सिमरन के रूप

सिमरन के रूप

सिमरन संस्कृत के ‘ स्मृ ‘ धातु से बना है जिसका अर्थ है याद करना , किसी मन्त्र आदि को याद करना या बार – बार दोहराना । सिमरन में कई प्रकार के जाप शामिल हैं । कई लोग हाथों की अंगुलियों से , कई जबान से , कई कण्ठ से , कई हृदय से और योगीजन नाभि चक्र पर प्राणों की हिलोर द्वारा सिमरन करते हैं । यदि सिमरन करते समय सुरत साथ रहे तो वह सिमरन लाभदायक होता है । यदि माला हाथ में फिरती है , जबान मुँह में फिरती है और मन चारों ओर दौड़ता फिरता है या सिमरन कण्ठ या हृदय में होता है तो सिमरन से पूरा लाभ प्राप्त नहीं होता :

माला तो कर में फिरै , जीभ फिरै मुख माहिं । मनुवाँ तो दुइ दिसि फिरै , यह तो सुमिरन नाहिं । कबीर साखी – संग्रह , भाग 1 और 2 , पृ .89

क्रिया करै अँगुरी गनै , मन धावै चहूँ ओर । जेहि फेरे साईं मिलै , सो भया काठ कठोर ॥ कबीर साखी – संग्रह , पृ .89

माला या अन्य बाहरी साधनों को लेकर सिमरन करना सबसे कम लाभदायक है , और ज़बान से , कण्ठ से और हृदय से सिमरन करना क्रमश : एक – दूसरे से अधिक लाभदायक है ।

ये सिमरन उतनी हद तक ही फलदायक होते हैं जितनी तीव्र तवज्जुह के साथ ये किये जाते हैं । माला और जबान आदि का सिमरन यंत्रवत् होता है , इसलिए फलदायक नहीं होता । सुरत की ज़बान से , आत्मा के स्थान पर बैठकर सिमरन करना , जिसे जिक्रे – रूही कहा जाता है , विशेषकर सन्तों महत्माओं का तरीका है और उनसे ही इसका ज्ञान होता है ।

सन्तों ने सुरत या तवज्जुह की ज़बान द्वारा जप , सिमरन , जिक्र या विद करने का आदेश दिया है । ‘ सुरत ‘ शरीर , मन और इन्द्रियाँ सबको आधार देनेवाली सत्ता है । इसलिए सुरत के द्वारा सिमरन करने से शरीर , इन्द्रियाँ और मन स्थिर हो जाते हैं ।

इसके सिवाय और जो भी सिमरन हैं , उनसे किसी हद तक हृदय शुद्ध होता है और कुछ रस भी प्राप्त होता है । इनसे अन्तर्यामिता और ऋद्धियाँ सिद्धियाँ भी जाग उठती हैं , लेकिन ये रूहानी अभ्यास के लिए अन्तर्मुख अडोल बैठने में , अन्तर के पट खुलने में , अनहद की झंकार का आनन्द लेने में और आत्मा के रूहानी मण्डलों पर जाने में सहायक नहीं होते ।

प्रभ कै सिमरनि अनहद झुनकार ॥ सुखु प्रभ सिमरन का अंतु न पार ॥ आदि ग्रन्थ , पृ .263

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

3 thoughts on “सिमरन के रूप

  1. जीवन से हाताश हु
    आज बहुत परेशान हु
    बिल्डिंग में मिले 6 कोरोना
    अपने आप मे हैरान हूं।।

    आज ही गया था मन्दिर
    बहुत माफी मांगी वहाँ
    फिर भी देखना पड़ा
    ऐसा दिन यहां।।

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    1. विश्वास रखे, जो भी हो रहा है उस मालिक की इच्छा से हो रहा है। उसकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। इसीलिए डरे नहीं जो भी होगा वो उसी की मर्जी होगी। ना ही उससे कोई नाराजगी होनी चाहिए। सब कर्मो का खेल है।
      “कर्म जो जो करेगा , फिर वही भोगना भरना।”
      सिमरन करे बस!

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  2. मुझे मेरा कोई डर नही
    नही जीवन से मोह यहा
    मेरी माँ मेरा अंतिम सहारा
    उसी बदौलत हु जीवित यहा।।

    वो नही तो हम नही
    सोच रखा है यहा
    कसम गुरु जी
    झूठ ना बोलू
    में कपटी नही यहा।।

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