
धंधै धावत जग बाधिआ ना बूझै वीचार ॥ जमण मरण विसारिआ मनमुख मुगध गवार ॥
गुरु साहिब फ़रमाते हैं कि हम मनमुख हैं , मुगध हैं , गँवार हैं कि हम हमेशा पेट के धंधों में ही दिन – रात भटकते फिरते हैं । जिस मक़सद के लिए परमात्मा ने हमें यहाँ भेजा है उसके बारे में कभी हम सोच और विचार करने की कोशिश ही नहीं करते । हम पराए गधे बने बैठे हैं , लोगों के घरों की आग बुझाने की कोशिश करते हैं । हम अपने आप को भी धोखा दे रहे हैं और दुनिया को भी धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं । इसलिए स्वामी जी महाराज हमारी हालत देखकर तरस करते हैं कि हम दुनिया के जीव बुरी तरह से इस काल की नगरी में , काल के जाल में , मरण – जन्म के दु : खों में फँसे हुए हैं ।