ईद का दिन था , लोग ईद की नमाज अदा करके वापस आ रहे थे । राह में एक पूर्ण मुर्शीद का मुरीद खड़ा था , हर राहगीर से पूछ रहा था , सांई ईद कद है ? लोग हंसते और कहते ओ सांई तेरे को नहीं पता ईद तां अज है । उसी राह से ख्वाजा गुलाम फरीद गुजरे , आदमी ने उनसे भी वही सवाल किया । सांई ईद कद ? आपने फ़रमाया , यार मिले जद । आदमी रोने लगा और बोला हजूर , यार मिले कद ? आपने फ़रमाया ऐ होमैं (काम,क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) मरे जद , आदमी ने फिर रोते हुए पूछा , ऐ होमैं मरे कद ? आप मुस्कराए और आदमी के कंधों पर हाथ रखकर फ़रमाया , ओ यार चाहे जद
ध्यान किसका करें तीन चीजों का ध्यान हमारे रूहानी सफ़र में हमारा सहायक हो सकता है : . परमात्मा का ध्यान नाम या शब्द का ध्यान जो परमात्मा का क्रियात्मक रूप है गुरु का ध्यान जो परमात्मा का प्रकट रूप है . हमारे जीवन का उद्देश्य मालिक को देखना है , उसका सिमरन और उसका […]
गांव-देहात में एक कीड़ा पाया जाता है, जिसे गोबरैला कहा जाता है। उसे गाय, भैंसों के ताजे गोबर की बू बहुत भाती है! वह सुबह से गोबर की तलाश में निकल पड़ता है और सारा दिन उसे जहां कहीं गोबर मिल जाता है, वहीं उसका गोला बनाना शुरू कर देता है। शाम तक वह एक बड़ा सा गोला बना लेता है। फिर उस गोले को ढ़केलते हुए अपने बिल तक ले जाता है। लेकिन बिल पर पहुंच कर उसे पता चलता है कि गोला तो बहुत बड़ा बन गया मगर उसके बिल का द्वार बहुत छोटा है। बहुत परिश्रम और कोशिशों के बाद भी वह उस गोले को बिल के अंदर नहीं ढ़केल पाता, और उसे वहीं पर छोड़कर बिल में चला जाता है।
यही हाल हम मनुष्यों का भी है। पूरी जिंदगी हम दुनियाभर का माल-मत्ता जमा करने में लगे रहते हैं, और जब अंत समय आता है, तो पता चलता है कि ये सब तो साथ नहीं ले जा सकते। और तब हम उस जीवन भर की कमाई को बड़ी हसरत से देखते हुए इस संसार से विदा हो जाते हैं।। पुण्य किसी को दगा नहीं देता और पाप किसी का सगा नहीं होता। जो कर्म को समझता है, उसे धर्म को समझने की जरूरत नहीं पड़ती। संपत्ति के उत्तराधिकारी कोई भी या अनेक हो सकते हैं,
लेकिन कर्मों के उत्तराधिकारी केवल और केवल हम स्वयं ही होते हैं,इसलिए उसकी खोज में रहे जो हमारे साथ जाना है, उसे हासिल करने में ही समझदारी है।
पाकिस्तान में कालाबाग में अक्सर हुजूर बड़े महाराज (सतगुरु) सत्संग देने जाते थे। कालाबाग के पास एक गांव में एक बुजुर्ग महिला जिसकी उम्र अस्सी साल से ऊपर थी को भी पता चला कि ब्यास वाले संत कालाबाग में सत्संग देने आने वाले हैं। उस बुजुर्ग महिला ने अपने लड़के से कहा कि तुम मुझे कालाबाग ले चलो वहां मैंने ब्यास वाले संत के दर्शन करने हैं और उनसे नाम दान भी लेना है।
लड़के ने कहा कि माता जी तुम्हें सांस लेने में दिक्कत आ रही है, इसलिए वहां जाकर तकलीफ़ हुई तो परेशानी हो सकती है। माता जी ने बहुत हठ किया। खैर लड़के ने अपनी बैलगाड़ी में एक बिस्तर लगाया, उस पर माता जी को लिटाया और कालाबाग की ओर चल पड़ा। रास्ते में माता जी का सांस उखड़ गया और उनकी मौत हो गई। लड़का बड़ा परेशान हुआ। खैर उसने बैलगाड़ी वापिस अपने गांव की तरफ मोड़ ली।
उधर कालाबाग में हुजूर बड़े महाराज जी सत्संग कर रहे थे। सत्संग के दौरान उन्होंने सारी संगत को कहा की आप सब लोग दस मिनट के लिए ध्यान में बैठो। हुजूर बड़े महाराज जी भी ध्यान में बैठे गये। जब सत्संग समाप्त हो गया और हुजूर अपने विश्राम गृह में चले गए तो वहां के कुछ प्रमुख लोग हुजूर के पास विश्राम गृह में आए और कहने लगे कि आप ने दस मिनट के लिए सत्संग क्यों बंद किया था।
हुजूर बड़े महाराज जी ने टाल दिया। परन्तु वह लोग न मानें और ज़िद करने लगे। हुजूर बड़े महाराज जी ने फ़रमाया कि आपके पास ही एक गांव में एक बुजुर्ग महिला जो हमारे सत्संग में बड़े प्रेम और सच्चे मन से आ रही थी, उसकी रास्ते में ही मौत हो गई। धरमराय ने अपने यमदूत उसे लेने भेजे थे परन्तु क्योंकि उसकी सत्संग सुनने और नाम दान लेने की प्रबल इच्छा थी, इसलिए हमें उसे बचाने वहां जाना पड़ा।
यमदूत कह रहे थे कि यह हमारा जीवन है, तो हुजूर कहने लगे कि मैंने कहा कि आप इसके घर से सत्संग वाले स्थान तक कदम गिन लो यदि आपके कदम ज्यादा बनते हों तो ले जाना नहीं तो मैं ले जाऊंगा। हुजूर ने फ़रमाया कि जब मैंने संगत को दस मिनट के लिए ध्यान में बिठाया तो कदमों की पैमायश चल रही थी। सत्संग की तरफ बीस कदम ज्यादा निकले, इसलिए माता को ले जाने के लिए मुझे जाना पड़ा, हालांकि माता को केवल सत्संग व नाम दान की ख्वाहिश ही थी।
सोचो जो सत्गुरु केवल सच्ची ख्वाहिश पर ही जीवों का उद्धार करता है, वह हमें भी अपनी चरण शरण में ले कर एक दिन जरूर सचखंड का निवासी बनाएगा।
परमात्मा जब किसी से नाराज़ होता है तो वह उसका रिज्क (खाना पीना )नहीं बन्द करता और न ही जीव को कोई दुख देता है और न ही सूर्य को आज्ञा देता है कि इसके आंगन को रोशनी नहीं देना । बल्कि परमात्मा जब किसी से नाराज़ होता है तो वह उसका वो वक्त छिन लेता है जिस वक्त वह बन्दगी कर सके । परमात्मा की बन्दगी न कर सकना उस परमात्मा की नाराज़गी की निशानी है और जो जीव हर रोज भजन बन्दगी करते हैं तो वह खुशनसीब हैं कि संत सत्गुरु परमात्मा उस जीव से बहुत खुश हैं, इसीलिए जीव को पल पल परमात्मा का शुक्रिया अदा करना चाहिए।
एक संत हुआ करते थे । उनकी इबादत या भक्ति इस कदर थीं कि वो अपनी धुन में इतने मस्त हो जाते थे की उनको कुछ होश नहीं रहता था । उनकी अदा और चाल इतनी मस्तानी हो जाती थीं । वो जहाँ जाते , देखने वालों की भीड़ लग जाती थी। और उनके दर्शन के लिए लोग जगह -जगह पहुँच जाते थे । उनके चेहरे पर नूर साफ झलकता था ।
वो संत रोज सुबह चार बजे उठकर ईश्वर का नाम लेते हुए घूमने निकल जाते थे। एक दिन वो रोज की तरह अपने मस्ति में मस्त होकर झूमते हुए जा रहे थे।
रास्ते में उनकी नज़र एक फ़रिश्ते पर पड़ी और उस फ़रिश्ते के हाथ में एक डायरी थीं । संत ने फ़रिश्ते को रोककर पूछा आप यहाँ क्या कर रहे हैं ! और ये डायरी में क्या है ? फ़रिश्ते ने जवाब दिया कि इसमें उन लोगों के नाम है जो खुदा को याद करते है ।
यह सुनकर संत की इच्छा हुई की उसमें उनका नाम है कि नहीं, उन्होंने पुछ ही लिया की, क्या मेरा नाम है इस डायरी में ? फ़रिश्ते ने कहा आप ही देख लो और डायरी संत को दे दी । संत ने डायरी खोलकर देखी तो उनका नाम कही नहीं था । इस पर संत थोड़ा मुस्कराये और फिर वह अपनी मस्तानी अदा में रब को याद करते हुए चले गये ।
दूसरे दिन फिर वही फ़रिश्ते वापस दिखाई दिये पर इस बार संत ने ध्यान नहीं दिया और अपनी मस्तानी चाल में चल दिये।इतने में फ़रिश्ते ने कहा आज नहीं देखोगे डायरी । तो संत मुस्कुरा दिए और कहा, दिखा दो और जैसे ही डायरी खोलकर देखा तो, सबसे ऊपर उन्ही संत का नाम था
इस पर संत हँस कर बोले क्या खुदा के यहाँ पर भी दो-दो डायरी हैं क्या ? कल तो था नहीं और आज सबसे ऊपर है ।
इस पर फ़रिश्ते ने कहा की आप ने जो कल डायरी देखी थी, वो उनकी थी जो लोग ईश्वर से प्यार करते हैं । आज ये डायरी में उन लोगों के नाम है, जिनसे ईश्वर खुद प्यार करता है ।
बस इतना सुनना था कि वो संत दहाड़ मारकर रोने लगे, और कितने घंटों तक वही सर झुकाये पड़े रहे, और रोते हुए ये कहते रहे ए ईश्वर यदि में कल तुझ पर जरा सा भी ऐतराज कर लेता तो मेरा नाम कही नहीं होता । पर मेरे जरा से सबर पर तु मुझ अभागे को इतना बड़ा ईनाम देगा । तू सच में बहुत दयालु हैं तुझसे बड़ा प्यार करने वाला कोई नहीं और बार-बार रोते रहें ।।
ईश्वर की बंदगी में अंत तक डटे रहो, सबर रखो क्योंकि जब भी ईश्वर की मेहरबानी का समय आएगा तब अपना मन बैचेन होने लगेगा लेकिन तुम वहा डटे रहना ताकि वो महान प्रभु हम पर भी कृपा करें ।
गुर पीर सदाए मंगण जाए ॥ ता कै मूल न लगीऐ पाए ॥ घाल खाए किछ हथहो दे ॥ नानक राह पछाणह से ॥
जो गुरु और पीर अपने शिष्यों – सेवकों से माँगते फिरते हैं , उनके पैरों पर माथा ही नहीं टेकना चाहिए । कैसे महात्मा को ढूँढ़ना है ? जो स्वयं मेहनत की कमाई करता हो और हमसे भी मेहनत की कमाई करवाए । जब तक हम मेहनत की कमाई नहीं करते , हमारे अभ्यास में बरकत ही नहीं हो सकती । आप देखते ही हैं कि कोई भी इनसान दूसरे को यों ही पैसे नहीं देता । जब हम किसी साधु को खिलाते हैं , कुछ देते हैं , तो मन में कई इच्छाएँ रखते हैं । अपनी गंदगी निकालकर उसके सिर डालने की कोशिश करते हैं । जिन इच्छाओं के साथ खिलाया है , उन्हें भरने – भुगतने के लिए उस साधु को देह के बंधनों में आना पड़ेगा और साथ ही खिलानेवाले को भी आना पड़ेगा । इसी लिए महात्मा हमें अपनी मेहनत की कमाई करने के लिए कहते हैं । दुनिया में अपना फ़र्ज़ समझकर रहना है । इस बात को स्वामी जी महाराज अगली तुक में स्पष्ट करेंगे कि किस तरह हमें दुनिया में रहते हुए भी दुनिया की मैल में नहीं लिबड़ना है । हमें महात्माओं के उपदेश पर चलने की कोशिश करनी है । जब तक हमारे मन में भरोसा और विश्वास नहीं आता , हमारा ख़याल कभी नाम की कमाई की ओर नहीं जा सकता । महात्मा को ढूँढ़कर हमें अपने आप को उनके हवाले कर देना है । मन की मत को छोड़कर गुरुमुखों की मत पर चलने की कोशिश करनी है । गुरुमुखों की मत क्या है ? अपने ख़याल को नौ द्वारों में से निकालकर आँखों के पीछे इकट्ठा करो और शब्द या नाम के साथ जोड़ो ।
चौथी पातशाही श्री गुरु रामदास जी कहते हैं : कासट मह जिउ है बैसंतर मथ संजम काट कढीजै । राम नाम है जोत सबाई तत गुरमत काढ लईजै ॥
जिस तरह लकड़ी के अंदर अग्नि होती है , न अग्नि नज़र आती है , ही उस अग्नि से हम फ़ायदा उठा सकते हैं । जिस समय हम लकड़ी पर लकड़ी रगड़ते हैं , हम उस लकड़ी से अग्नि भी पैदा कर लेते हैं और अग्नि से फायदा भी उठा लेते हैं । इसी प्रकार वह राम – नाम की ज्योति हमारे सभी के अंदर यहाँ आँखों के पीछे जल रही है । वह चोरों के अंदर श्री जल रही है , साधुओं , संत – महात्माओं के अंदर भी जल रही है , लेकिन हम न उसको देख सकते हैं , न उससे फायदा उठा सकते हैं । जिस समय हम गुरुमुखों के कहने के अनुसार चलते हैं , उनके उपदेश पर चलते हैं , उस ज्योति के दर्शन भी कर लेते हैं , उससे फायदा उठाना भी शुरू कर देते हैं ।
धंधै धावत जग बाधिआ ना बूझै वीचार ॥ जमण मरण विसारिआ मनमुख मुगध गवार ॥
गुरु साहिब फ़रमाते हैं कि हम मनमुख हैं , मुगध हैं , गँवार हैं कि हम हमेशा पेट के धंधों में ही दिन – रात भटकते फिरते हैं । जिस मक़सद के लिए परमात्मा ने हमें यहाँ भेजा है उसके बारे में कभी हम सोच और विचार करने की कोशिश ही नहीं करते । हम पराए गधे बने बैठे हैं , लोगों के घरों की आग बुझाने की कोशिश करते हैं । हम अपने आप को भी धोखा दे रहे हैं और दुनिया को भी धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं । इसलिए स्वामी जी महाराज हमारी हालत देखकर तरस करते हैं कि हम दुनिया के जीव बुरी तरह से इस काल की नगरी में , काल के जाल में , मरण – जन्म के दु : खों में फँसे हुए हैं ।
जब शिष्य तैयार हो जाता है तो उसका गुरु से मिलाप हो जाता है । सच पूछो तो गुरु ऐसे शिष्य की आप ही तलाश कर लेता है।
गुरु के लिए आत्मा को ऊपर ले जाना मुश्किल नहीं , लेकिन उचित अभ्यास के बिना ऊपर ले जाने से उस आत्मा का नुकसान होता है । एक रेशमी कपड़े को , जो काँटेदार पौधों पर फैला हुआ है , अगर एकाएक खींचा जाये तो वह फटकर टुकड़े – टुकड़े हो जायेगा । उसी तरह आत्मा को , जो कर्म के काँटों में फँसी हुई है और शरीर के रोम – रोम में फैली हुई है , गुरु के प्रेम द्वारा धीरे – धीरे निर्मल करना चाहिए ।
आपकी चिंता और परेशानी गुरु की चिंता और परेशानी है । इन सब चिंताओं को गुरु के हवाले कर दीजिये और बेफ़िक्र होकर गुरु के लिए प्रेम बढ़ाइये , जो आपका फ़र्ज़ है ।
कृपया चिंता न करें । हर क़दम पर , आपकी मदद , मार्गदर्शन और रक्षा के लिए सतगुरु हमेशा आपके साथ हैं । आप उनके प्रति सचेत हो जायें और उनकी लगातार मौजूदगी का अनुभव करें । विश्वास , प्रेम और नम्रता के साथ बराबर भजन – सुमिरन करते रहें ।