🧘🏽‍♂️बाहर नहीं अंदर खोजें🧘🏽‍♂️

संतों महात्माओं के उपदेश का आदर करो और खुद को पहचानों आप क्या हो और क्या कर रहे हो ?
एक भिखारी था । उसने सम्राट होने के लिए कमर कसी और चौराहे पर अपनी फटी-पुरानी चादर बिछा दी, अपनी हाँडी रख दी और सुबह-दोपहर-शाम भीख माँगना शुरू कर दिया क्योंकि उसे सम्राट होना था। लेकिन भीख माँगकर भी भला कोई सम्राट हो सकता है ? किंतु उसे इस बात का पता नहीं था ।

भीख माँगते-माँगते वह बूढ़ा हो गया और मौत ने दस्तक दी क्यूँकि मौत तो किसी को नहीं छोड़ती । वह बूढ़ा भी मर गया।लोगों ने उसकी हाँडी फेंक दी, सड़े-गले बिस्तर नदी में बहा दिये ,जमीन गंदी हो गयी थी तो सफाई करने के लिए थोड़ी खुदाई की। खुदाई करने पर लोगों को वहाँ बहुत बड़ा खजाना गड़ा हुआ मिला।तब लोगों ने कहा : ‘कितना अभागा था ! जीवनभर भीख माँगता रहा । जहाँ बैठा था अगर वहीं जरा-सी खुदाई करता तो सम्राट हो जाता !’

ऐसे ही हम जीवनभर बाहर की चीजों की भीख माँगते रहते हैं किन्तु जरा-सा भीतर गोता मारें ईश्वर को पाने के लिए और ध्यान का अभ्यास ( भजन सुमिरन)करें तो उस आत्मखजाने को भी पा सकते हैं ,जो हमारे अंदर ही छुपा हुआ है ।

गुरु कौन


बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे। उन के पास शिक्षा लेने हेतु दूर दूर से शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया, स्वामीजी आपके गुरु कौन है?आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है? महंत शिष्य का सवाल सुन मुस्कुराए और बोले, मेरे हजारो गुरु हैं! यदि मै उनके नाम गिनाने बैठ जाऊ तो शायद महीनो लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओ के बारे मे तुम्हे जरुर बताऊंगा।

मेरा पहला गुरु था एक चोर।

एक बार में रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने और घर बंद हो चुके थे। लेकिन आख़िरकार मुझे एक आदमी मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैने उससे पूछा कि मै कहा ठहर सकता हूं, तो वह बोला की आधी रात गए इस समय आपको कहीं कोई भी आसरा मिलना बहुत मुश्किल होंगा, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ आज कि रात ठहर सकते हो। मै एक चोर हु और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं होंगी तो आप मेरे साथ रह सकते है।

वह इतना प्यारा आदमी था कि मै उसके साथ एक रात कि जगह एक महीने तक रह गया ! वह हर रात मुझे कहता कि मै अपने काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। जब वह काम से आता तो मै उससे पूछता की कुछ मिला तुम्हे?
तो वह कहता की आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था, और हमेशा मस्त रहता था। कुछ दिन बाद मैं उसको धन्यवाद करके वापस आपने घर आ गया|।

जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी नहीं हो रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना छोड़ लेने की ठान लेता था। और तब अचानक मुझे उस चोर की याद आती जो रोज कहता था कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा और इस तरह मैं हमेशा अपना ध्यान लगता और साधना में लीन रहता।

मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था।

एक बहुत गर्मी वाले दिन मै कही जा रहा था और मैं बहुत प्यासा था और पानी के तलाश में घूम रहा था कि सामने से एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी बहुत प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो की उसकी अपनी ही परछाई थी। कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता। अंततः, अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सिख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का साहस से मुकाबला करता है।

👉🏿मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है।

मै एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था। वह पास के किसी मंदिर में मोमबत्ती रखने जा रहा था।मजाक में ही मैंने उससे पूछा की क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है?

वह बोला, जी मैंने ही जलाई है तो मैंने उससे कहा की एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। क्या तुम मुझे वह स्त्रोत दिखा सकते हो जहा से वह ज्योति आई?

वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती को फूंख मारकर बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहा गई वह? आप ही मुझे बताइए।

मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए।

शिष्य होने का अर्थ क्या है?

शिष्य होने का अर्थ है पुरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना।कभी किसी कि बात का बूरा नहि मानना चाहिए, किसी भी इंसान कि कही हुइ बात को ठंडे दिमाग से एकांत में बैठकर सोचना चाहिए के उसने क्या-क्या कहा और क्यों कहा तब उसकी कही बातों से अपनी कि हुई गलतियों को समझे और अपनी कमियों को दूर् करे।

जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है। हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातो को सीखते रहना चाहिए। यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है, यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं की नहीं।

!! नेत्रहीन संत !!

एक बार एक राजा अपने सहचरों के साथ शिकार खेलने जंगल में गया था। वहाँ शिकार के चक्कर में एक दूसरे से बिछड़ गये और एक दूसरे को खोजते हुये राजा एक नेत्रहीन संत की कुटिया में पहुँच कर अपने बिछड़े हुये साथियों के बारे में पूछा।

नेत्र हीन संत ने कहा महाराज सबसे पहले आपके सिपाही गये हैं, बाद में आपके मंत्री गये, अब आप स्वयं पधारे हैं। इसी रास्ते से आप आगे जायें तो मुलाकात हो जायगी। संत के बताये हुये रास्ते में राजा ने घोड़ा दौड़ाया और जल्दी ही अपने सहयोगियों से जा मिला और नेत्रहीन संत के कथनानुसार ही एक दूसरे से आगे पीछे पहुंचे थे।

यह बात राजा के दिमाग में घर कर गयी कि नेत्रहीन संत को कैसे पता चला कि कौन किस ओहदे वाला जा रहा है। लौटते समय राजा अपने अनुचरों को साथ लेकर संत की कुटिया में पहुंच कर संत से प्रश्न किया कि आप नेत्रविहीन होते हुये कैसे जान गये कि कौन जा रहा है, कौन आ रहा है ?

राजा की बात सुन कर नेत्रहीन संत ने कहा महाराज आदमी की हैसियत का ज्ञान नेत्रों से नहीं उसकी बातचीत से होती है। सबसे पहले जब आपके सिपाही मेरे पास से गुजरे तब उन्होंने मुझसे पूछा कि ऐ अंधे इधर से किसी के जाते हुये की आहट सुनाई दी क्या ? तो मैं समझ गया कि यह संस्कार विहीन व्यक्ति छोटी पदवी वाले सिपाही ही होंगे।

जब आपके मंत्री जी आये तब उन्होंने पूछा बाबा जी इधर से किसी को जाते हुये….. तो मैं समझ गया कि यह किसी उच्च ओहदे वाला है, क्योंकि बिना संस्कारित व्यक्ति किसी बड़े पद पर आसीन नहीं होता। इसलिये मैंने आपसे कहा कि सिपाहियों के पीछे मंत्री जी गये हैं।

जब आप स्वयं आये तो आपने कहा सूरदास जी महाराज आपको इधर से निकल कर जाने वालों की आहट तो नहीं मिली तो मैं समझ गया कि आप राजा ही हो सकते हैं। क्योंकि आपकी वाणी में आदर सूचक शब्दों का समावेश था और दूसरे का आदर वही कर सकता है जिसे दूसरों से आदर प्राप्त होता है। क्योंकि जिसे कभी कोई चीज नहीं मिलती तो वह उस वस्तु के गुणों को कैसे जान सकता है!

दूसरी बात यह संसार एक वृक्ष स्वरूप है- जैसे वृक्ष में डालियाँ तो बहुत होती हैं पर जिस डाली में ज्यादा फल लगते हैं वही झुकती है। इसी अनुभव के आधार में मैं नेत्रहीन होते हुये भी सिपाहियों, मंत्री और आपके पद का पता बताया अगर गलती हुई हो महाराज तो क्षमा करें।

राजा संत के अनुभव से प्रसन्न हो कर संत की जीवन वृत्ति का प्रबंन्ध राजकोष से करने का मंत्री जी को आदेशित कर वापस राजमहल आया।

शिक्षा:-
आजकल हमारा मध्यमवर्ग परिवार संस्कार विहीन होता जा रहा है। थोड़ा सा पद, पैसा व प्रतिष्ठा पाते ही दूसरे की उपेक्षा करते हैं, जो उचित नहीं है। मधुर भाषा बोलने में किसी प्रकार का आर्थिक नुकसान नहीं होता है। अतः मीठा बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिये..!!

रामायण

रामायण…
‘रा’ का अर्थ है प्रकाश, ‘मा’ का अर्थ है मेरे भीतर, यानी रामा का अर्थ है मेरे भीतर का प्रकाश। दशरथ और कौसल्या ने राम का जन्म दिया। दशरथ का अर्थ है 10 रथ। दस रथ 5 इन्द्रिय अंगों (ज्ञानेंद्रिय) और 5 क्रिया अंगों (कर्मेन्द्रिय) के प्रतीक हैं। कौशल्या का अर्थ है कौशल। 10 रथों का कुशल सवार राम को जन्म दे सकता है। राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। अयोध्या का मतलब एक ऐसी जगह है जहां कोई युद्ध नहीं हो सकता है। जब हमारे मन में कोई संघर्ष नहीं है, तो चमक आरंभ हो सकती है।
रामायण का एक दार्शनिक,आध्यात्मिक महत्व और एक गहरा सत्य है।कहा जाता है कि रामायण हमारे ही अंदर हो रही है। हमारी आत्मा राम है, हमारा मन सीता है। हमारी सांस या जीवन-शक्ति हनुमान है।हमारी जागरूकता लक्ष्मण है और हमारा अहंकार रावण है। जब मन (सीता), अहंकार (रावण) द्वारा चुराया जाता है, तब आत्मा (राम) बेचैन हो जाती है।
अब आत्मा (राम) अपने आप ही मन (सीता) तक नहीं पहुँच सकती। इसे जागरूकता (लक्ष्मण) में रहकर जीवन-शक्ति (हनुमान) का सहारा लेना होगा। जीवन-शक्ति (हनुमान) और जागरूकता (लक्ष्मण) की मदद से, मन (सीता) आत्मा (राम) के साथ फिर से मिल गया, और अहंकार (रावण) मिट गया

परमात्मा कहा है?

गुरु नानक देव जी की वाणी है : 

हर मंदर सोई आखीऐ जिथहो हर जाता ॥ मानस देह गुर बचनी पाइआ सभ आतम राम पछाता ॥ बाहर मूल न खोजीऐ घर माहे बिधाता ॥ मनमुख हर मंदर की सार न जाणनी तिनी जनम गवाता ॥ (आदि ग्रंथ पेज न 953)

अर्थात् उस स्थान को ही हरि – मंदिर कहा जा सकता है जिसमें उस हरि यानी परमात्मा की प्राप्ति होती है । वह सर्वव्यापी परमात्मा , गुरु के वचनों पर अमल करके शब्द के जरिए, केवल मनुष्य देह में ही मिलता है। उसकी तलाश बाहर बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह प्रभु तो हमारे देहरूपी घर में ही वास करता है। मनमुख इस असली हर मंदिर के भेद को नहीं जानते और अपना जन्म बाहर भटकने में व्यर्थ गंवा देते है।

यही उपदेश अनादि काल से सभी संत महात्मा देते आ रहे है। ऋषि मुनियों ने मनुष्य शरीर को नर नारायणी देह कहा है, क्योंकि इसकी रचना करने वाला नारायण इसके अंदर बैठा हुआ है और आत्मा अंदर ही उस नारायण से मिलाप कर सकती है।

परमात्मा खुद लेने आता है!

एक बादशाह ने वज़ीर से पूछा- परमात्मा के साथ मिलाप कैसे हो सकता है? वजीर बोला, परमात्मा स्वयं कामिल मुर्शिद का रूप धारण करके जीव को अपने साथ मिलाने के लिए इस संसार में आता है। बादशाह बोला, परमात्मा के पास तो फरिश्तों की फौज है, फिर उसे स्वयं इंसान के रूप में यहां आने की क्या आवश्यकता है? वजीर ने उत्तर के लिए थोड़े समय की मांग की। वजीर ने बादशाह के बेटे की शक्ल का रबड़ का एक बच्चा बनवाया, बादशाह को बच्चे के तालाब में गिरने की आवाज सुनाई दी, उसे लगा कि मेरा बेटा तालाब में गिर गया है, उसने एक दम तालाब में छलांग लगा दी और बच्चे को बाहर निकाल लिया। वजीर ने राजा से पूछा, यहां पर इतने अहलकार और नौकर मौजूद थे, फिर आपने खुद इस तालाब में छलांग लगाने की तकलीफ क्योँ की? बादशाह बोला, मैं अपने बेटे को डूबता हुआ देखकर अपने आपको कैसे रोक सकता था?
वजीर बोला, जब परमात्मा रूहों को अपनी जुदाई में तड़पते हुए देखता है, तो उससे भी रूहों का दर्द सहन नहीं होता है और फिर वो इंसानी चोला धारण करके उन्हें निज-घर वापस ले जाने के लिए स्वयं एक पूरन संत सतगुरु के रूप में मृत्युलोक में आ जाता है!

श्रद्धा के फूल

एक बार किसी गांव में एक बडे संत महात्मा का अपने शिष्यो सहित आगमन हुआ। सब इस होड़ में लग गये कि क्या भेंट करें। इधर गाँव में एक गरीब मोची था। उसने देखा कि मेरे घर के बाहर के तालाब में बेमौसम का एक कमल खिला है।

उसकी इच्छा हुई कि, आज नगर में महात्मा आए हैं, सब लोग तो उधर ही गए हैं, आज हमारा काम चलेगा नहीं, आज यह फूल बेचकर ही गुजारा कर लें। वह तालाब के अंदर कीचड़ में घुस गया। कमल के फूल को लेकर आया। केले के पत्ते का दोना बनाया..और उसके अंदर कमल का फूल रख दिया।

पानी की कुछ बूंदें कमल पर पड़ी हुई हैं ..और वह बहुत सुंदर दिखाई दे रहा है।

इतनी देर में एक सेठ पास आया और आते ही कहा-”क्यों फूल बेचने की इच्छा है ?” आज हम आपको इसके दो चांदी के रूपए दे सकते हैं।

अब उसने सोचा …कि एक-दो आने का फूल! इस के दो रुपए दिए जा रहे हैं। वह आश्चर्य में पड़ गया।

इतनी देर में नगर-सेठ आया । उसने कहा ”भई, फूल बहुत अच्छा है, यह फूल हमें दे दो” हम इसके दस चांदी के सिक्के दे सकते हैं।

मोची ने सोचा, इतना कीमती है यह फूल। नगर सेठ ने मोची को सोच मे पड़े देख कर कहा कि अगर पैसे कम हों, तो ज्यादा दिए जा सकते हैं।

मोची ने सोचा-क्या बहुत कीमती है ये फूल?

नगर सेठ ने कहा-मेरी इच्छा है कि मैं महात्मा के चरणों में यह फूल रखूं। इसलिए इसकी कीमत लगाने लगा हूं।

इतनी देर में उस राज्य का मंत्री अपने वाहन पर बैठा हुआ पास आ गया और कहता है- क्या बात है? कैसी भीड़ लगी हुई है?
अब लोग कुछ बताते इससे पहले ही उसका ध्यान उस फूल की तरफ गया। उसने पूछा- यह फूल बेचोगे?

हम इस के सौ सिक्के दे सकते हैं। क्योंकि महात्मा आए हुए हैं। ये सिक्के तो कोई कीमत नहीं रखते।

जब हम यह फूल लेकर जाएंगे तो सारे गांव में चर्चा तो होगी कि महात्मा ने केवल मंत्री का भेंट किया हुआ ही फूल स्वीकार किया। हमारी बहुत ज्यादा चर्चा होगी।

इसलिए हमारी इच्छा है कि यह फूल हम भेंट करें और कहते हैं कि थोड़ी देर के बाद राजा ने भीड़ को देखा, देखने के बाद वजीर ने पूछा कि बात क्या है? वजीर ने बताया कि फूल का सौदा चल रहा है।

राजा ने देखते ही कहा-इसको हमारी तरफ से एक हजार चांदी के सिक्के भेंट करना। यह फूल हम लेना चाहते हैं।

गरीब मोची ने कहा-लोगे तो तभी जब हम बेचेंगे। हम बेचना ही नहीं चाहते। अब राजा कहता है कि…बेचोगे क्यों नहीं?

उसने कहा कि जब महात्मा के चरणों में सब कुछ-न-कुछ भेंट करने के लिए पहुंच रहे हैं..तो ये फूल इस गरीब की तरफ से आज उनके चरणों में भेंट होगा।
राजा बोला-देख लो, एक हजार चांदी के सिक्कों से तुम्हारी पीढ़ियां तर सकती हैं।

गरीब मोची कहा-मैंने तो आज तक राजाओं की सम्पत्ति से किसी को तरते नहीं देखा लेकिन महान पुरुषों के आशीर्वाद से तो लोगों को जरूर तरते देखा है।

राजा मुस्कुराया और कह उठा-तेरी बात में दम है। तेरी मर्जी, तू ही भेंट कर ले।

अब राजा तो उस उद्यान में चला गया जहां महात्मा ठहरे हुए थे…और बहुत जल्दी चर्चा महात्मा के कानों तक भी पहुंच गई, कि आज कोई आदमी फूल लेकर आ रहा है..

जिसकी कीमत बहुत लगी है। वह गरीब आदमी है इसलिए फूल बेचने निकला था जिससे कि उसका गुजारा होता। जैसे ही वह गरीब मोची फूल लेकर पहुंचा, तो शिष्यों ने महात्मा से कहा कि वह व्यक्ति आ गया है।

लोग एकदम सामने से हट गए। महात्मा ने उसकी तरफ देखा। मोची फूल लेकर जैसे पहुंचा तो उसकी आंखों में से आंसू बरसने लगे। कुछ बूंदे तो पानी की कमल पर पहले से ही थी…कुछ उसके आंसुओं के रूप में ठिठक गई कमल पर।

रोते हुए इसने कहा-सब ने बहुत-बहुत कीमती चीजेें आपके चरणों में भेंट की होंगी, लेकिन इस गरीब के पास यह कमल का फूल और जन्म-जन्मान्तरों के पाप, जो पाप मैंने किए हैं उनके आंसू आंखों में भरे पड़े हैं। उनको आज आपके चरणों में चढ़ाने आया हूं। मेरा ये फूल और मेरे आंसू भी स्वीकार करो।

महात्मा के चरणों में फूल रख दिया। गरीब मोची घुटनों के बल बैठ गया।

संत महात्मा ने अपने शिष्य आनन्द को बुलाया और कहा, देख रहे हो आनन्द! हजारों साल में भी कोई राजा इतना नहीं कमा पाया जितना इस गरीब इन्सान ने आज एक पल में ही कमा लिया।

इसका समर्पण श्रेष्ठ हो गया। इसने अपने मन का भाव दे दिया।

एकमात्र ये मन का भाव ही है जिससे हम ईश्वर की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
उस कृपा के आगे त्रिलोकी का सामान भी कोई अहमियत नहीं रखता।

परमार्थ के मार्ग में साधक की चार अवस्थाएँ

” परमार्थ के मार्ग में साधक की चार अवस्थाएँ

1. कर्मकाण्ड या शरीयत : अच्छे कार्य करना जैसा कि संसार के सब धार्मिक ग्रन्थों में बताया गया है ।

2. उपासना या तरीक़त : किसी कामिल गुरु के आदेश और मार्ग – दर्शन के अनुसार परमार्थ के कार्य करना । मन और इन्द्रियों को वश में करना तथा अपने आप को ध्यान वगैरह दूसरी आध्यात्मिक क्रियाओं में लगाये रखना ।

3. भक्ति या मारफत : परमात्मा के प्यार में इतने लीन हो जाना कि सिवाय उसके और किसी बात की फ़िक्र ही न रहे , चित्त से संसार और संसार के पदार्थों के सब खयाल दूर हो जायें , पाँचों विकार ख़त्म हो जायें , मन और इन्द्रियों वश में आ जायें और संसार के सुखों तथा इन्द्रियों के भोगों की तृष्णा दूर हो जाये ।

4. ज्ञान या हक़ीक़त : सत्य या हक़ीक़त को जानना और परमात्मा के साथ एक हो जाना ।

गुरु की मौज

“परमार्थी साखी”

ये बात उन दिनों की है जब बाबा जैमल सिंह जी ने महाराज सावन सिंह जी को अपनी गुरु गद्दी सौपने का निर्णय कर लिया था।

उस दिन बाबा जैमल सिंह ने महाराज सावन सिंह जी से कहा कि – जी मेरे लिए अकाल पुरुष का हुकुम आ चूका है अब मेरे बाद सारी जिम्मेवारी और काम काज तूने ही संभालना है ।

यह बात सुनकर महाराज सावन सिंह जी अचंभित होकर बोले ये काम मुझसे ना होयेगा !

बाबा जैमल सिंह जी – क्यों भाई क्यों नही होयेगा तुझसे ?

महाराज सावन सिंह जी – आप मुझे दूसरा कोई भी काम दसो मैं उसके खिलाफ नही जाऊंगा लेकिन ये इतनी बड़ी जिम्मेवारी वाला काम मुझसे ना होयेगा जी । और फिर इतनी भरी संगत में से आपने मुझे ही क्यों चुना?

उनकी बाते सुनकर बाबा जैमल सिंह जी बोले – मैं अपने गुरु से पूछ के बताता हूँ । और बाबा जैमल सिंह कुछ देर के लिए आँखे बन्द कर अंतर्ध्यान हो कर वापिस आये और बोले – “मौज बन गयी जी”।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज?

बाबा जैमल सिंह जी बोले – भाई मौज ये है कि गुरु का हुकुम आया है कि गुरु गद्दी तूने ही संभालनी है। सारा काम सारी जिम्मेवारियाँ तूने ही निभानी है।

फिर महाराज सावन सिंह जी – अच्छा ठीक है लेकिन मैं तो मिलेट्री में एक सरकारी कर्मचारी हूँ मेरा तो खुद का बसर ही पेंशन से होना है तो आगे डेरे के रख रखाव और डेरे की बढ़ती संगत और उनकी सर्व सुविधाओं के लिए आर्थिक काम काज को मैं कैसे मैनेज करूँगा ?

बाबा जैमल सिंह – ये भी गुरु से पुछ के बताता हूँ। फिर वो अंर्तध्यान में गए और वापस लौट कर कहा- फिर मौज बन गयी जी।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज?

बाबा जैमल सिंह जी – मौज ये है कि हुकुम आया है कि ये सारी चिंताए छोड़ दो । मालिक की दया और संगत की सेवा से कभी कोई काम पैसों के लिए नही रुकेगा । संगत की सेवा के लिए और डेरे के रख रखाव के लिए पैसों की कमी कभी रोडे नही आएगी । कभी हाथ फ़ैलाने नही पड़ेंगे , कभी कोई दान के लिए अपिल भी नही करनी पड़ेगी। बस बरकत ही बरकत होवेगी।

इस बात की भी तस्सली सुनकर महाराज सावन सिंह जी महाराज सोच में पड़ गए । तब बाबा जैमल सिंह जी ने कहा अब क्या सोच रहे हो?

महाराज सावन सिंह जी बोले – आप तो शुरू से ही डेरे की की एक छोटी कुटिया में रह चुके हो , लेकिन मैं और मेरा परिवार शायद इस छोटी कुटिया में एड्जस्ट ना कर पाये।

बाबा जैमल सिंह – अच्छा ये भी गुरु से पूछ कर बताता हूँ अंतर्ध्यान होकर वापस आये और बोले इस बार भी मौज है।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज?

बाबा जैमल सिंह जी – मौज ये है कि गुरु हुकुम आया है कि तू छोटी कुटिया में नहीं, डेरे में अच्छे से घर में रहेगा, पूरा डेरा ढेर सारे अच्छे अच्छे मकान और सुन्दर सुन्दर बागों से सुशोभित हो जायेगा । अब तो ठीक है भाई !

महाराज सावन सिंह जी – एक बात और कि मैंने सुना है कि जो अगर गुरु संगत को नाम बक्शे और कोई जीवात्मा सिमरन भजन ना कर मुक्त ना हो पाये, तो उस जीवात्मा को मुक्त करने के लिए अपनी जिम्मेवारी के खातिर गुरु को उस जीवात्मा के लिए फिर दूसरे जन्म में आना पड़ता है , लेकिन इस भव सागर में तो मैं दुबारा आना ही नही चाहता।

बाबा जैमल सिंह जी – भाई रुक ये भी पूछ के बता रहा हूँ ।अंतर्ध्यान से वापस आ कर बोले भाई फिर मौज हो गयी।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज?

बाबा जैमल सिंह जी – मौज ये है कि हुकुम आया है कि आप जिन्हें नामदान देंगे उनकी मुक्ति एक ही जन्म में होगी उन्हें फिर यहाँ आना ही नही पड़ेगा।

महाराज सावन सिंह जी – एक बात और है आप तो जानते ही हैं मिलेट्री में नौकरी के चलते मेरी बोल चाल कभी गुस्से भरी तो कभी मज़ाकिया आदत के कारण मैं तो किसी को कुछ भी बोल देता हूँ और गुरु गद्दी के बाद मेरे ऐसे शब्द किसी के लिए श्राप ना बन जाये।

बाबा जैमल सिंह जी- भाई रुक गुरु से पूछ कर बताता हूँ अंतर्ध्यान हुए और वापस लौट कर बोले-भाई मौज हो गयी।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज?

बाबा जैमल सिंह जी – मौज ये है कि हुकुम हुआ है कि आपका सिर्फ वरदान ही काम काम करेगा श्राप किसी को नही लगेगा। भाई अब तो ठीक है!

महाराज सावन सिंह जी – ईक और आखरी सवाल है जी।

बाबा जैमल सिंह जी- भाई वो भी पूछ ले ।

महाराज सावन सिंह जी – आप तो 10 से 15 दिन की रखी सुखी रोटियां पानी पी पी के खा लेते हो। लेकिन हो सकता है मैं , मेरा परिवार , और डेरे की बढ़ती संगत को ये खाना ना भावे।

बाबा जैमल सिंह जी – अच्छा ये भी गुरु से पूछ कर बताता हूँ । अंतर्ध्यान हो कर वापस आये और बोले, लो जी इस बार भी मौज हो गयी।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज ?

बाबा जैमल सिंह जी – मौज ये है भाई कि हुकुम आया है कि डेरे विच किसी भी संगत को रुखा सुखा नही खाना पड़ेगा। चाहे कितनी भी संगत किसी भी वक़्त डेरे में आये उसे खाने की कमी महसूस नही होगी । कोई भी संगत भूखी ना रहेगी । बस बरकत ही बरकत होएगी । चौबीस घण्टे अटूट लंगर चलते ही रहेंगे ।

और हम सब आज देख रहे है कि गुरु के सारी मोज़े पूरी हो रही है। किसी बात को कमी नहीं है , कमी है भी तो सिर्फ हमारी करनी में है।

ध्यान – साधना का लक्ष्यः आत्म – साक्षात्कार

उपनिषदों के अनुसार जप – तप , दान – पुण्य और धर्मग्रंथों के पठन – पाठन में परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती । उसे केवल ध्यान – साधना द्वारा अंतर्मुख होकर ही प्राप्त किया जा सकता है ।

न चक्षुधा गृहाते नापि वाचा नान्यैर्देवैः तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वः ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥

अर्थ:उसे समझा नहीं जा सकता , न नेत्रों से , न वाणी से और न ही किसी इंद्री द्वारा , न तप से और न ही पुण्य कर्मों के द्वारा । जब मन परम ज्ञान से स्थिर और निर्मल हो जाता है , तो ध्यान अभ्यास के द्वारा उस महान और अखंडनीय का साक्षात्कार होता है । मुण्डक उपनिषद् 3.1.8

ध्यान – साधना से परमात्मा का साक्षात्कार कैसे हो सकता है ? ध्यान साधना का मूल सिद्धांत है कि जैसा आप सोचते हैं , वैसे ही बन जाते हैं । शंकराचार्य का कथन है , ” यदि कोई व्यक्ति पूर्ण विश्वास और पूरी लगन से किसी वस्तु पर ध्यान केंद्रित करता है , तो वह वैसा ही बन जाता है । इस बात को भंगी और कीड़े के दृष्टांत द्वारा समझा जा सकता है । ” 10 श्रीमद्भागवतम् में इसका वर्णन इस प्रकार है : ” भृगी द्वारा पकड़ा कीड़ा निरंतर भी – भी की आवाज़ सुनता है । फलस्वरूप कीड़ा लगातार भुंगी के बारे में सोचते हुए भुंगी का रूप धारण कर लेता है । इसी प्रकार ध्यान साधना द्वारा जब साधक ध्यान को अंतर में केंद्रित करता है , तो ध्यान आत्मा को ढकनेवाले पाँच – कोशों को चीरकर अज्ञानता का नाश कर देता है और वह अंतर में ज्योतिर्मय परमात्मा के दर्शन करता है । इसके परिणामस्वरूप साधक का परम सत्य से मिलाप हो जाता है ।

तिलेषु तैले दधनीव सर्पिरापः स्रोतस्स्वरणीषु चाग्निः । एकमात्मात्मनि गृहातेऽसौ सत्येनैने तपसा योऽनुपश्यति ॥

जिस प्रकार तिलों में तेल होता है , दूध में घी , झरने में पानी तथा लकड़ी में अग्नि होती है , उसी प्रकार अंत : करण में परमात्मा का वास है । सच्चाई , आत्मसंयम और ध्यान द्वारा उसका साक्षात्कार करो । श्वेताश्वतर उपनिषद् 1.154

परमात्मा के साथ एक होने की इस अवस्था को भिन्न – भिन्न पद्धतियों में भिन्न – भिन्न नाम दिए गए हैं । वेदांत में इसे ‘ आत्म – बोध ‘ ; सांख्य और योग दर्शन में ‘ कैवल्य ” ; बौद्धधर्म में ‘ निर्वाण ” तथा ईसाई धर्म में परमात्मा के दिव्य – दर्शन कहा गया है ।

धर्मग्रंथों में परमात्मा के विषय में केवल कुछ संकेत और धारणाएँ मिल सकती हैं जबकि दर्शनशास्त्र सैद्धांतिक और प्राय : गूढ़ हैं । गहन समाधि की अवस्था में परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव ही उसके अस्तित्व , शक्ति तथा सर्वव्यापक ता के विषय में सभी संशयों को दूर कर सकता है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार संसार के सात आश्चर्यों कर बारे में दूसरे लोगों से सुनने और पर्यटन की पुस्तकों में पढ़ने के बजाय उन्हें प्रत्यक्ष देख लिया जाय।

मोक्ष के मार्ग ( वैदिक परम्परा के अनुसार) में से लिए गए अंश…..

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