जीवित गुरु की आवश्यकता

1. गुरु और गोविन्द एक ही हैं
सच्चे सन्त परमात्मा में मिलकर परमात्मा रूप हो चुके होते हैं । अत : परमात्मा की प्राप्ति सन्तों द्वारा ही हो सकती है और सन्त परमात्मा की कृपा से ही मिलते हैं । स्वयं भगवान् का यह कहना है कि जिस तरह दूध में मिलकर पानी और जल में मिलकर नमक एकाकार हो जाते हैं , उसी तरह भगवान् के प्रेम में डूबा हुआ सच्चा भक्त भगवान् बन जाता है ।

अनन्त सुख – सागर के निवासी , नाम के रंग में सराबोर , हंस – स्वरूप महात्मा दयावश केवल परोपकार के लिये इस संसार में आते हैं :

जहाँ राम तहँ संत जन , जहँ साधू तहँ राम ।दादू दून्यूँ एकठे , अरस परस बिसराम ॥

2. गुरु – भक्ति से ही परमात्मा की प्राप्ति

सच्चे सन्त परमात्मा में मिलकर परमात्मा रूप हो चुके होते हैं , इसलिये परमात्मा की प्राप्ति सन्तों द्वारा ही हो सकती है और सन्त परमात्मा की कृपा से ही मिलते हैं । अपनी सम्पूर्ण भक्ति और सम्पूर्ण प्रेम एकमात्र अपने सच्चे सतगुरु को ही अर्पण करना चाहिये । सतगुरु द्वारा नाम की बख्शिश प्राप्त कर और उनके पवित्र चरण – कमलों में अपना शीश झुकाकर मनुष्य संसार – सागर को पार कर जाता है , वापस जाकर परमात्मा में मिल जाता है और चरम सुख का आनन्द उठाता है :

( दादू ) निराकार मन सुरति सौं , प्रेम प्रीति सौं सेव । जे पूजै आकार कौं , तौ साधू परतषि देव ॥ “

3. देहधारी पूरे गुरु की आवश्यकता

एकमात्र देहधारी गुरु ही हमें शब्द – धुन से जुड़ने की युक्ति समझाते हैं जिसकी साधना द्वारा हमारे सभी विकार धीरे धीरे साफ़ हो जाते हैं , काल की सभी रुकावटें दूर हो जाती हैं , हमारी आन्तरिक आँख और कान खुल जाते हैं , हमें सुरक्षित रूप से भवसागर को पार करके , परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं ।

परमेश्वर के महल के द्वार की कुंजी सतगुरु के पास होती है । इसलिये सतगुरु की सहायता के बिना कोई भी उस महल में प्रवेश नहीं पा सकता । उनकी कृपा और रहनुमाई के बगैर अज्ञान के अन्धकार को दूर करना , आन्तरिक मार्ग के खतरों पर विजय प्राप्त करना , रूहानी अमृत का पान करना और सुरक्षित रूप से निज घर पहुँच जाना असम्भव है । मालिक के सच्चे दरबार में निगुरा नहीं पहुँच सकता , गुरु की छत्र – छाया के बिना उसे रोक दिया जाता है , पर सगुरा उस दरबार में सच्ची शोभा पाता है :

दादू देव दयाल की , गुरू दिखाई बाट । ताला कूँची लाइ करि , खोले सबै कपाट ॥

( दादू ) सतगुर अंजन बाहि करि , नैन पटल सब खोले । बहरे कानौं सुणने लागे , गूंगे मुख सूं बोले ॥

साचा सतगुर जे मिलै , सब साज सँवारै । दादू नाव चढ़ाइ करि , ले पार उतारै ।।

4. पूर्ण सन्त – सतगुरु का मार्ग

सच्चा गुरु शब्द – मार्गी होता है और शब्द – मार्ग की ही दीक्षा देता है । सच्चे शब्द से ही सच्ची भक्ति प्रकट होती है । इसलिये इस मार्ग को सच्चा भक्ति मार्ग भी कहा जाता है ।

शब्द परमात्मा का रूप है और यह प्रत्येक मनुष्य के अन्दर दिन – रात धुनकारें दे रहा है । पर जब तक कोई शब्द – भेदी पूरा गुरु शिष्य की सुरत अर्थात् आत्मा को इस शब्द से नहीं जोड़ता , तब तक न तो शब्द – धुन को सुना ही जा सकता है , न ही इस अमृत का पान किया जा सकता है । युग – युग से सोये हुए जीव को जगाने , मन के विकारों और भागदौड़ को दूर कर इसे पूर्ण एकाग्र बनाने और आत्मा को परमात्मा की अगाध भक्ति में लवलीन कर उसका साक्षात्कार कराने का , पूरे गुरु द्वारा बताये हुए शब्द – साधन के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है :

साचा सहजै ले मिलै , सबद गुरू का ज्ञान । दादू हम कूँ ले चल्या , जहँ प्रीतम ( का ) अस्थान ॥

संत दादू दयाल जी की पुस्तक से लिया गया है

मानव जीवन का उद्देश्य

परमात्मा की प्राप्ति (संत दादू दयाल जी …….)

परमात्मा की प्राप्ति मनुष्य – जन्म में ही सम्भव है । मानव शरीर धारण करके ही हम परमात्मा के सच्चे नाम की नौका पर चढ़कर इस विशाल भवसागर को पार कर सकते हैं ।

मानव शरीर को परमात्मा का मन्दिर , नर – नारायणी देह या मुक्ति का दरवाज़ा कहा गया है । यह विरला सौभाग्य और अमूल्य अवसर बार – बार नहीं मिलता । अतः जो मानव जीवन विषय – वासना और संसार के नश्वर पदार्थों की प्राप्ति में व्यतीत हुआ , वह व्यर्थ ही चला गया । वही जीवन सार्थक है जो परमात्मा के प्रेम और भक्ति में लगा ।

परमात्मा के प्रेमी अमूल्य रूहानी हीरे संचय करते हैं और परमात्मा के मिलन – सुख का शाश्वत आनन्द उठाते हैं । किन्तु अनाड़ीजन तुच्छ विषय – वासना का कूड़ा बटोरने में अपना बहुमूल्य समय गंवाते हैं और अन्त में सिर धुन – धुनकर पछताते हैं ।

बार बार यह तन नहीं , नर नारायण देह । दादू बहुरि न पाइये , जनम अमोलिक येह ।।

दुख दरिया संसार है , सुख का सागर राम । सुख सागर चलि जाइये , दादू तजि बेकाम । ‘

( दादू ) दरिया यहु संसार है , राम नाम निज नाब । दादू ढील न कीजिये , यह अवसर यहु डाव ।।

शूरवीर (मदन साहिब रचित ग्रंथ से)

विद्यार्थी से आशा की जाती है कि स्कूल की वर्दी को लज्जित न करे । वह कोई ऐसा काम न करे जिससे स्कूल की बदनामी हो । सैनिक से आशा की जाती है कि युद्ध के मैदान में पीठ न दिखाए ताकि उसके देश की सेना का नाम बदनाम न हो । इसी प्रकार शिष्य , साधु या गुरु का भेष धारण करनेवाले से आशा की जाती है कि अपने गुरु और संप्रदाय का नाम बदनाम न करे , बल्कि ऐसी रहनी और करनी पर चले जिससे केवल उसका ही नहीं बल्कि उसके गुरु और उसके संप्रदाय का नाम भी रोशन हो ।

कबीर साहिब की वाणी है : गगन दमामा बाजिओ परिओ नीसानै घाउ ॥ खेत जो मांडिओ सूरमा अब जूझन को दाउ । सूरा सो पहिचानीऐ जो लरै दीन के हेत । पुरजा पुरजा कट मरै कबहू न छाडै खेत ॥

आप कहते हैं कि दसवें द्वार में शब्द का नगाड़ा बजता है सौ सच्चे साधक के हृदय पर चोट लगती है , वह ध्वनि उसे अपनी और बलपूर्वक खींचती है । उसे चाहिए कि उस ध्वनि की प्राप्ति के लिए तन मन से अभ्यास में जुट जाए । सच्चा सूरमा वही है जो परमात्मा के साथ मिलाप के धर्म की पूर्ति के लिए शब्द में सुरत लीन करने के लिए पूरा संघर्ष करता है । वह टुकड़े – टुकड़े हो जाता है यानी हर प्रकार की कुर्बानी देता है परंतु सुरत शब्द के अभ्यास के मैदाने- जंग में डटा रहता है ।

संत महात्माओं ने तीरों – तलवारों वाली शूरवीरता की ओर नहीं , बल्कि मन- इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने , माया को पैरों तले रौंदकर आत्मा को शब्द में अभेद करके शब्द का रूप हो जाने की शूरवीरता की ओर संकेत किया है । इसी में भेष की शोभा है और इसी में ज्ञान की बड़ाई है ।

चाल न जाने ज्ञान की , किये होय जो भेख । जग में भोजन मिलत है , अन्तकाल मुख रेष ॥१ ॥ भेष बना है चिन्ह को , भीख मिलै फिर भेख । निरंतर ज्ञान जहाँ नहीं , फिर चौरासी देख ।।

आप चेतावनी देते हैं कि जो लोग शिष्य या साधु का भेष धारण कर लेते हैं पर सतगुरु के उपदेशानुसार शब्द की कमाई नहीं करते तथा भाँति – भाँति के भोजन द्वारा लोगों से निजी सेवा करवाते हैं , अंत समय उनके मुँह में धूल पड़ती है । भेष का उद्देश्य सत्य की पहचान करना है जो शिष्य या साधु का पहनावा धारण करता है , उसे चाहिए कि अंतर में सत्य के दर्शन करने का यत्न करे । जो व्यक्ति भेष को अंतर्मुख ज्ञान और सत्य के निजी अनुभव का साधन नहीं बनाता , वह मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता और पुन : चौरासी के चक्कर में पड़कर अपमान करवाता है

ब्रह्मज्ञान चीन्हें नहीं , पढ़ि सुनि करै उपाधि । मोह कर्क छूटी नहीं , आशा धरै असाधि ॥11 ॥

अपनी मृत्यु…अपनो की मृत्यु डरावनी लगती है

अपनी मृत्यु…अपनो की मृत्यु डरावनी लगती है बाकी तो मौत का उत्सव मनाता है मनुष्य…

मौत के स्वाद का
चटखारे लेता मनुष्य
थोड़ा कड़वा लिखा है पर मन का लिखा है……

मौत से प्यार नहीं , मौत तो हमारा स्वाद है ।

बकरे का, पाए का, तीतर का, मुर्गे का, हलाल का, बिना हलाल का, ताजा बच्चे का, भुना हुआ,छोटी मछली, बड़ी मछली, हल्की आंच पर सिक हुआ । न जाने कितने बल्कि अनगिनत स्वाद हैं मौत के ।
क्योंकि मौत किसी और की, ओर स्वाद हमारा ।

स्वाद से कारोबार बन गई मौत ।
मुर्गी पालन, मछली पालन, बकरी पालन, पोल्ट्री फार्म्स ।
नाम “पालन” और मक़सद “हत्या” । स्लाटर हाउस तक खोल दिये । वो भी ऑफिशियल । गली गली में खुले नान वेज रेस्टॉरेंट मौत का कारोबार नहीं तो और क्या हैं ? मौत से प्यार और उसका कारोबार इसलिए क्योंकि मौत हमारी नही है।

जो हमारी तरह बोल नही सकते, अभिव्यक्त नही कर सकते, अपनी सुरक्षा स्वयं करने में समर्थ नहीं हैं,
उनकी असहायता को हमने अपना बल कैसे मान लिया ?
कैसे मान लिया कि उनमें भावनाएं नहीं होतीं ?
या उनकी आहें नहीं निकलतीं ?

डाइनिंग टेबल पर हड्डियां नोचते बाप बच्चों को सीख देते है, बेटा कभी किसी का दिल नही दुखाना ! किसी की आहें मत लेना ! किसी की आंख में तुम्हारी वजह से आंसू नहीं आना चाहिए !

बच्चों में झुठे संस्कार डालते बाप को, अपने हाथ मे वो हडडी दिखाई नही देती, जो इससे पहले एक शरीर थी , जिसके अंदर इससे पहले एक आत्मा थी, उसकी भी एक मां थी …??
जिसे काटा गया होगा ?
जो कराहा होगा ?
जो तड़पा होगा ? जिसकी आहें निकली होंगी ?
जिसने बद्दुआ भी दी होगी ?

कैसे मान लिया कि जब जब धरती पर अत्याचार बढ़ेंगे तो
भगवान सिर्फ तुम इंसानों की रक्षा के लिए अवतार लेंगे ?

क्या मूक जानवर उस परमपिता परमेश्वर की संतान नहीं हैं ?
क्या उस इश्वर को उनकी रक्षा की चिंता नहीं है ?

आज कोरोना वायरस उन जानवरों के लिए, ईश्वर के अवतार से कम नहीं है ।

जब से इस वायरस का कहर बरपा है, जानवर स्वच्छंद घूम रहे है ।
पक्षी चहचहा रहे हैं ।
उन्हें पहली बार इस धरती पर अपना भी कुछ अधिकार सा नज़र आया है । पेड़ पौधे ऐसे लहलहा रहे हैं, जैसे उन्हें नई जिंदगी मिली हो । धरती को भी जैसे सांस लेना आसान हो गया हो ।

सृष्टि के निर्माता द्वारा रचित करोङो करोड़ योनियों में से एक कोरोना ने हमें हमारी ओकात बता दी । घर में घुस के मारा है और मार रहा है । ओर उसका हम सब कुछ नही बिगाड़ सकते । अब घंटियां बजा रहे हो, इबादत कर रहे हो, प्रेयर कर रहे हो और भीख मांग रहे हो उससे की हमें बचा ले ।

धर्म की आड़ में उस परमपिता के नाम पर अपने स्वाद के लिए कभी ईद पर बकरे काटते हो, कभी दुर्गा मां या भैरव बाबा के सामने बकरे की बली चढ़ाते हो ।
कहीं तुम अपने स्वाद के लिए मछली का भोग लगाते हो ।

कभी सोचा…..!!!
क्या ईश्वर का स्वाद होता है ? ….क्या है उनका भोजन ?

किसे ठग रहे हो ? भगवान को ? अल्लाह को ? जीसस को?
या खुद को ?

मंगलवार को नानवेज नही खाता …!!!
आज शनिवार है इसलिए नहीं…!!!
अभी रोज़े चल रहे हैं ….!!!
नवरात्रि में तो सवाल ही नही उठता….!!!

झूठ पर झूठ….
….झूठ पर झूठ
….झूठ पर झूठ…!!

फिर कुतर्क सुनो…..फल सब्जीयों में भी तो जान होती है …?
…..तो सुनो फल सब्जियाँ संसर्ग नहीं करतीं , ना ही वो किसी प्राण को जन्मती हैं ।
इसी लिए उनका भोजन उचित है ।

ईश्वर ने बुद्धि सिर्फ तुम्हे दी । ताकि तमाम योनियों में भटकने के बाद मानव योनि में तुम जन्म मृत्यु के चक्र से निकलने का रास्ता ढूँढ सको । लेकिन तुमने इस मानव योनि को पाते ही स्वयं को भगवान समझ लिया ।

आज कोरोना के रूप में मौत हमारे सामने खड़ी है ।

तुम्ही कहते थे, की हम जो प्रकति को देंगे, वही प्रकृति हमे लौटायेगी । मौते दीं हैं प्रकृति को तो मौतें ही लौट रही हैं ।

बढो…!!!
आलिंगन करो मौत का….!!!

यह संकेत है ईश्क़र का ।
प्रकृति के साथ रहो।
प्रकृति के होकर रहो ।
वर्ना….. ईश्वर अपनी ही बनाई कई योनियो को धरती से हमेशा के लिए विलुप्त कर चुके हैं । उन्हें एक क्षण भी नही लगेगा ।

प्रकृति की ओर चलो

परमात्मा के नजदीक कोन?

कष्ट , पीड़ा , दुःख और रोग हमारी खूब सफ़ाई करते हैं । वे हमें बेहतर इनसान बनाते हैं और परमात्मा के नज़दीक ले आते हैं । भगवान कृष्ण ( भागवत में ) उद्धव से कहते हैं , ‘ मैं अपने सबसे प्यारे भक्तों को तीन दुर्लभ उपहार या सौगातें देता हूँ । वे हैं -1 . ग़रीबी , 2. बीमारी और 3. निरादर । ‘ ईसा मसीह ने सच ही कहा है कि किसी अमीर आदमी के परमात्मा के देश में प्रवेश पाने से ऊँट का सूई के नाके ( छेद ) में से निकल जाना कहीं आसान है । भगवान कृष्ण ने शरीर के प्यार , शेख़ी , घमंड और सांसारिक पदार्थों के मोह को परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग में रोड़े बतलाया है ।

सोच का फर्क (Motivational story):

🌻सोच का फर्क (Motivational story):

एक गरीब आदमी बड़ी मेहनत से एक – एक रूपया जोड़ कर मकान बनवाता है . उस मकान को बनवाने के लिए वह पिछले 20 वर्षों से एक – एक पैसा बचत करता है ताकि उसका परिवार छोटे से झोपड़े से निकलकर पक्के मकान में सुखी रह सके .
आखिरकार एक दिन मकान बन कर तैयार हो जाता है . तत्पश्चात पंडित से पूछ कर गृह प्रवेश के लिए शुभ तिथि निश्चित की जाती है .
लेकिन गृहप्रवेश के 2 दिन पहले ही भूकंप आता है और उसका मकान पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है .
यह खबर जब उस आदमी को पता चलती है तो वह दौड़ा दौड़ा बाजार जाता है और मिठाई खरीद कर ले आता है . मिठाई लेकर वह घटनास्थल पर पहुंचता है
जहां पर काफी लोग इकट्ठे होकर उसके के मकान गिरने पर अफसोस जाहिर कर रहे थे .
ओह बेचारे के साथ बहुत बुरा हुआ , कितनी मुश्किल से एक – एक पैसा जोड़कर मकान बनवाया था .
इसी प्रकार लोग आपस में तरह तरह की बातें कर रहे थे .
वह आदमी वहां पहुंचता है और झोले से मिठाई निकाल कर सबको बांटने लगता है . यह देखकर सभी लोग हैरान हो जाते हैं .
तभी उसका एक मित्र उससे कहता है , कहीं तुम पागल तो नहीं हो गए हो , घर गिर गया , तुम्हारी जीवन भर की कमाई बर्बाद हो गई और तुम खुश होकर मिठाई बांट रहे हो .

वह आदमी मुस्कुराते हुए कहता है , तुम इस घटना का सिर्फ नकारात्मक side देख रहे हो इसलिए इसका सकारात्मक पक्ष तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा है . ये तो बहुत अच्छा हुआ कि मकान आज ही गिर गया .
वरना तुम्ही सोचो अगर यह मकान 2 दिनों के बाद गिरता तो मैं मेरी पत्नी और बच्चे सभी मारे जा सकत थे . तब कितना बड़ा नुकसान होता .
सत्संग प्रेमियों इस कहानी से आपको समझ में आ गया होगा सकारात्मक और नकारात्मक सोच में क्या अंतर है . यदि वह व्यक्ति नकारात्मक दृष्टिकोण से सोचता तो शायद वह Depression का शिकार हो जाता . लेकिन केवल एक सोच के फर्क ने उसके दुख को परिवर्तित दिया .ईश्वर जो भी करता है,अच्छा ही करता है।
मानव तू परिवर्तन से काहे को डरता है।।

शर्त

महान लेखक टालस्टाय की एक कहानी है – “शर्त “

इस कहानी में दो मित्रो में आपस मे शर्त लगती है कि, यदि उसने 1 माह एकांत में बिना किसी से मिले,बातचीत किये एक कमरे में बिता देता है, तो उसे 10 लाख नकद वो देगा । इस बीच, यदि वो शर्त पूरी नहीं करता, तो वो हार जाएगा ।
पहला मित्र ये शर्त स्वीकार कर लेता है । उसे दूर एक खाली मकान में बंद करके रख दिया जाता है । बस दो जून का भोजन और कुछ किताबें उसे दी गई ।

उसने जब वहां अकेले रहना शुरू किया तो 1 दिन 2 दिन किताबो से मन बहल गया फिर वो खीझने लगा । उसे बताया गया था कि थोड़ा भी बर्दाश्त से बाहर हो तो वो घण्टी बजा के संकेत दे सकता है और उसे वहां से निकाल लिया जाएगा ।
जैसे जैसे दिन बीतने लगे उसे एक एक घण्टे युगों से लगने लगे । वो चीखता, चिल्लाता लेकिन शर्त का खयाल कर बाहर किसी को नही बुलाता । वोअपने बाल नोचता, रोता, गालियां देता तड़फ जाता,मतलब अकेलेपन की पीड़ा उसे भयानक लगने लगी पर वो शर्त की याद कर अपने को रोक लेता ।

कुछ दिन और बीते तो धीरे धीरे उसके भीतर एक अजीब शांति घटित होने लगी।अब उसे किसी की आवश्यकता का अनुभव नही होने लगा। वो बस मौन बैठा रहता। एकदम शांत उसका चीखना चिल्लाना बंद हो गया।

इधर, उसके दोस्त को चिंता होने लगी कि एक माह के दिन पर दिन बीत रहे हैं पर उसका दोस्त है कि बाहर ही नही आ रहा है ।
माह के अब अंतिम 2 दिन शेष थे,इधर उस दोस्त का व्यापार चौपट हो गया वो दिवालिया हो गया।उसे अब चिंता होने लगी कि यदि उसके मित्र ने शर्त जीत ली तो इतने पैसे वो उसे कहाँ से देगा ।
वो उसे गोली मारने की योजना बनाता है और उसे मारने के लिये जाता है ।

जब वो वहां पहुँचता है तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नही रहता ।
वो दोस्त शर्त के एक माह के ठीक एक दिन पहले वहां से चला जाता है और एक खत अपने दोस्त के नाम छोड़ जाता है ।
खत में लिखा होता है-
प्यारे दोस्त इन एक महीनों में मैंने वो चीज पा ली है जिसका कोई मोल नही चुका सकता । मैंने अकेले मे रहकर असीम शांति का सुख पा लिया है और मैं ये भी जान चुका हूं कि जितनी जरूरतें हमारी कम होती जाती हैं उतना हमें असीम आनंद और शांति मिलती है मैंने इन दिनों परमात्मा के असीम प्यार को जान लिया है । इसीलिए मैं अपनी ओर से यह शर्त तोड़ रहा हूँ अब मुझे तुम्हारे शर्त के पैसे की कोई जरूरत नही। इस उद्धरण से समझें कि लॉकडाउन के इस परीक्षा की घड़ी में खुद को झुंझलाहट,चिंता और भय में न डालें,उस परमात्मा की निकटता को महसूस करें और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयत्न कीजिये,

इसमे भी कोई अच्छाई होगी यह मानकर सब कुछ भगवान को समर्पण कर दें।
विश्वास मानिए अच्छा ही होगा ।

प्रकृति का न्याय

प्रकृति का न्याय

कच्छ भूकंप के दौरान की एक घटना…
पुलिस राहत कार्य कर रही थी। मलबे को घर से निकालने के लिए,जीवित बचे लोगों ओर मृतकों को बाहर निकाल रही थी।
एक बूढ़ा आदमी एक सुंदर घर के मलबे के बाहर बैठा था। मकान ढह गया। पुलिस आई, उस के पुत्रवधू का शव मलबे से निकला ..शरीर पर हर जगह गहने थे .. पुलिस ने कहा “ये गहने रख लो, आप को काम आयेंगें !
फटी आँखों वाले उस आदमी ने कहा .. ले लो .. सब कुछ … जो करना है करो .. लेकिन, मुझे यह गहने नहीं चाहिए ..पुलिस ने लाख समझाने की कोशिश की।
उस बुड्ढे ने फिर कहा, जब मोरबी का डैम टूटा था, तब मैंने ये सारे गहने मृत्य लोगो के गले से लूट के अपने घर ला कर अपने पुत्र वधु को पहनाए थे।

आज मेरी बहू ने वो ही गहने पहने हुये है जो में लूट के लाया था, “मुझे कुछ नहीं चाहिए, सर!” वह रोया। आप लै लिजिये……..!

कच्छ की इस कहानी को ध्यान में रखें, और कोरोना के इस संकट के समय में मनुष्य की मजबूरी का लाभ ना उठाएं ये कहानी उन सभी रक्त पिपासु लोगों के लिए है जो महंगे इंजेक्शन , बेड ओर ऑक्सिजन की कालाबाज़ारी कर छल से करोड़पति बनना चाहते हैं .. –

ये है प्रकृति का न्याय ..छल कपट और लालच में किए गए गलत कामो का परिणाम देर से सही, मिलता अवश्य है…

डर का असर

बहुत पुरानी बात है, एक नगर मे महामारी आने वाली थी
उसने नगर के राजा से कहा मैं आ रही हूँ, और 500 लोगो की जान लुंगी। राजा ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया, हर तरफ महामारी का ज़ोर और दहशत एवं डर का माहौल हो गया।
जब महामारी जाने लगी राजा ने कहा कि तुमने तो 500 लोगो की जान लेने को कहा था, पर यह क्या किया, यहां तो 5500 से भी ज्यादा जानें चली गई। तो महामारी ने कहा कि मैने तो 500 ही जाने ली है, पर जो आपने डर और दहशत का माहौल बनाया, 5 हजार जाने तो उस डर और दहशत ने ली हैं।
यह वक्त भी गुजर जायेगा सयंम रखे सावधानी रखें।
अखबार पड़ना कम करे, TV न्यूज़ गलती से भी ना देखें और अपना व अपने आस पास का माहौल खुश नुमा रखे
सावधानी रखें बस लापरवाही न करें और अपना ख्याल पूरा रखें और बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दें। जो होना है, वो होकर ही रहेगा। खुश रहें और सारे डर मन से निकाल दें।
आधा बीमार तो इंसान मानसिक रूप से बीमारी को स्वीकार कर लेने से ही होता है। और कोरोना के आंकड़े देखना और फॉरवर्ड करने का काम तो बिल्कुल न करें, जितना पॉजिटिव दिमाग और मन रहेगा उतना स्वस्थ शरीर रहेगा।
कृपया यह बातअपने सभी मिलने वालो से कहे ताकि दिमाग पॉजिटिव एवं मन स्वास्थ्य रहे।

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