अधिकतर घरों में बच्चे यह दो प्रश्न अवश्य पूछते हैं

अधिकतर घरों में बच्चे यह दो प्रश्न अवश्य पूछते हैं जब दीपावली भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास से अयोध्या लौटने की खुशी में मनाई जाती है तो दीपावली पर लक्ष्मी पूजन क्यों होता है? राम और सीता की पूजा क्यों नही?
दूसरा यह कि दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा क्यों होती है, विष्णु भगवान. की क्यों नहीं?

इन प्रश्नों का उत्तर अधिकांशतः बच्चों को नहीं मिल पाता और जो मिलता है उससे बच्चे संतुष्ट नहीं हो पाते।आज की शब्दावली के अनुसार कुछ ‘लिबरर्ल्स लोग’ युवाओं और बच्चों के मस्तिष्क में यह प्रश्न डाल रहें हैं कि लक्ष्मी पूजन का औचित्य क्या है, जबकि दीपावली का उत्सव राम से जुड़ा हुआ है। कुल मिलाकर वह बच्चों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं कि सनातन धर्म और सनातन त्यौहारों का आपस में कोई तारतम्य नहीं है।सनातन धर्म बेकार है।आप अपने बच्चों को इन प्रश्नों के सही उत्तर बतायें।

दीपावली का उत्सव दो युग, सतयुग और त्रेता युग से जुड़ा हुआ है। सतयुग में समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी उस दिन प्रगट हुई थी इसलिए लक्ष्मीजी का पूजन होता है। भगवान राम भी त्रेता युग में इसी दिन अयोध्या लौटे थे तो अयोध्या वासियों ने घर घर दीपमाला जलाकर उनका स्वागत किया था इसलिए इसका नाम दीपावली है।अत: इस पर्व के दो नाम है लक्ष्मी पूजन जो सतयुग से जुड़ा है दूजा दीपावली जो त्रेता युग प्रभु राम और दीपों से जुड़ा है।

लक्ष्मी गणेश का आपस में क्या रिश्ता है
और दीवाली पर इन दोनों की पूजा क्यों होती है?

लक्ष्मी जी सागरमन्थन में मिलीं, भगवान विष्णु ने उनसे विवाह किया और उन्हें सृष्टि की धन और ऐश्वर्य की देवी बनाया गया। लक्ष्मी जी ने धन बाँटने के लिए कुबेर को अपने साथ रखा। कुबेर बड़े ही कंजूस थे, वे धन बाँटते ही नहीं थे।वे खुद धन के भंडारी बन कर बैठ गए। माता लक्ष्मी खिन्न हो गईं, उनकी सन्तानों को कृपा नहीं मिल रही थी। उन्होंने अपनी व्यथा भगवान विष्णु को बताई। भगवान विष्णु ने कहा कि तुम कुबेर के स्थान पर किसी अन्य को धन बाँटने का काम सौंप दो। माँ लक्ष्मी बोली कि यक्षों के राजा कुबेर मेरे परम भक्त हैं उन्हें बुरा लगेगा।
तब भगवान विष्णु ने उन्हें गणेश जी की विशाल बुद्धि को प्रयोग करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने गणेश जी को भी कुबेर के साथ बैठा दिया। गणेश जी ठहरे महाबुद्धिमान। वे बोले, माँ, मैं जिसका भी नाम बताऊँगा , उस पर आप कृपा कर देना, कोई किंतु परन्तु नहीं। माँ लक्ष्मी ने हाँ कर दी।अब गणेश जी लोगों के सौभाग्य के विघ्न, रुकावट को दूर कर उनके लिए धनागमन के द्वार खोलने लगे।कुबेर भंडारी देखते रह गए, गणेश जी कुबेर के भंडार का द्वार खोलने वाले बन गए। गणेश जी की भक्तों के प्रति ममता कृपा देख माँ लक्ष्मी ने अपने मानस पुत्र श्रीगणेश को आशीर्वाद दिया कि जहाँ वे अपने पति नारायण के सँग ना हों, वहाँ उनका पुत्रवत गणेश उनके साथ रहें।

दीवाली आती है कार्तिक अमावस्या को, भगवान विष्णु उस समय योगनिद्रा में होते हैं, वे जागते हैं ग्यारह दिन बाद देव उठनी एकादशी को। माँ लक्ष्मी को पृथ्वी भ्रमण करने आना होता है शरद पूर्णिमा से दीवाली के बीच के पन्द्रह दिनों में।इसलिए वे अपने सँग ले आती हैं अपने मानस पुत्र गणेश जी को।
इसलिए दीवाली को लक्ष्मी गणेश की पूजा होती है।

यह कैसी विडंबना है कि देश और हिंदुओ के सबसे बड़े त्यौहार का पाठ्यक्रम में कोई विस्तृत वर्णन नही है और जो वर्णन है वह अधूरा है।इस लेख को पढ़ कर स्वयं भी लाभान्वित हों और अपनी अगली पीढ़ी को भी बतायें। दूसरों के साथ साझा करना भी ना भूलेंI

नाम की महिमा

आप तरै जन पितरा तारे
संगत मुकत सो पार उतारे।

आप देखो, गुरु साहिब “नाम” की कितनी महिमा करते हैं। कहते हैं कि जो “नाम” की कमाई करते हैं, वे आप भी तर जाते हैं और उनके ‘पित्तरों’ को भी उनके अभ्यास से लाभ पहुँचता है। उच्च श्रेणी के भक्त के अभ्यास और भक्ति से उसके परिवार के लोग, सम्बंधी और मित्र भी लाभ उठाते हैं। जो ‘थोड़ी बहुत’ “नाम” की कमाई करते हैं उनके भी निकट संबंधियों को लाभ पहुँचता है। सो “नाम” तो “नाम” ही है। गुरु साहिब कहते हैँ कि “सन्त” आप भी तर जाते हैं, अपने “कुल” को तार लेते हैं और अपनी “संगत” को भी तार लेते हैं

भरोसा

एक व्यक्ति की नई नई शादी हुई और वो अपनी पत्नी के साथ घूम कर वापिस अपने घर आ रहे थे। रास्ते में जब दोनों को एक नदी को नाव से पार कर रहे थे, तभी अचानक एक भयंकर तूफ़ान आ गया। वो आदमी वीर था लेकिन औरत बहुत डरी हुई थी क्योंकि हालात बहुत खराब थे। नाव बहुत छोटी थी और तूफ़ान बहुत भयंकर था और दोनों किसी भी समय नदी में डूब सकते थे। लेकिन वो आदमी चुपचाप निश्चल और शान्त बैठा था जैसे कि कुछ नहीं होने वाला औरत डर के मारे कांप रही थी और वो बोली:- “क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा, ये हमारे जीवन का आखिरी क्षण भी हो सकता है। ऐसा नहीं लगता कि हम नदी के दूसरे किनारे पर पहुंच भी पायेंगे या नहीं ? अब तो कोई चमत्कार ही हमें बचा सकता है वर्ना हमारी मौत निश्चित है। क्या तुम्हें बिल्कुल डर नहीं लग रहा ? कहीं तुम पागल या पत्थर के तो नहीं बने हो ?”

वो आदमी खूब हँसा और एकाएक उसने म्यान से तलवार निकाल ली? औरत अब और परेशान हो गई कि यह कर क्या रहा है? तब वो उस नंगी तलवार को औरत की गर्दन के पास ले आया, इतना पास कि उसकी गर्दन और तलवार के बीच बिल्कुल मामूली फर्क रह गया था क्योंकि तलवार लगभग उसकी गर्दन को छू रही थी। वो अपनी पत्नी से बोला:- “क्या तुम्हें डर लग रहा है”?

अब पत्नी खूब हँसी और बोली:- “जब तलवार तुम्हारे हाथ में है तो मुझे किस बात का डर, क्यूँ कि मैं जानती हूं कि तुम मुझे बहुत प्यार करते हो !”

उसने तलवार वापिस म्यान में डाल दी और बोला कि :- यही मेरा जवाब है! मैं भी जानता हूं कि मेरे सतगुरु मुझे बहुत प्यार करते हैं और ये तूफ़ान भी उनकी मर्जी के बिना नहीं आया। इसलिए जो भी होगा अच्छा ही होगा। अगर हम बच गये तो भी और अगर नहीं बचे तो भी, क्योंकि सब कुछ उस मालिक के हाथ में है और वो कभी भी कुछ भी गलत नहीं कर सकता। वो जो भी करेंगे हमारे भले के लिए करेंगे।

एक सत्संगी को हमेशा अपने सतगुरु पर हर हालत में भरोसा रखना चाहिये और यह भरोसा हमारे पूरे जीवन को बदल सकता है। लेकिन भरोसा करनी में (भजन सुमिरन) जाहिर करना है बातों से नहीं

सच्चा नाम क्या है ?

नाम नाम सब कहत है नाम न पाया कोय ||1||

परमात्मा का नाम तो सब जपते है पर किसी को भी नाम (परमात्नमा) हीं मिला है ?  

अब हमें यह इस बात पर विचार करना है कि कोनसा नाम हम जपते है ? और उसको जपने से हमें कोनसा नाम नही मिला ? 

हम सब किसी न किसी आस्था या विचारो के साथ जन्म से बंधे पड़े है | इसीलिए जैसा माहोल,हमें मिलता है हम वैसे बन जाते है | भक्ति भी हम ऐसे ही सीखते है ,जो हम परिवार में  या अपने धर्म या मजहब के लोगो में देखते है, वैसा ही हम सिख जाते है | जब तक हमारी बुद्दि का दायरा नहीं खुलता है, जब तक स्वतंत्र रूप से अपने बारे में नहीं सोचते है | हम वैसे ही करते है जैसा हमारे उपर प्रभाव होता है | हम क्या करते है ? हम कोनसा नाम जपते है ?  

हम सब अपने मजहबो के हिसाब से हमने अपने अपने परमात्मा के अलग अलग नाम रखे है और उसको जपते है समझाते है कि हमें इसको जपने से परमात्मा मिल जायेगा | जैसे हिन्दू भाई ओम नाम को जपते है और राम नाम के महिमा अनेक प्रकार से गाते है | मुसलमान भाई अल्लाह के नाम को जपते है | सिख में वाहेगुरु नाम प्रचलित है | और इसाइओ में god god नाप को जपने से मुक्ति समझते है | ऐसे ही कई अनगिनत नाम हमने परमात्मा के हमने प्यार में आकर रखे है | जैसे जप जी में परमात्मा के पाचवी पातशाही ने 1400 के करीब नाम रखे है |

बड़े हुजुर महाराज जी  “नाम की महिमा करने के लिए संतो को लफ्ज नहीं मिलते , क्योकि उसका नमूना दुनिया में है ही नहीं| हम अलाह, परमेश्वर आदि लफ्जो को नाम समझते है | परन्तु लफ्ज नाम नहीं | दुनिया लफ्जो में ही उलझकर रह गई |लफ्ज सिर्फ आत्मा को नाम के साथ जोड़ने के लिए है समझाने बुझाने के लिए है लफ्ज नाम नहीं |” अमृत वचन पेज २७ 

जैसे जैसे संतो महात्माओ ने परमात्मा के गुण अपने अंतर में महसूस किये उन्होंने भी प्यार में आकर गुणों  के आधार पर परमात्मा के कई नाम रखे है जैसे राम ( रमी हुई ताकत है ) रहीम ( हम सब पर समान रूप से रहम करता है ) दयालु ( दया उसका स्वभाव है ) कृपालु ( कृपा करता है ) | जैसे माँ अपने बच्चे के प्यार में आकर कई नामो से पुकारती है |वैसे ही हमने भी परमात्मा के कई नाम रखे है जो हर भाषा , हर देश , जाति में अलग अलग हो सकते है पर हम इन नामो से उस एक ही महिमा करते है | 

कबीर सा : किरतम नाम कथे तेरे जिहबा |

जिन्हें हम किसी भी भाषा में लिख पढ़ या बोल सकते है | इन सब नामो का इतिहास भी है | जैसे 500 वर्ष पहले परमात्मा को वाहेगुरु के नाम से कोई नहीं जानता था, 1400 वर्ष पहले अल्लाह नाम को कोई नहीं जानता था | 2000 वर्ष पहले god god को कोई नहीं जानता था | त्रेता युग से पहले भी राम नाम था | कहने का भाव है कि नाम सिर्फ एक लफ्ज है जो किसी नामी की हस्ती को बयान करते है | सिर्फ इन लफ्जी या वर्णात्मक नामो को जपने से हमें नाम भाव परमात्मा नहीं मिलता है |    

संत महात्मा हमें समझाते है कि जैसे रोटी  एक लफ्ज है रोटी खाना  अलग है | सिर्फ रोटी, रोटी कहने से भूख नहीं जाती,… रोटी खाने से.. भूख बुझ जाती है | वैसे ही नाम नाम कहने से या जपने से परमात्मा नहीं मिल जाता है | 

यारी सा. “रसना राम कहत ते थाको| पानी कहें, कहू प्यास बुझत है, प्यास बुझात जद चाखो|”

कि जिबान से हम चाहे करोडो बार परमात्मा का कोई भी नाम ले ले | कितने ही दिन क्यों न जप ले , चाहे सालो जप ले |इसीसे सिर्फ हमारे अन्दर अहंकार बढता है | जैसे बड़े हुजुर फरमाते थे कि मैंने ग्रन्थ सा. सो सो बार पाठ करने वाले भइयो से पूछा कि कुछ हुवा, कोई अन्दर रोशनी आई | तो वो शर्म से मुह हिला देते थे | कि कुछ नहीं मिला | जैसे पानी एक लफ्ज है पानी पीना अलग है | सिर्फ पानी पानी कहने से सिर्फ जबान ही थकती है ,प्यास नहीं बुझती,… पानी पीने से प्यास बुझ जाती है | 

कबीर सा. बिन देखे बिन दरस परस बिन, नाम लिए का होई |धन के कहें धनी जो होई, निर्धन रहे न कोई ||

ऐसे ही यह कबीर सा के भी वचन है आप भी हमें यहाँ उदाहरन के जरिये समझा ते है कि सिर्फ धन धन करने से कोई भी आदमी धनी नहीं हो जाता है उसके लिए उसे मेहनत करनी पड़ती है | सालो साल मेहनत की गई मेहनत के बाद वह धनवान बनता है | ऐसे ही अगर हम बिन किसी को देखे जाने किसी भी लफ्जी नामो से उस परमात्मा से नहीं मिल सकते है | जब तक मालिक से जुड़ा न जाये, तब तक खाली नाम लेने का क्या लाभ | ऐसे ही केवल धन धन जपने से हम धनी बनते तो संसार में कोई निर्धन ही नहीं होता |   

बड़े हुजुर का उदाहरण कि उन्होंने में २२ साल तक खोज की …गुरु ग्रन्थ , जप जी पढ़ते थे 

बाबा जी महाराज का उदारण कि उन्होंने भी सालो साल खोज की ..

गुरु अमरदास जी का उदाहरण उन्होंने भी 72 वर्ष तक बाहर के नामो का जप किया पर परमात्मा से मिलाप नहीं हुवा | 

सा. बुल्लेशाह ने भी ४० साल तक किताबो की खोज की |….

स्वामी जी : वर्ण जप जप पचे भेखी | मिले कुछ फल, नहीं नेकी |

कि इन लफ्जो को, इन वर्णात्मक नामो को जप जप कर थक गए सारे | पर उसका कोई भी फल नहीं मिला उनको | 

अब इन वर्णात्मक नामो को जपने से किसी को नाम नहीं मिला तो असल नाम है क्या वो हमें कैसे मिलेगा ये आप अगली कड़ी में खोलकर समझा रहे है |  

क्यों कि उनको न ही सच्चे नाम का ज्ञान है, ना ही इसको पाने का तरीका| तो तरीका क्या है ? जिसके करने से कुछ फल मिले |

म-३ राम राम सभ को कहे, कहिये राम न होय | गुर परसादी राम मन वसे, ता फल पावे कोए |

आप भी यही कह रहे है कि सिर्फ अपनी मर्जी से राम राम जपने से, वो राम जो ताकत है जो हर जगह रमा हुवा है |वह नहीं मिलते | जब तक हम किसी वक़्त के पूर्ण गुरु के पास नहीं जाते | जब हम गुरु के शरण में जाते है तो हमें बताते है कि नाम हमारे अन्दर पहले से मोजूद है पर गुप्त है ,उस नाम का भेद हमें देते है | उसको पाने का  तरीका  सिमरन, ध्यान और भजन  की विधि हमें समझाते है | साथ ही हमें परमार्थ पर चलने की चार शर्तो का वादा, भी हमसे लेते है | (जिसमे शाकाहारी भोजन, नशे से दूर रहना, निर्मल सदाचार जीवन जीना, और नाम की कमाई काम से कम ढाई घंटे करना )  जैसे किसी घर में पहले से धन गडा हो पर हमें उसका पता नही हो | तो हम उसे कभी बाहर ढूंढते है तो कभी और कही | पर अगर कोई भेदी आकर हमें ये बताए की , वो धन हमारे अपने घर में ही है | और इस जगह है तो हम उस धन को आसानी से निकाल सकते है और धनवान बन सकते है|  ऐसे ही गुरु हमें नाम का भेद देते है कि नाम हमारे अपने अन्दर है | और उसे गुरु के कहें अनुसार जब हम कमाई करते है तो हम सच्चे नाम का पाने के काबिल बनते है | 

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सेवा से फायदा ही फायदा है।

मुलतान का एक मशहूर और भक्त कारीगर निज़ामुद्दीन ब्यास सतसंग घर को बहुत ही लगन प्यार से बनाने में लगा रहा। हज़ूर जब भी उसे अपनी मजदूरी लेने को कहते तो कहता कि काम खत्म होने पर इकट्ठी ले लूंगा। जब काफी महीने बीत गये तो हजूर जी ने फिर मजदूरी लेने को कहा। निज़ामुद्दीन फिर हाथ जोड़कर बोला, मेरे मौला,जहाँ का यह नक्शा है, मुझे भी वही ले चलो। हज़ूर जी ने बहुत समझाया कि और कुछ माँग लो। मगर वह हाथ जोड़कर यही फरियाद करता रहा। हज़ूर चुपचाप वापिस आ गये। अब जब काम समाप्ति को था तो हज़ूर सतसंग घर (सचखंड) की ऊपरी मंजिल जहाँ निज़ामुद्दीन मगन होकर काम कर रहा था, उसके पीछे जाकर खड़े हो गये। फिर हज़ूर जी ने कहा– आज मजदूरी देने आया हूँ। हज़ूर जी ने ऊसके सिर पर अपना हाथ रख दिया और उसकी सुरत ऐसी चढ़ा दी कि फिर वह नीचे नही उतरा। बाद में उसके पार्थिव शरीर को ही उतारा गया। बड़े हज़ूर जी कहते थे, कि सेवा से फायदा ही फायदा है, घाटा नही। (seva)

मन की उत्पत्ति और स्वभाव।

हंसा मन की वृति कछु लखि न परै , कहि न जात कछु हरे हरे ॥ टेक ॥ 1 ॥ पांच तत्व मन मनहि तीन गुण , मन के रूप तेहुं लोक खरे ॥ 2 ॥ मन मसजिद अरु मनहि देवहरा , मनहिं देव मन सेव करै ॥ 3 ॥ पाप पुन्य मन आवागवन मन , मनहीं जन्म नौ बार धरै ॥ 4 ॥ ( शब्द 87 )

मदन साहिब कहते हैं : हे प्रभु ! मन का स्वभाव यानी इसकी वृत्ति और उसके कार्यों को समझ पाना असंभव है । मन को तीन गुणों और पाँच तत्त्वों के सतोगुणी अंश से उपजा माना जाता है इसलिए इसके अंदर तीन गुणों और पाँच तत्त्वों का गुण शामिल है । त्रिलोकी की मायामयी रचना तीन गुणों और पाँच तत्त्वों का पसारा है । मन , काल का ही रूप है । इसलिए काल या मन को त्रिलोकी का कर्ता कहने में कोई अंतर नहीं ।

वर्तमान अवस्था में मन आत्मा पर हावी है , इसलिए मन ही जीव को मंदिरों , मसजिदों आदि की ओर खींचता है और जीव मन की ही पूजा और सेवा में लगा हुआ है । जीव जो भी पुण्य – पाप करता है , मन के कहे अनुसार करता है । यह पुण्य – पाप ही जीवात्मा को आवागमन के बंधन में डाल देते हैं ।

योग जाप तप कर्म सबै मन , कर्म वृक्ष फल कर्म फरै ॥ 6 ॥ 1981-1 ( शब्द 87 )

मन ही जीव को जप – तप , पूजा – पाठ , योग – त्याग आदि अनेक प्रकार की बाहरमुखी भक्ति में उलझा देता है । जीव मन के कहे अनुसार किए कर्मों का फल भोगने के लिए विवश हो जाता है । आप समझा रहे हैं कि आत्मा तो निष्कर्मी है । मन , जीव के अंदर सांसारिक इच्छाएँ पैदा करके जीव को कर्म में प्रवृत्त कर देता है । जब जीव कर्म कर लेता है तो स्वाभाविक ही उनका फल भोगने के बंधन में पड़ जाता है । जब तक जीव मन के बंधन से के बंधन से मुक्त नहीं होता , यह आवागमन से भी मुक्त नहीं हो सकता ।

मदन साहिब इस शब्द के अंत में फ़रमाते हैं : मन माया दुइ नाम रूप एक , बिन चीन्हे जग भटकि मरै ॥ 9 ॥ मदन सन्त कोइ शब्द पारखी , मन को चीन्हि मिलि शब्द तरै ॥10 ॥ ( शब्द 87 )

आप कह रहे हैं कि मन और माया ये दो नाम अलग – अलग हैं , परंतु दोनों की प्रकृति एक है । जब तक जीव मन की पहचान नहीं करता , जब तक वह मन को वश में नहीं करता , तब तक वह सदा मायामय संसार में भटकता रहता है । जब वह शब्द द्वारा मन को पहचान लेता है और मन को वश में कर लेता है, तब जीवात्मा शब्द में लीन होकर भवसागर से पार हो जाती है। उस अवस्था में जीव मनमुख से गुरुमुख बन जाता है।

नोट:- शब्द या नाम के बारे में आप पिछली पोस्ट में पढ़ सकते है। यह पोस्ट के अंश, मदन साहिब रचित ग्रंथ (RSSB) में से लिया गया है।

मंजिल, मुसाफिर और सफ़र

🌻मंजिल, मुसाफिर और सफ़र

एक अनपढ़ गवांर आदमी जिसने कभी रेल्वे स्टेशन नही देखा हो और ना ही कभी ट्रेन का सफ़र तय किया हो ।
और अगर उसे दिल्ली जाना हो तो वो पहले रेलवे स्टेशन आता है , अब बेचारा कभी ट्रेन में सफ़र तो किया नही , और स्टेशन पर इतनी सारी ट्रेनों को देखकर सोच में पड़ जाता है की आखिर दिल्ली जाने के लिए कौन सी ट्रेन होगी और उसमे सफ़र कैसे किया जा सकता है । इसलिए वहाँ भटकते रहता है और वहाँ मोजूद भीड़ में एक एक से पूछने की कोशिश करता है। लेकिन सही और संतुष्टि भरा जवाब नही मिल पता ।
आखिर उस अनपढ़ गवांर मुसाफिर की ये हालात देखकर किसी संतजन पुरुष को उस पर तरस आता है और उस मुसाफिर से कहता है की भाई यहाँ तेरे सही सवालों के जवाब के लिए यहाँ इंक़्वायरी ऑफिस लगी है तू वहाँ जा वहाँ तुझे सफ़र तय करने की पूरी और सही जानकारी मिल जायेगी ।
फिर वो मुसाफिर उस इंक्वायरी ऑफिस से ये जानकारी मिलती है कि दिल्ली को कौन सी ट्रेन कब कहा से जाने वाली है।
और वहाँ उसे ये भी समझया जाता है कि तूने कभी ट्रेन का सफ़र नही किया है और तेरा ये सफ़र टिकट लिए बिना संभव ही नही है , इसके लिए तुझे टिकट मास्टर से टिकट लेनी पड़ेगी।
और फिर वो अनपढ़ गवांर मुसाफिर टिकट ले कर निर्देशित ट्रेन में बैठ जाता है और धीरे धीरे अपनी मंजिल की ओर बढ़ाता जाता है और सफ़र बड़ी आसानी से तय हो जाता है ।

अब विचार करें
वो अनपढ़ और गवांर मुसाफिर आदमी हम हैं, जो भटके हुए है मंजिल तो पता है लेकिन सफ़र कैसे तय करना ये नही पता ।

वो स्टेशन ये संसार है , जहाँ बहुत सारी भीड़ में हम ऐसे लोगों से उम्मीद करते हैं जिन्हें खुद की मन्ज़िल का भी पता नही है।

वो ट्रेन ये सिमरन भजन है जिसमें बैठे बगैर सफ़र तय असंभव है।

वो सफ़र रूहानियत है , निचे पैर के तलवों से शुरू हो कर धीरे धीरे ऊपर की ओर बढ़ कर आँखों के ऊपर खत्म होता है ।

वो मन्ज़िल जहाँ जाना है वो मालिक का घर है , जहाँ जाने के बाद कोई सफ़र नही होता ।

वो इंक्वायरी ऑफिस ये सत्संग है , जहां हमें अपनी मन्ज़िल की सारी बातों की सही जानकारी मिलती है, और वहीँ पर हमें सतगुरु की ओर इशारा मिलता है ।

वो स्टेशन(संसार) मास्टर सतगुरु है , यही वो असली जरिया है जिसकी मदद के बिना एक कदम भी नही चला जा सकता ।

और उनकी दी जाने वाली टिकट नाम दान है जिसके बिना रूहानियत का सफ़र तय करना ना नामुनकिन है, असंभव है ।

तो अगर हमें मन्ज़िल का भी पता है, टिकट भी मिल चुकी है और ट्रेन भी सामने ही खड़ी है तो भाई टिकट को हाथ में पकड़ कर ट्रेन को देखते रहने से सफ़र तय होने वाला नही ।
तो अब देर किस बात की है आईये आज से ही नाम रूपी टिकट से सिमरन भजन रूपी ट्रेन में आकर अपने असली सफ़र को चलें और मन्ज़िल पर पहुंचें

भगवान का जन्मदिन

एक छोटी-सी कहानी :

अत्यंत काल्पनिक कहानी है लेकिन विचार करने जैसी है। शायद उपयोग की हो।
मैंने सुना है, एक मुसलमान सूफी फकीर ने एक रात्रि स्वप्न देखा कि वह स्वर्ग में पहुंच गया है और उसने वहां यह भी देखा कि स्वर्ग में बहुत बड़ा समारोह मनाया जा रहा है। सारे रास्ते सजे हैं। बहुत दीप जले हैं। बहुत फूल रास्ते के किनारे लगे हैं। सारे पथ और सारे महल सभी प्रकाशित हैं। उसने जाने वालों से पूछा, आज क्या है? क्या कोई समारोह है? और उसे ज्ञात हुआ कि आज भगवान का जन्मदिन है और उनकी सवारी निकलने वाली है। वह एक दरख्त के पास खड़ा हो गया।
लाखों लोगों की बहुत बड़ी शोभायात्रा निकल रही है। सामने घोड़े पर एक अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति बैठा हुआ है। उसने लोगों से पूछा, यह प्रकाशवान व्यक्ति कौन है? ज्ञात हुआ कि यह ईसा मसीह हैं और उनके पीछे उनके अनुयायी हैं। लाखों-करोड़ों उनके अनुयायी हैं। उनके निकल जाने के बाद वैसे ही दूसरे व्यक्ति की सवारी निकली, तब फिर उसने पूछा कि यह कौन हैं? उसे ज्ञात हुआ, यह हजरत मोहम्मद हैं। वैसे ही लाखों लोग उनके पीछे हैं। फिर बुद्ध हैं। फिर महावीर हैं, जरथुस्त्र हैं, कनफ्यूशियस हैं और सबके पीछे करोड़ों-करोड़ों लोग हैं।

जब सारी शोभायात्रा निकल गई तो पीछे अत्यंत दीन और दरिद्र सा एक वृद्ध घोड़े पर सवार है। उसके पीछे कोई नहीं है। उसने पूछा, यह कौन है? और ज्ञात हुआ कि यह स्वयं परमात्मा हैं।
घबराकर उसकी नींद खुल गई और हैरान हुआ…।
यह स्वप्न में सत्य नहीं हुआ है, यह आज सारी जमीन पर सत्य हो गया है।

लोग क्राइस्ट के साथ हैं, बुद्ध के साथ हैं, राम के साथ हैं, कृष्ण के साथ हैं, परमात्मा के साथ कोई भी नहीं है।

जिसे परमात्मा के साथ होना हो उसे बीच में किसी मध्यस्थ को लेने की कोई भी जरूरत नहीं। और जो परमात्मा के साथ हो, वह स्मरण रखे कि क्राइस्ट के साथ हो ही जाएगा, लेकिन जो क्राइस्ट के साथ है, अनिवार्य नहीं है कि वह परमात्मा के साथ हो जाएगा। जो परमात्मा के साथ है, वह राम, बुद्ध, कृष्ण और महावीर के साथ हो ही जाएगा, लेकिन जो उनके साथ है स्मरण रखे कि अनिवार्य नहीं कि वह परमात्मा के साथ हो जाएगा।

और फिर यह भी स्मरण रहे कि जो बुद्ध के साथ है, कृष्ण के विरोध में है; और जो क्राइस्ट के साथ है और राम के विरोध में है; और जो महावीर के साथ है तथा कनफ्यूशियस के विरोध में है, वह कभी परमात्मा के साथ नहीं हो सकता।
जो परमात्मा के साथ है वह एक ही साथ क्राइस्ट, राम, बुद्ध, महावीर सबके साथ हो जाता है।

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