गुर पीर सदाए मंगण जाए ॥ ता कै मूल न लगीऐ पाए ॥ घाल खाए किछ हथहो दे ॥ नानक राह पछाणह से ॥ जो गुरु और पीर अपने शिष्यों – सेवकों से माँगते फिरते हैं , उनके पैरों पर माथा ही नहीं टेकना चाहिए । कैसे महात्मा को ढूँढ़ना है ? जो स्वयं मेहनतContinue reading “असल गुरु की पहचान”
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ज्ञान
ज्ञान ‘ ज्ञा ‘ धातु से निकला है जिसका अर्थ है जानना । अंग्रेज़ी में ‘ know ‘ भी ‘ज्ञा ‘ का ही एक रूप है । आम लोगों ने केवल वाचक ज्ञान को ही काफ़ी समझ लिया है और इसी पर ज़ोर देते नज़र आते हैं । वास्तव में ज्ञान – ध्यान केवल बुद्धिContinue reading “ज्ञान”
हज़रत जुनैद और घायल कुत्ता
मेरे संपूर्ण पवित्र पर्वत पर न वे किसी को चोट पहुँचायेंगे नष्ट करेंगे , क्योंकि धरती यहोवा ( प्रभु ) के ज्ञान से भरपूर रहेगी जैसे समुद्र पानी से भरा रहता है ।इसायाह जब हज़रत जुनैद बग़दादी क़ाबा को जा रहा था तो उसने रास्ते में एक कुत्ते को देखा , जो ज़ख़्मी हालत मेंContinue reading “हज़रत जुनैद और घायल कुत्ता”
मालिक सब देखता है
ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ मालिक नहीं है । तेरी बादशाहत से कहाँ जाऊँ ? तेरी हुजूरी से भागकर कहाँ जाऊँ ? यदि मैं आसमानों पर चढ़ जाऊँ , तू वहाँ भी मौजूद है । यदि पाताल में अपना डेरा तान लूँ तो तू वहाँ भी है ।129 साम्ज़ किसी महात्मा के पास दो आदमीContinue reading “मालिक सब देखता है”
संतों के सामने घमंड
होह सभना की रेणुका तउ आउ हमारे पास ॥131 गुरु अर्जुन देव शेख़ फ़रीद को बहुत कम आयु में ही रूहानियत की गहरी लगन थी । उन्होंने ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का नाम सुना हुआ था जो राजस्थान के एक शहर अजमेर में रहते थे । उनसे दीक्षा लेने जब वे अजमेर पहुँचे तो देखा किContinue reading “संतों के सामने घमंड”
महारानी द्रौपदी और महात्मा सुपच
साहिब के दरबार में केवल भक्ति पियार ॥ केवल भक्ति पियार साहिब भक्ती में राजी ।। पलटू साहिब महारानी द्रौपदी और महात्मा सुपच जब महाभारत की लड़ाई ख़त्म हुई तो भगवान कृष्ण ने पांडवों को बुलाकर कहा कि अश्वमेध यज्ञ कराओ , प्रायश्चित्त करो , नहीं तो नरकों में जाओगे । लेकिन तुम्हारा यज्ञ तबContinue reading “महारानी द्रौपदी और महात्मा सुपच”
सच्चा शिष्य कौन ?
सच्चा शिष्य कौन ? सबद मरै सोई जन पूरा ॥ सतगुर आख सुणाए सूरा ॥72 गुरु अमरदास सत्ता और बलवंडा नामक दो पाठी थे । वे गुरु अर्जुन साहिब के दरबार में कीर्तन किया करते थे । उन्हें भ्रम हो गया कि उनके कीर्तन के कारण ही इतनी संगत जुड़ती है । इसी अभिमान नेContinue reading “सच्चा शिष्य कौन ?”
चौरासी लाख योनियों से मुक्ति
गुरू अर्जुन देव जी कहते है: लख चौरासी जोन सबाईं।। मानस कऊ प्रभ दी वडयाई।। इस पउड़ी ते जो नर चुके, सो आइ जाइ दुख पाईदा।। (आदि ग्रंथ पृष्ठ स १०७५) गुरू साहिब चेतावनी दे रहे है कि जो लोग प्रभु की अपार दया से मिले मनुष्य जन्म के अमूल्य अवसर को इन्द्रियों के भोगों,Continue reading “चौरासी लाख योनियों से मुक्ति”
सतगुरु
सतगुरु : सन्त – सतगुरु मालिक का नर – रूप अवतार है जिसके अन्दर सत्य प्रकट है और जो सत्य से अभेद है । उसके अन्दर सत्य रमा हुआ है । मालिक से मिलकर उसमें मालिक का तेज आ गया । वह पवित्र हस्ती है , उसमें सत्य ख़ुद देह – स्वरूप में प्रकट हैContinue reading “सतगुरु”
सत्संग का अर्थ
सत्संग : ‘ सत् ‘ का मतलब है ‘ सत्य ‘ या ‘ सच्च ‘ , ‘ जीवित ‘ या ‘ जाग्रत ‘ , और ‘ संग ‘ का मतलब है ‘ साथ ‘ या ‘ सोहबत ‘ , यानी सदा कायम रहनेवाले पुरुष की सोहबत या संगति का नाम सत्संग है । सतगुरु सत्Continue reading “सत्संग का अर्थ”