संस्कृत के 52 अक्षर

संस्कृत के 52 अक्षर हैं जो हमारे शरीर के छः चक्रों के कमलों से निकले हैं , इसलिए इनको देववाणी कहा गया है । इनका विवरण चक्रों के नाम, कमल दल की संख्या और उनके स्वामी धनी इस प्रकार है:- ( 1 ) मूलाधार में 4 दल कमल, उसका स्वामी गणेश है। ( 2 ) स्वाधिष्ठानContinue reading “संस्कृत के 52 अक्षर”

पूर्ण गुरु की क्या निशानी है?

चौपाई सोई गुरू पूरा कहलावै । दुइ अक्षर का भेद लखावै ॥1 ॥ एक छुड़ावै एक मिलावै । तब निःशंक निज घर पहुँचावै ॥2 ॥ सो गुरू बंदीछोर कहावै । बंदी छोरि के जिव मुक्तावै ॥3 ॥ पूर्ण गुरु की क्या निशानी है ? पूर्ण गुरु वह है , जो लिखने , पढ़ने , बोलनेContinue reading “पूर्ण गुरु की क्या निशानी है?”

संतो के गुण

संतों के गुण , कर्म और स्वभाव पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि बलिहारी जाएँ संतों पर , धन्य हैं संत क्योंकि जैसे कमल पानी में रहता है पर उसका फूल सदा पानी से ऊपर रहता है , उसी प्रकार संतजन संसार के बीच रहते हुए भी सबसे अलिप्त , निर्लेप रहते हैं ।Continue reading “संतो के गुण”

संस्कृत के 52 अक्षर कहां से आए?

संस्कृत के 52 अक्षर हैं जो हमारे शरीर के छः चक्रों के कमलों से निकले हैं , इसलिए इनको देववाणी कहा गया है । इनका विवरण चक्रों के नाम, कमल दल की संख्या और उनके स्वामी धनी इस प्रकार है:- ( 1 ) मूलाधार में 4 दल कमल, उसका स्वामी गणेश है। ( 2 ) स्वाधिष्ठानContinue reading “संस्कृत के 52 अक्षर कहां से आए?”

सेवा का फल

एक बार सतगुरु(बाबा सावन सिंगजी)बाग में टहल रहे थे, सेवक पीछे पीछे चल रहे थे सतगुरु अचानक रुके ओर एक सेवक को इशारा कर के बुलायावह एक अमीर व्यापारी का बेटा था सतगुरू इशारा कर के बोले बेटा यहाँ काफी काई जम गई है इसे साफ कर देना सेवक ने उस समय तो ठीक हैContinue reading “सेवा का फल”

आत्माएँ तीन प्रकार की हैं

आत्माएँ तीन प्रकार की हैं , ( 1 ) नित्यमुक्त आत्माएँ – जो कभी बंधन में नहीं रही तथा सदैव परमात्मा के साथ रहती हैं । ( 2 ) मुक्त आत्माएँ – जो कभी संसार – चक्र का हिस्सा थीं , परंतु अब मुक्त होकर परमात्मा के साथ बहती हैं । ( 3 ) बद्धContinue reading “आत्माएँ तीन प्रकार की हैं”

गायत्री मंत्र का अर्थ

तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ हम उस भव्य ज्योतिर्मय स्वरूप का ध्यान करें , जिसने सकल सृष्टि की उत्पत्ति की है । वह हमारी बुद्धि को अंधकार से प्रकाश की ओर प्रेरित करे । ऋग्वेद 3.62.10

सत्य या परमात्मा को जानने के लिए

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ किसी आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर , सत्य को जानने का प्रयत्न करो । पूरी विनम्रता के साथ उनसे शंका – समाधान करो , उनकी सेवा करो । केवल आत्मज्ञानी ही तुम्हें ज्ञान दे सकते हैं , क्योंकि वे स्वयं सत्य का अनुभव कर चुकेContinue reading “सत्य या परमात्मा को जानने के लिए”

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