मुलतान का एक मशहूर और भक्त कारीगर निज़ामुद्दीन ब्यास सतसंग घर को बहुत ही लगन प्यार से बनाने में लगा रहा। हज़ूर जब भी उसे अपनी मजदूरी लेने को कहते तो कहता कि काम खत्म होने पर इकट्ठी ले लूंगा। जब काफी महीने बीत गये तो हजूर जी ने फिर मजदूरी लेने को कहा। निज़ामुद्दीन फिर हाथ जोड़कर बोला, मेरे मौला,जहाँ का यह नक्शा है, मुझे भी वही ले चलो। हज़ूर जी ने बहुत समझाया कि और कुछ माँग लो। मगर वह हाथ जोड़कर यही फरियाद करता रहा। हज़ूर चुपचाप वापिस आ गये। अब जब काम समाप्ति को था तो हज़ूर सतसंग घर (सचखंड) की ऊपरी मंजिल जहाँ निज़ामुद्दीन मगन होकर काम कर रहा था, उसके पीछे जाकर खड़े हो गये। फिर हज़ूर जी ने कहा– आज मजदूरी देने आया हूँ। हज़ूर जी ने ऊसके सिर पर अपना हाथ रख दिया और उसकी सुरत ऐसी चढ़ा दी कि फिर वह नीचे नही उतरा। बाद में उसके पार्थिव शरीर को ही उतारा गया। बड़े हज़ूर जी कहते थे, कि सेवा से फायदा ही फायदा है, घाटा नही। (seva)
सेवा से फायदा ही फायदा है।
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अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता View more posts