मनुष्य धर्म

परमात्मा ने मनुष्य बनाये धर्मों की स्थापना बाद में हुई । मनुष्य धर्म के लिए नहीं बनाये गये थे , लेकिन धर्म मनुष्य की आत्मिक उन्नति के लिए बनाये गये थे ताकि वे उस परम आनन्द का अनुभव कर सकें जो केवल परमात्मा से मिलाप करने पर होता है ।

आजकल नयी सुविधाओं , भौतिक प्रगति , बुद्धि की उपलब्धियों और बढ़ते हुए नैतिक तथा धार्मिक संगठनों के होते हुए भी मनुष्य ख़ुश नजर नहीं आता । लाखों लोग अपने आपसे और जीवन की दौड़ – धूप से सन्तुष्ट नहीं हैं , उनके लिए जीवन नीरस है । उनमें से हरएक अपने आपको एक या दूसरे धर्म को माननेवाला कहता है – कोई हिन्दू , कोई मुसलमान , कोई सिक्ख , कोई ईसाई , कोई बौद्ध , कोई जैन आदि । लेकिन उनमें से बहुत कम ऐसे लोग हैं जिन्हें जीवन से वह सन्तुष्टि मिलती है जिसकी उन्हें चाह है ।

प्रत्येक धर्म का बाहरी स्वरूप दूसरे धर्मों के स्वरूपों से अलग लगता है लेकिन , वास्तव में , पूरी इनसानियत के लिए केवल एक ही धर्म है । अगर प्रत्येक धर्म की तह तक पहुँचा जाये तो एक ही मार्ग और एक ही नियम सब धर्मों की बुनियाद में काम करता नज़र आता है । मनुष्य होने के नाते हम सब एक ही मानव जाति के हैं और हमारी प्रेरणा का स्रोत , हमारा अन्दरूनी आधार , भी एक ही है ।

सब पवित्र आत्माओं और भक्तों का एक ही मज़हब है , ‘ मालिक की भक्ति और उसकी ख़िलक़त से प्यार । ‘ इनसान तब ही इनसान कहलाने का हक़दार है जब उसमें इनसानियत के गुण मौजूद हों , जब मनुष्य मनुष्य को भाई समझे , उसका दुःख – दर्द बँटाये , दिल में हमदर्दी रखे और मालिक तथा उसकी सृष्टि के प्रति अटूट प्रेम पैदा करे।

इसके विपरीत , अगर ईर्ष्या , जुल्म , हरामखोरी , चुग़लख़ोरी , दुश्मनी , लालच , लोभ , पाखण्ड , पक्षपात , हठ – धर्म आदि हमारे अन्दर बसते हों , तो हृदय का शीशा साफ़ किस प्रकार हो सकता है ? इनसे मनुष्य – जीवन की सारी ख़ुशी और मिठास ख़त्म हो जाती है । इतनी मैल के होते हुए दिल के शीशे में मालिक की झलक कहाँ !

हमारी आत्मा परमात्मा का अंश है , इसलिए इसका दर्जा सृष्टि में सबसे ऊँचा है । परमात्मा और उसकी रचना के साथ प्यार का गुण जितना बढ़ता है , उतना ही मनुष्य मालिक के नज़दीक होता जाता है । सब एक ही नूर से पैदा हैं और उसी एक का नूर सबके अन्दर चमक रहा है । फिर इनमें कोई बुरा और कोई भला कैसे हो सकता है ?

अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरति के सभ बंदे ॥ एक नूर ते सभु जगु उपजिआ कउन भले को मंदे ॥ आदि ग्रन्थ , पृ . 1349

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

2 thoughts on “मनुष्य धर्म

  1. बिल्कुल सही कहा , परमपिता परमेश्वर में तो केवल मनुष्य ही बनाए धर्म तो अपने अनुसार हम ने बनाए हैं परंतु सबसे बड़ा धर्म है तो वह है मनुष्यता । मनुष्य धर्म ही सर्वोच्च है । अगर हम इसका अनुसरण करें तो दुनिया वाकई में रमणीय हो जाएगी।
    👌👌🙏🙏

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