु पृथ्वी नहीं रूकी।

ये देखकर वशिष्ठ जी ने कहा- मैं आधी घड़ी का सत्संग देता हूं, पृथ्वी माता! रूक जा। और पृथ्वी वहीं रूक गई।

अब शेषनाग जी ने पृथ्वी को अपने सिर पर ले लिया,
और उनको कहने लगे- अब आप जाइए।

विश्वामित्र जी कहने लगे- लेकिन हमारी बात का फैसला तो हुआ ही नहीं है।

शेषनाग जी बोले- विश्वामित्र जी! फैसला तो हो चुका है। आपके पूरे जीवन का तप देने से भी पृथ्वी नहीं रूकी, और वशिष्ठ जी के आधी घड़ी के सत्संग से ही पृथ्वी अपनी जगह पर रूक गई। फैसला तो हो गया है कि तप से सत्संग ही बड़ा होता है।
इसीलिए हमें नियमित रूप से सत्संग सुनना चाहिए। कभी भी या जब भी, आस-पास कहीं भी सत्संग हो, उसे सुनना और उस पर अमल करना चाहिए।

सत्संग की आधी घड़ी

तप के वर्ष हजार

तो भी नहीं बराबरी

संतन कियो विचार

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