महारानी द्रौपदी और महात्मा सुपच

साहिब के दरबार में केवल भक्ति पियार ॥ केवल भक्ति पियार साहिब भक्ती में राजी ।। पलटू साहिब

महारानी द्रौपदी और महात्मा सुपच

जब महाभारत की लड़ाई ख़त्म हुई तो भगवान कृष्ण ने पांडवों को बुलाकर कहा कि अश्वमेध यज्ञ कराओ , प्रायश्चित्त करो , नहीं तो नरकों में जाओगे । लेकिन तुम्हारा यज्ञ तब संपूर्ण होगा जब आकाश में घंटा बजेगा । फल दे । वे कहने लगे कि हमारा तो एक यज्ञ संपूर्ण नहीं हो रहा और पलटू साहिब पांडवों ने यज्ञ किया , सारे भारतवर्ष के साधु – महात्मा बुलाये । सब खाना खा चुके पर घंटा न बजा । सोचा कि भगवान कृष्ण को नहीं खिलाया । भगवान कृष्ण ने भी भोजन किया , लेकिन फिर भी घंटा न बजा । आख़िर अर्ज़ की कि भगवन ! आप योगदृष्टि से देखो , कोई रह तो नहीं गया । भगवान ने कहा कि एक निम्न जाति का साधु है , उसका नाम सुपच है । वह भजन में मस्त , जंगल में रहता है और पत्ते खाकर गुज़ारा करता है , कहीं जाता नहीं । उसको बुलाओ और भोजन खिलाओ , तब आपका यज्ञ संपूर्ण होगा ।

क्योंकि पांडवों में राजा होने का घमंड था , इसलिए उन्होंने खुद जाने के बजाय अपने एक दूत को भेज दिया । उन्होंने सोचा कि जैसे मक्खियाँ गुड़ पर मँडराने लगती हैं , ऐसे ही जब उस महात्मा को इस यज्ञ के बारे में पता चलेगा तो वह ख़ुद ही भोजन करने के लिए आ जायेगा । पर महात्मा ने वहाँ जाने से इनकार कर दिया ।

अब पांडव ख़ुद उस महात्मा को लेने के लिए गये और कहा कि महात्मा जी ! हमारे यहाँ यज्ञ है , आप चलकर उसे संपूर्ण करें । महात्मा ने कहा कि मैं उसके घर जाता हूँ जो मुझे एक सौ एक अश्वमेध यज्ञों का फल दे। वे कहने लगे कि हमारा तो एक यज्ञ संपूर्ण नहीं हो रहा औरयही है । पाँचों पांडव बारी – बारी से गये लेकिन महात्मा ने अपनी शर्त न तुम एक सौ एक यज्ञों का फल माँग रहे हो ! वह बोला कि मेरी तो शर्त बदली । आख़िरकार हारकर वे वापस आ गये । पांडव निराश होकर बैठे थे कि द्रौपदी ने कहा , ‘ आप उदास क्यों बैठे हैं ? मैं सुपच को लाती हूँ , यह भी कोई बड़ी बात है ! ” द्रौपदी उठी , नंगे पाँव पानी लायी , अपने हाथों से प्यार के साथ खाना बनाया । फिर नंगे पाँव चलकर महात्मा के पास गयी और अर्ज़ की , ‘ महात्मा जी ! हमारे यहाँ यज्ञ है । आप चलकर उसे संपूर्ण करें । ‘ महात्मा ने कहा कि तुम्हें पांडवों ने बताया होगा कि मेरा क्या प्रण है ? कहने लगी कि महाराज , मुझे पता है । महात्मा ने कहा , ‘ लाओ फिर एक सौ एक अश्वमेध यज्ञों का फल । ‘ द्रौपदी ने कहा , ‘ महात्मा जी ! मैंने आप जैसे संतों से सुना है कि जब संतों की ओर जाएँ तो एक – एक क़दम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है । इसलिए मैं जितने क़दम आपके पास चलकर आयी हूँ , उनमें से एक सौ एक अश्वमेध यज्ञों का फल आप ले लें और बाक़ी मुझे दे दें । ‘ यह सुनकर महात्मा सुपच चुपचाप द्रौपदी के साथ चल पड़ा ।

जब खाना परोसा तो महात्मा ने सब प्रकार के व्यंजनों को एक साथ मिला लिया । द्रौपदी खाना बनाने में सब राजकुमारियों और रानियों में अव्वल नंबर पर थी । दिल में कहने लगी कि आख़िर अपनी औक़ात दिखा दी । इसे खाने की क्या क़द्र ! अगर अलग – अलग खाता तो इसको पता चल जाता कि द्रौपदी के खाने में क्या स्वाद है । जब महात्मा खा चुका तब भी घंटा न बजा । पांडव बड़े हैरान हुए । आख़िर कृष्ण जी से पूछा कि महाराज ! अब क्या कसर है ? भगवान ने कहा कि द्रौपदी से पूछो , उसके मन में कसर है ।

द्रौपदी को पता नहीं था कि सुपच ने सारे भोजन को मिलाकर भोजन के स्वाद को जान – बूझकर ख़त्म किया है । महात्मा या तो खाना खाते समय सारे खाने ( व्यंजन ) को मिलाकर उसका स्वाद नष्ट कर देते हैं या अपनासुरत को खाना खाने से पहले अंदर ऊपर ले जाते हैं । नतीजा यह होता है कि खाना चाहे खट्टा हो या नमकीन , मीठा हो या फीका , रूखा हो या सूखा , चाहे कैसा भी हो , उनको स्वाद का पता नहीं चलता । जब द्रौपदी ने क्षमा माँगकर अपना मन शुद्ध कर लिया तो घंटा बजा ।

सो मालिक को केवल भक्ति और नम्रता ही प्यारी है । उसके दरबार में जाति – पाँति की नहीं , प्रेम और भक्ति की क़द्र है ।

सच्चा शिष्य कौन ?

सच्चा शिष्य कौन ?

सबद मरै सोई जन पूरा ॥ सतगुर आख सुणाए सूरा ॥72

गुरु अमरदास सत्ता और बलवंडा नामक दो पाठी थे । वे गुरु अर्जुन साहिब के दरबार में कीर्तन किया करते थे । उन्हें भ्रम हो गया कि उनके कीर्तन के कारण ही इतनी संगत जुड़ती है । इसी अभिमान ने उन्हें लालची बना दिया । उनके घर एक जवान लड़की थी , जिसकी शादी की उन्हें फ़िक्र थी । एक दिन गुरु साहिब से कहने लगे कि लड़की की शादी करनी है , हमें कुछ रुपयों की ज़रूरत है । गुरु साहिब ने कहा , ‘ बहुत अच्छा । ‘ यह कहकर आपने सौ , दो सौ रुपये देने चाहे , लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और कहा कि आपके दरबार में सैकड़ों शिष्य आते हैं , आपको किस बात की कमी है ? अब संतों के पास इतना रुपया कहाँ ? जब गुरु साहिब ने कोई जवाब न दिया तो पाठी कहने लगे , और कुछ नहीं तो हमें कम से कम एक टका प्रति शिष्य वसूल कर दो । इससे हमारी बहुत मदद हो जायेगी ।

‘ उनका ख़याल था कि गुरु साहिब के शिष्य काबुल कंधार तक हैं , हमारे हज़ारों रुपये बन जायेंगे । महीना बीत गया पर पाठियों को कुछ भी प्राप्त न हुआ । उन्होंने गुरु जी से फिर विनती की कि उनकी माँग पूरी की जाये । गुरु जी ने कहा कि शीघ्र ही तुम्हारी माँग पूरी कर दी जायेगी । दो मास और बीत गये , पर न तो उन्हें कोई चढ़ावा ही आया और न ही गुरु जी ने किसी को चढ़ावा देने के लिए कहा ।

पाठी फिर गुरु जी के पास गये और उन्होंने अपनी अर्ज़ दोहरायी और कहा कि आप अपना वचन पूरा कीजिये । गुरु जी ने कहा कि कल तुम्हारी माँग पूरी हो जायेगी । पाठियों ने सोचा कि संगत जो भी लाती है उसे संगत पर ख़र्च कर दिया जाता है , गुरु जी अपने पास बचाकर कुछ भी नहीं रखते , तो वे कल अपना वचन कैसे पूरा करेंगे ? क्या वे किसीसे उधार लेकर देंगे ? लेकिन जब दूसरे दिन गुरु साहिब ने साढ़े चार टके आगे रख दिये , तो वे देखकर हैरान रह गये । गुरु साहिब ने उनकी हैरानी दूर करते हुए कहा , ‘ पहले सिक्ख गुरु नानक साहिब , दूसरे सिक्ख गुरु अंगद देव , तीसरे सिक्ख गुरु अमरदास , चौथे सिक्ख गुरु रामदास जी , और मैं अभी आधा सिक्ख ही हूँ । इसलिए मैं तुम्हें वही दे रहा हूँ जो तुमने माँगा है यानी एक टका प्रति सिक्ख । ‘ गुरु जी ने फ़रमाया , ‘ भाई ! सच्चा शिष्य बनना आसान नहीं है । दुनियावी इच्छाओं और प्रलोभनों को त्यागकर केवल प्रभुभक्ति की ओर ध्यान देना चाहिए । प्रभुप्रेम को दुनिया के धन से नहीं आँका जा सकता । ‘

Source: परमार्थी साखियां (science of the soul)

चौरासी लाख योनियों से मुक्ति

गुरू अर्जुन देव जी कहते है: लख चौरासी जोन सबाईं।। मानस कऊ प्रभ दी वडयाई।। इस पउड़ी ते जो नर चुके, सो आइ जाइ दुख पाईदा।। (आदि ग्रंथ पृष्ठ स १०७५) गुरू साहिब चेतावनी दे रहे है कि जो लोग प्रभु की अपार दया से मिले मनुष्य जन्म के अमूल्य अवसर को इन्द्रियों के भोगों, […]

चौरासी लाख योनियों से मुक्ति

सतगुरु

सतगुरु : सन्त – सतगुरु मालिक का नर – रूप अवतार है जिसके अन्दर सत्य प्रकट है और जो सत्य से अभेद है । उसके अन्दर सत्य रमा हुआ है । मालिक से मिलकर उसमें मालिक का तेज आ गया । वह पवित्र हस्ती है , उसमें सत्य ख़ुद देह – स्वरूप में प्रकट है । वह ज्ञान का पुंज और भक्ति का स्रोत है , वह जीवों को सच्चे पथ का पथिक बनाकर धुर – धाम तक पहुँचाने की सामर्थ्य रखता है । वह मानव के रूप में ईश्वर है । ग्रन्थ – पोथियाँ हमारा सत्य से स्पर्श नहीं करवा सकतीं । आत्म – विद्या सिखाई नहीं जा सकती , वह एक स्पर्श की भाँति अनुभव की जाती है । जीवित कौन है ? गुरुबानी बताती है , केवल वही जीवित है जिसके अन्दर मालिक बस गया है :

सो जीविआ जिसु मनि वसिआ सोइ ॥ नानक अवरु न जीवै कोइ । आदि ग्रन्थ , पृ . 142

सतगुरु रब + इनसान है । वह परमात्मा के बोलने या प्रकट होने का माध्यम है । उसके वचन प्रभु के वचन होते हैं , चाहे देखने में वे इनसान के मुँह से निकलते प्रतीत होते हैं :

मुतलक़ आं आवाज़ ख़ुद अज़ शाह बुवद , गरचिह् अज़ हलकूमे – अब्दुल्ला बुवद । म मसनवी , मौलाना रूम , दफ़्तर 1 , पृ .213

सतगुरु के केवल उपदेश से ही रूहानी लाभ नहीं पहुँचता , बल्कि उसकी संगति से भी पहुँचता है जो आत्मिक जीवन देनेवाली , जाग्रति पैदा करनेवाली और आत्म – रस प्रदान करनेवाली है । सतगुरु की संगति में आत्मिक रस की जाग लगती है । उसकी मौज और दया तन , मन , और आत्मा को प्रफुल्लित करनेवाली होती है । वह अपनी एक दृष्टि , एक स्पर्श , एक वचन या ध्यान के द्वारा हमारे अन्दर आत्मिक आनन्द पैदा कर सकता है । वह शिष्य को आत्मिक जीवन की सम्पत्ति नक़द रूप में दे सकता है । वह आत्मिक जीवन का भोजन है जो शिष्य को सन्तुष्ट और तृप्त करता है । लेकिन यह भोजन कोई भूखा – प्यासा ही ले सकता है । सतगुरु आत्मज्ञान का सरोवर है , जिसमें से शिष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार रस ले सकता है ।

गुरु आदर्श पुरुष है । उसका शरीर वह द्वार है जहाँ बैठकर परमेश्वर अपना कार्य करता है । गुरु पूरा हो तभी परमार्थी का काम बनता है । अज्ञानी या अधूरे गुरु से परमार्थ की प्राप्ति नहीं होती :

जाको गुरु है आँधरा , चेला काह कराए । अंधा अंधा मेलिया , दूनो कूप पराए । कबीर साहिब , बीजक , पृ .97

गुरू जिना का अंधुला चेले नाही ठाउ ॥ बिनु सतिगुर नाउ न पाईऐ बिनु नावै किआ सुआउ ॥ आदि ग्रन्थ , पृ .58

सत्संग का अर्थ

सत्संग : ‘ सत् ‘ का मतलब है ‘ सत्य ‘ या ‘ सच्च ‘ , ‘ जीवित ‘ या ‘ जाग्रत ‘ , और ‘ संग ‘ का मतलब है ‘ साथ ‘ या ‘ सोहबत ‘ , यानी सदा कायम रहनेवाले पुरुष की सोहबत या संगति का नाम सत्संग है । सतगुरु सत् प्रकट है इसलिये उसकी संगति का नाम सत्संग है । जहाँ सतगुरु सत् का उपदेश देता है , वहाँ जाने पर आत्मिक रंग चढ़ता है । अगर जल के सरोवर के किनारे बैठने से शीतलता और अग्नि के पास बैठने से गर्मी आती है , तो रूहानी बादशाहों के पास बैठने से उनका रंग क्यों नहीं चढ़ेगा ? मालिक के रहने की असली जगह वह है जहाँ उसके प्रिय भक्त रहते हैं :

मन मेरा पंछी भया , उड़ि कर चढ़ा अकास । गगन मँडल खाली पड़ा , साहिब संतों पास ॥ कबीर साखी – संग्रह , भाग 1 और 2 , पृ . 120

मिलि सतसंगति खोजु दसाई विचि संगति हरि प्रभु वसै जीउ । आदि ग्रन्थ , पृ .94

सत्संग में केवल नाम का ही उपदेश होता है :

सतसंगति कैसी जाणीऐ ॥ जिथै एको नामु वखाणीऐ ॥ आदि ग्रन्थ , पृ .72

सत्संग दो प्रकार का होता है: बाहरी और आंतरिक। बाहर का सत्संग सतगुरु की सोहबत या संगति का नाम है और सुरत (आत्मा) का शब्द या नाम के साथ जुड़ना आंतरिक सत्संग है। गुरु अमरदास जी कहते है:

सतगुरु बाझहू संगति न होई।। (आदि ग्रंथ,पृ .1068)

धर्म – ग्रन्थों का महत्त्व

ग्रन्थों – पोथियों में महात्माओं की रूहानी मण्डलों की यात्रा का वर्णन और उनके निजी अनुभवों का उल्लेख है , जिनको हमारे मार्ग – दर्शन के लिए उन्होंने पुस्तकों में लिखा । हमारे दिल में उनके लिये इज़्ज़त है । उन्हें पढ़कर हमारे अन्दर किसी हद तक परमार्थ का शौक़ और मालिक से मिलने का चाव पैदा होता है । किताबों का सिर्फ इतना ही मक़सद है कि वे हमारे अन्दर दिल की किताब खोलने की इच्छा पैदा करें । ग्रन्थों – पुस्तकों के द्वारा हम पिछले महात्माओं के परमार्थ के विचारों को जान सकते हैं और उनके अनुभवों से लाभ उठाकर तथा किसी मौजूदा महात्मा से राह लेकर उनके अनुभवों को अपने निजी अनुभव बनाने का यत्न कर सकते हैं ।

इन सब बानियों में वही बानी सबसे उत्तम है जिसे मालिक किसी पूर्ण महात्मा के मुख से कहलवाता है । मन और बुद्धि के घाट पर बैठकर महात्मा कुछ भी नहीं कहते । इनके अलावा और सब बानियाँ अपर्याप्त और अधूरी । एक बार अपने एक शिष्य से गुरु नानक साहिब ने कहा :

जैसी मी आवै खसम को बाणी , तैसड़ा करी गिआनु वे लालो ॥आदि ग्रन्थ , पृ .722

महात्मा के वचन मालिक के वचन होते हैं , चाहे प्रकट रूप में वे मानवीय कण्ठ से निकलते हुए मालूम देते हैं ।

मुक्तलक आं आवाज़ खुद अज़ शाह बुवद , गरचिह अज हलकूमे – अब्दुल्ला बुवद । मसनवी मौलाना रूम , दफ्तर 1 , पृ .213

अनुभवी महात्माओं के वचन परमार्थ के जिज्ञासुओं के लिए हीरे जवाहरात से भी ज्यादा कीमती होते हैं । ये हमें केवल अन्दर जाने तथा स्वयं को और मालिक को पहचानने का उपाय बताते हैं , लेकिन ये हमें अन्दर नहीं ले जा सकते और न ही हमारी सुरत ( आत्मा ) को कुल – मालिक के साथ जोड़ सकते हैं ।

संसार किताबी ज्ञान में उलझा रहता है और इनकी टेक पकड़कर जीव इनसे बँधा रहता है । जब तक कोई पूर्ण महात्मा नहीं मिलता , छुटकारे का कोई उपाय नहीं है । गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं :

तब ते जीव भयउ संसारी । छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी ॥ श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई । श्रीरामचरितमानस 7.116 ( ख ) : 3

धर्म और धर्म – ग्रन्थों से भी पहले इस संसार में इनसान थे । इतिहास के दौर में कई धर्म आये और चले गये । कई धर्म – ग्रन्थ लिखे गये । सब धर्म – ग्रन्थों का स्रोत मनुष्य का हृदय है क्योंकि सभी भेद मनुष्य के अन्तर में हैं । किताबों में उन भेदों का उल्लेख है , स्वयं भेद नहीं । जब तक किसी महात्मा से मार्गदर्शन पाकर हम अन्दर नहीं जाते , उन भेदों को नहीं पा सकते।

मनुष्य ग्रन्थों पोथियों को पढ़ता है और तत्त्व की बातों की व्याख्या करता है , लेकिन स्वयं तत्त्व से खाली रह जाता है :

सिम्रिति सासत्र पड़हि पुराणा ॥ वादु वखाणहि ततु न जाणा ।। विणु गुर पूरे ततु न पाईऐ , सच सूचे सचु राहा हे । आदि ग्रन्थ , पृ . 1032

पुस्तकों और मनुष्य का भेद प्रत्यक्ष है । मनुष्य चेतन है , लेकिन पुस्तकें चेतन नहीं । मनुष्य को ज्ञान है और उसे इस बात का पता है कि उसे ज्ञान है , पर पुस्तकों को इस बात का पता नहीं कि उन्हें ज्ञान नहीं है । मनुष्य आगे – पीछे का विचार कर सकता है , पर पुस्तकें नहीं कर सकतीं । जब तक हमें अपने अन्दर का पता नहीं , हम अविद्या में भूले रहते हैं । किताबी ज्ञान तो सिर का भार बन जाता है क्योंकि वह हमारे मन और बुद्धि के फैलने का कारण होता है । केवल वही विद्या हमारे सन्तोष का कारण हो सकती है जिससे हमें अपनी असलियत की जानकारी प्राप्त हो । जिसकी अन्तर की किताब खुल गयी , और वह अपने दिल को मालिक की याद में लगाये रखता है , उसे बाहरी किताबों की ज़रूरत नहीं रहती । सूफ़ी फ़क़ीर नूरी कहते हैं कि उन सैकड़ों किताबों और काग़ज़ों को , जिन्हें तुम पढ़ते हो , आग में फेंक दो और अपने दिल और अपनी आत्मा को परमात्मा की ओर मोड़ो :

सद किताब ओ सद वरक़ दर नार कुन , जानो – दिल ए जानिबे – दिलदार कुन । अबियाते – नूरी संदर्भ : किताब – उल – बैअत

उपनिषदों ( कठ , 1 : 2 : 23 श्वेताश्वतर उपनषिद् , 2:15 ) में कहा गया है कि आत्मा का ज्ञान न वेदों , ग्रन्थों और पोथियों के पढ़ने से प्राप्त होता है और न उनके निरन्तर सुनने से , क्योंकि आत्मा का ज्ञान मन , बुद्धि और विद्या के द्वारा नहीं हो सकता । यह कहने या सुनने का विषय नहीं , अनुभव का विषय है ।

ऋग्वेद ( 1 : 164 : 39 ) में और श्वेताश्वतर उपनिषद् ( 4 : 8 ) में कहा गया है , ” जो मनुष्य उस परमात्मा को नहीं जानता जो ऋचाओं में बतायी गयी अविनाशी परम सत्ता है , जिसके अन्तर आकाश में सब देवताओं का वास है , ऋचाएँ उसके किस काम आयेंगी ? जो उसे जान लेते हैं , वे उसमें अच्छी तरह स्थिर हो जाते हैं , टिक जाते हैं ।

” मनुष्य चाहे चारों वेद , अठारह पुराण , नौ व्याकरण और छ : शास्त्र ( दर्शन ) पढ़ ले , पर इन उक्तियों और युक्तियों में लगकर वह हक़ीक़त को नहीं पा सकता । जब तक हमें सुरत और शब्द का ज्ञान नहीं है , जब तक हमारी सुरत कुल मालिक को नहीं पहचानती , हमारी गति चण्डूल पक्षी की भाँति है जो जिस भी बोली को सुनता है , उसी की नक़ल कर लेता है पर समझता कुछ भी नहीं । तुलसी साहिब ने कहा है :

चार अठारह नौ पढ़े , षट पढ़ि खोया मूल । सुरत सबद चीन्हे बिना , ज्यों पंछी चंडूल ॥ संतबानी संग्रह , भाग 1 , पृ .215

विद्वता की काट – छाँट से ख़ुश्क बुद्धि का फैलाव होता है जो सिर पर मुसीबतों का बोझ बन जाता है । इन लम्बे – चौड़े हिसाबों को छोड़कर असली नुक्ते को पकड़ो , जिसके द्वारा कुफ्र दूर होता है और जीव का कल्याण होता है :

क्यों पढ़ना ए गड्ड किताबां दी , सिर चाना एं पंड अजाबां दी । कुल्लियात बुल्लेशाह , काफ़ी 11

फड़ नुकता छोड हिसाबां नूं । कर दूर कुफ़र देआं बाबां नूं । कुल्लियात बुल्लेशाह , काफ़ी 12

गुरुबानी कहती है कि पढ़ने , लिखने और विचार करने के लिए चाहे सारी उम्र , सालों – साल , साँसों के अन्त तक , गाड़ियों की गाड़ियाँ भरकर किताबों का अध्ययन करते रहें , पर सब व्यर्थ है । केवल एक ही बात मालिक को पहचानना- लेखे में आती है, बाकी सबकुछ व्यर्थ है। पढ़ाई के द्वारा काम, क्रोध आदि से छुटकारा नहीं होता।

सही लक्ष्य

सही लक्ष्य

दुःख से बचने के लिए और परम सुख की प्राप्ति के लिए लोग अंधा – धुंध , जी – तोड़ कोशिश करते हैं , पर कोई प्राप्ति होती नज़र नहीं आती । लेकिन समझदार इनसान पुरुषार्थ के साथ – साथ सही लक्ष्य को भी अपने सामने रखता है । यदि लक्ष्य सही न हो या स्पष्ट न हो , तो उठाया हुआ हर क़दम वक़्त की बरबादी है और कभी – कभी हमें लक्ष्य से और दूर ले जाता है ।इसके विपरीत , लक्ष्य सही होने पर थोड़ा – सा परिश्रम भी व्यर्थ नहीं जाता । इसलिए किसी आदर्श की प्राप्ति के लिए केवल पुरुषार्थ करना ही काफ़ी नहीं , उसके साथ लक्ष्य का सही होना भी ज़रूरी है । जिस प्रकार वस्तु कहीं पर है और उसे ढूँढ़ा कहीं और जाता है , तो वह वस्तु मिलती नहीं , उसे खोजने में सारा समय व्यर्थ चला जाता है । कबीर साहिब फ़रमाते हैं :

वस्तु कहीं ढूँढै कहीं , केहि बिधि आवै हाथ । कहै कबीर तब पाइये , जब भेदी लीजै साथ ।। कबीर साखी – संग्रह , भाग 1 और 2 , पृ .5

मनुष्य का सही लक्ष्य को अपने सामने न रखना , दुनिया की बेचैनी और अशान्ति का सबसे बड़ा कारण है ।

जीवन का सही लक्ष्य मालूम करने के लिए मनुष्य को अपनी शरीर रूपी किताब को पढ़ना चाहिए , क्योंकि जितनी भी किताबें और विद्याएँ हैं , वे इसी इनसानी किताब में प्रकट हुई हैं । इनसान के अन्दर परमात्मा के सन्देश उतरते हैं । मनुष्य एक अत्यन्त अद्भुत प्राणी है । यदि इसकी आन्तरिक आँख खुली हो तो यह वास्तव में स्वयं हरि का मन्दिर है । यह शरीर घास का पूला है जिसके नीचे रूहानियत का अथाह सागर है । यह देखने में तो एक कण ( ज़र्रा ) नज़र आता है , पर अन्दर से यह सौ सूर्यों की भाँति प्रकाशमान है :

तन रा चू मुश्ते काहदाँ दर जेरे – ऊ दरियाए जाँ , गरचिह ज़ बेरूँ ज़र्रा – ए- सद आफ़ताबे अज़ दीं । दीवाने – शम्स तब्रेज़ , पृ . 259

इस शरीर रूपी घर के अन्दर सबकुछ मौजूद है । जो इसको छोड़कर बाहर ढूँढ़ता है , वह भ्रमों में भूला हुआ :

सभ किछु घर महि बाहरि नाही । बाहरि टोलै सो भरमि भुलाही ।। आदि ग्रन्थ , पृ . 102

विरहिणी आत्मा

विरहिणी आत्मा (संत कबीर साहिब की बानी)

वै दिन कब आबैंगे भाइ । जा कारनि हम देह धरी है , मिलिबौ अंगि लगाइ ॥ टेक ॥ हौं जानू जे हिल मिलि खेलूँ , तन मन प्रॉन समाइ । या काँमना करौ परपूरन , समरथ हौ राँम राइ ॥ माँहि उदासी माधौ चाहै , चितवत रैंनि बिहाइ । सेज हमारी स्यंघ | भई है , जब सोऊँ तब खाइ ॥ यहु अरदास दास की सुनिये , तन की तपति बुझाइ । कहै कबीर मिलै जे साँई , मिलि करि मंगल गाइ ॥

भारतीय परिवार में जब कन्या का जन्म होता है तो माता – पिता प्यार के साथ उसका पालन – पोषण करते हैं , परंतु साथ ही याद रखते हैं कि पराई अमानत है और विवाह के बाद अपने पति के घर चली जाएगी । इसी भावना के आधार पर कबीर साहिब कहते हैं कि आत्मा ने मनुष्य चोले में इसी लिए जन्म लिया है कि वह अपने पति परमात्मा से मिलाप प्राप्त कर ले । आत्मारूपी कन्या का विवाह तो पहले ही हो चुका है क्योंकि वर और वधू अर्थात् परमात्मा और आत्मा , एक ही घर में यानी एक ही शरीर में निवास करते हैं । दु : ख की बात यही है कि एक घर में रहते हुए भी आत्मा को अब तक परमेश्वररूपी पति के दर्शन नहीं हो सके । विरहिणी आत्मा की पुकार का चित्रण कबीर साहिब ने इस करुण विरह गीत में किया है ।

स्यंघ=सिंह

लोगन राम खिलौना जाना

लोगन राम खिलौना जाना (संत कबीर की बाणी)

माथे तिलक हथ माला बानां ॥ लोगन राम खिलउना जानां ॥ जउ हउ बउरा तउ राम तोरा ॥ लोग मरम कह जानै मोरा ॥ तोरउ न पाती पूजउ न देवा ॥ राम भगति बिन निहफल सेवा ॥ सतगुर पूजउ सदा सदा मनावउ ॥ ऐसी सेव दरगह सुख पावउ ॥ लोग कहै कबीर बउराना ॥ कबीर का मरम राम पहिचानां ॥

लोग माथे पर तिलक , हाथ में माला और शरीर पर लाल , पीले , नील , सफ़ेद आदि रंगों में से किसी एक रंग का चोला धारण कर लेते हैं । वे फूलों , पत्तियों आदि के द्वारा भाँति – भाँति की पूजा करते हैं । कबीर साहिब कहते हैं कि इस तरह के तमाशे करनेवाले लोगों ने प्रभु को खिलौना समझ लिया है परंतु सच्ची भक्ति के बिना सब सेवा व्यर्थ है । मैं तो सतगुरु की पूजा करता हूँ और उन्हीं को प्रसन्न करने का प्रयत्न करता हूँ । ऐसी सेवा से ही प्रभु की दरगाह में मान प्राप्त होता है । लोग कहते हैं कि कबीर पागल हो गया है परंतु कबीर की आंतरिक अवस्था का भेद केवल प्रभु ही जानता है ।

  मनावउ= प्रसन्न करना , बउरा= बावला

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