सुरग मुकति बैकुंठ सभ बांछह नित आसा आस करीजै । हर दरसन के जन मुकति न मांगह मिल दरसन त्रिपत मन धीजै।। गुरु रामदास
एक दिन बसरा की महात्मा राबिया बसरी फूट – फूटकर रो रही थी , मानो उसका हृदय फट रहा हो । उसको दुःख से व्याकुल देखकर उसके पड़ोसी उसके चारों ओर इकट्ठे हो गये । उन्होंने देखा कि राबिया कह रही है , ‘ ऐ ख़ुदा , तू मेरी विनती मानकर स्वर्गों को जला दे और नरकों की आग को ठंडा कर दे ताकि लोग नरकों के डर और स्वर्गों के लालच के बजाय तेरे लिए तुझे प्यार करें ।
एक बार शेख़ शिबली मक्का गये हुए थे । उनके मन में भी ऐसी ही तरंग उठी । वे इबादत ( भक्ति ) से फ़ारिग़ होकर उठे तो हाथ में जलता हुआ कोयला पकड़कर काबे की ओर दौड़ पड़े । काबे में एक बहुत बड़ा काला पत्थर ( संगे अस्वद ) है जिसे मुसलमान आदर से चूमते और पूजते हैं । शिबली को जलता कोयला लेकर दौड़ता देखकर लोगों ने पूछा , ‘ हज़रत ! आप किधर दौड़े जा रहे हैं और क्या कर रहे हैं ? ‘ हज़रत ने जवाब दिया , ‘ मैं इस कोयले से काबे को आग लगाने जा रहा हूँ ताकि लोग काबे का ध्यान छोड़कर उस कुलमालिक का ध्यान करें । ‘
दूसरे दिन लोगों ने शिबली को फिर मक्के की गलियों में से काबे की ओर जाते देखा । उसकी आँखें नूर से चमक रही थीं और दोनों हाथों में जलते हुए कोयले थे । लोगों ने पूछा , ‘ हज़रत ! आज किधर जा रहे हो और आज किसको आग लगाने चले हो ? ‘
शिबली कहने लगे , ‘ मैं दोज़ख़ ( नरक ) और बहिश्त ( स्वर्ग ) दोनों को जलाने जा रहा हूँ ताकि लोग बहिश्त के लोभ और दोज़ख़ के डर के बजाय उस महबूबे हक़ीक़ी ( सच्चे प्रीतम ) के लिए उसको प्यार करने लग जायें । ‘

