
1. गुरु और गोविन्द एक ही हैं
सच्चे सन्त परमात्मा में मिलकर परमात्मा रूप हो चुके होते हैं । अत : परमात्मा की प्राप्ति सन्तों द्वारा ही हो सकती है और सन्त परमात्मा की कृपा से ही मिलते हैं । स्वयं भगवान् का यह कहना है कि जिस तरह दूध में मिलकर पानी और जल में मिलकर नमक एकाकार हो जाते हैं , उसी तरह भगवान् के प्रेम में डूबा हुआ सच्चा भक्त भगवान् बन जाता है ।
अनन्त सुख – सागर के निवासी , नाम के रंग में सराबोर , हंस – स्वरूप महात्मा दयावश केवल परोपकार के लिये इस संसार में आते हैं :
जहाँ राम तहँ संत जन , जहँ साधू तहँ राम ।दादू दून्यूँ एकठे , अरस परस बिसराम ॥
2. गुरु – भक्ति से ही परमात्मा की प्राप्ति
सच्चे सन्त परमात्मा में मिलकर परमात्मा रूप हो चुके होते हैं , इसलिये परमात्मा की प्राप्ति सन्तों द्वारा ही हो सकती है और सन्त परमात्मा की कृपा से ही मिलते हैं । अपनी सम्पूर्ण भक्ति और सम्पूर्ण प्रेम एकमात्र अपने सच्चे सतगुरु को ही अर्पण करना चाहिये । सतगुरु द्वारा नाम की बख्शिश प्राप्त कर और उनके पवित्र चरण – कमलों में अपना शीश झुकाकर मनुष्य संसार – सागर को पार कर जाता है , वापस जाकर परमात्मा में मिल जाता है और चरम सुख का आनन्द उठाता है :
( दादू ) निराकार मन सुरति सौं , प्रेम प्रीति सौं सेव । जे पूजै आकार कौं , तौ साधू परतषि देव ॥ “
3. देहधारी पूरे गुरु की आवश्यकता
एकमात्र देहधारी गुरु ही हमें शब्द – धुन से जुड़ने की युक्ति समझाते हैं जिसकी साधना द्वारा हमारे सभी विकार धीरे धीरे साफ़ हो जाते हैं , काल की सभी रुकावटें दूर हो जाती हैं , हमारी आन्तरिक आँख और कान खुल जाते हैं , हमें सुरक्षित रूप से भवसागर को पार करके , परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं ।
परमेश्वर के महल के द्वार की कुंजी सतगुरु के पास होती है । इसलिये सतगुरु की सहायता के बिना कोई भी उस महल में प्रवेश नहीं पा सकता । उनकी कृपा और रहनुमाई के बगैर अज्ञान के अन्धकार को दूर करना , आन्तरिक मार्ग के खतरों पर विजय प्राप्त करना , रूहानी अमृत का पान करना और सुरक्षित रूप से निज घर पहुँच जाना असम्भव है । मालिक के सच्चे दरबार में निगुरा नहीं पहुँच सकता , गुरु की छत्र – छाया के बिना उसे रोक दिया जाता है , पर सगुरा उस दरबार में सच्ची शोभा पाता है :
दादू देव दयाल की , गुरू दिखाई बाट । ताला कूँची लाइ करि , खोले सबै कपाट ॥
( दादू ) सतगुर अंजन बाहि करि , नैन पटल सब खोले । बहरे कानौं सुणने लागे , गूंगे मुख सूं बोले ॥
साचा सतगुर जे मिलै , सब साज सँवारै । दादू नाव चढ़ाइ करि , ले पार उतारै ।।
4. पूर्ण सन्त – सतगुरु का मार्ग
सच्चा गुरु शब्द – मार्गी होता है और शब्द – मार्ग की ही दीक्षा देता है । सच्चे शब्द से ही सच्ची भक्ति प्रकट होती है । इसलिये इस मार्ग को सच्चा भक्ति मार्ग भी कहा जाता है ।
शब्द परमात्मा का रूप है और यह प्रत्येक मनुष्य के अन्दर दिन – रात धुनकारें दे रहा है । पर जब तक कोई शब्द – भेदी पूरा गुरु शिष्य की सुरत अर्थात् आत्मा को इस शब्द से नहीं जोड़ता , तब तक न तो शब्द – धुन को सुना ही जा सकता है , न ही इस अमृत का पान किया जा सकता है । युग – युग से सोये हुए जीव को जगाने , मन के विकारों और भागदौड़ को दूर कर इसे पूर्ण एकाग्र बनाने और आत्मा को परमात्मा की अगाध भक्ति में लवलीन कर उसका साक्षात्कार कराने का , पूरे गुरु द्वारा बताये हुए शब्द – साधन के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है :
साचा सहजै ले मिलै , सबद गुरू का ज्ञान । दादू हम कूँ ले चल्या , जहँ प्रीतम ( का ) अस्थान ॥
संत दादू दयाल जी की पुस्तक से लिया गया है

